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    सूरए यूसुफ़, आयतें 11-15, (कार्यक्रम 377)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या ग्यारह और बारह की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا يَا أَبَانَا مَا لَكَ لَا تَأْمَنَّا عَلَى يُوسُفَ وَإِنَّا لَهُ لَنَاصِحُونَ (11) أَرْسِلْهُ مَعَنَا غَدًا يَرْتَعْ وَيَلْعَبْ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ (12)(यूसुफ़ के भाईयों ने) कहा, हे पिता आपको क्या हो गया है कि हमें यूसुफ़ के संबंध में अमानतदार नहीं समझते? जबकि हम उसके शुभ चिंतक हैं। (12:11) कल उसे हमारे साथ भेजिए ताकि वह (हमारे साथ मरुस्थल में) खेले और निश्चित रूप से हम उसकी रक्षा करने वाले हैं। (12:12)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने आरंभ में उनकी हत्या करने का निर्णय किया किन्तु बाद में अपने निर्णय को बदल कर उन्हें कुएं में छिपाने की योजना बनाई। उन्होंने यूसुफ़ को पिता से अलग करने के लिए एक षड्यंत्र रचा और अपने पिता से कहा कि आप यूसुफ़ को हमसे अलग क्यों रखते हैं। उसे हमारे साथ भेजिए ताकि जब हम वहां काम कर रहे हों तो वह मरुस्थल में खेले कूदे।खेल कूद की आवश्यकता ऐसा सशक्त तर्क था जिसके माध्यम से यूसुफ़ के भाइयों ने उन्हें अपने पिता से अलग करने के लिए तैयार कर लिया क्योंकि मनोरंजन और खेलकूद हर बच्चे और युवा की आवश्यकता है। यही कारण था कि हज़रत याक़ूब ने अनिच्छा के बावजूद यूसुफ़ को उनके साथ भेजने का विरोध नहीं किया।इस आयत से हमने सीखा कि हर दावे पर भरोसा नहीं करना चाहिए और हर नारे के धोखे में नहीं आना चाहिए। हज़रत यूसुफ़ के भाइयों ने जो उन्हें क्षति पहुंचाना चाहते थे स्वयं को उनका हितैषी और शुभ चिंतक बनाकर प्रस्तुत किया।ईर्ष्या इस बात का कारण बनती है कि मनुष्य अपने निकटतम लोगों से भी झूठ बोले और उन्हें धोखा दे।युवा को मनोरंजन और खेल कूद की आवश्यकता होती है किन्तु इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे इससे अनुचित लाभ न उठाएं।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 13 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ إِنِّي لَيَحْزُنُنِي أَنْ تَذْهَبُوا بِهِ وَأَخَافُ أَنْ يَأْكُلَهُ الذِّئْبُ وَأَنْتُمْ عَنْهُ غَافِلُونَ (13)(याक़ूब ने) कहा, मुझे इस बात से दुख है कि तुम उसे अपने साथ लिए जा रहे हो और मुझे इस बात का भय है कि उसे भेड़िया खा ले और तुम उसकी ओर से निश्चेत रहो। (12:13)यद्यपि हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ईश्वर के पैग़म्बर थे किन्तु यूसुफ़ के लिए पिता ही थे और पुत्र के प्रति पिता का प्रेम इस बात की मांग करता था कि वे यूसुफ़ को स्वयं से अलग न करें किन्तु इसी के साथ यूसुफ़ एक बालक थे जिन्हें धीरे धीरे अपने पैरों पर खड़ा होना था, अतः उन्होंने इस बात की अनुमति दे दी कि वे अपने भाइयों के साथ खेलने के लिए मरुस्थल जाएं।दूसरे शब्दों में संतान के लिए ख़तरे की आशंका, उसे घर में बंद करने का कारण नहीं बनना चाहिए बल्कि स्वाधीनता, प्रशिक्षण का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है और संतान से प्रेम के बावजूद माता पिता को अवश्य ही उसका मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। ऐसे अवसरों पर जहां ख़तरों का आभास हो, संतान को सावधान कर देना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि बच्चे के प्रशिक्षण में दो सिद्धांतों को दृष्टिगत रखना चाहिए, प्रथम उसकी स्वाधीनता का मार्ग प्रशस्त करना और दूसरे उसे ख़तरों से सावधान करते रहना।ख़तरों से निश्चेतना, क्षति उठाने का कारण बनती है और कभी कभी उसकी क्षतिपूर्ति संभव नहीं होती।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 14 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا لَئِنْ أَكَلَهُ الذِّئْبُ وَنَحْنُ عُصْبَةٌ إِنَّا إِذًا لَخَاسِرُونَ (14)(यूसुफ़ के भाइयों ने) कहा कि यदि हम शक्तिशाली लोगों के होते हुए भेड़िये ने उसे खा लिया तो उस स्थिति में हम घाटा उठाने वालों में होंगे। (12:14)यूसुफ़ को मार्ग से हटाने का षड्यंत्र रचने वाले उनके भाइयों ने अपने पिता की ओर से ख़तरे की आशंका जताए जाने के उत्तर में केवल अपनी शक्ति पर भरोसा किया और कहा कि वे हर प्रकार के ख़तरे से यूसुफ़ की रक्षा करेंगे। इस प्रकार से उन्होंने अपने पिता को यूसुफ़ को साथ न भेजने से रोक दिया।किन्तु स्पष्ट है कि किसी का सशक्त होना, उसके अमानतदार होने का तर्क नहीं हो सकता। यूसुफ़ के भाई शक्तिशाली थे किन्तु वे उन्हें क्षति पहुंचाना चाहते थे जिसका हज़रत याक़ूब को आभास हो गया था किन्तु उनके पास अपनी बात सिद्ध करने के लिए कोई प्रमाण नहीं था।इस आयत से हमने सीखा कि प्रायः युवाओं को अपनी शक्ति पर घमंड होता है और वे ख़तरों को गंभीरता से नहीं लेते, जबकि बड़े लोग ख़तरों के संबंध में अधिक संवेदनशील होते हैं।कुछ लोग अपने घृणित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कोई भी काम करने के लिए तैयार रहते हैं और झूठ तथा धोखे द्वारा अपनी मर्यादा को ख़तरे में डाल देते हैं।आइये अब सूरए यूसुफ़ की 15वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا ذَهَبُوا بِهِ وَأَجْمَعُوا أَنْ يَجْعَلُوهُ فِي غَيَابَةِ الْجُبِّ وَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِ لَتُنَبِّئَنَّهُمْ بِأَمْرِهِمْ هَذَا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ (15)तो जब वे यूसुफ़ को अपने साथ ले गए और सब इस बात पर एकमत हो गए कि उसे कुएं की गहराइयों में डाल दें तो हमने उसकी ओर अपना विशेष संदेश वहि भेजा (और कहा कि घबराओ मत) भविष्य में तुम इन्हें इनके इस काम से अवगत कराओगे जबकि इन्हें कुछ भी पता नहीं होगा। (12:15)अंततः हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाई उन्हें उनके पिता से अलग करके अपने साथ ले गए और जैसा कि उन्होंने पहले से योजना बना रखी थी उन्हें कुएं में डाल दिया किन्तु पानी में नहीं बल्कि कुएं की दीवार के साथ बने हुए एक ताक़ पर उतार दिया ताकि वे प्यास से भी न मरें और पशुओं के ख़तरे तथा मरुस्थल की सर्दी और गर्मी से भी सुरक्षित रहें। इसके अतिरिक्त व्यापारिक कारवानों के वहां आने पर वे उनकी सहायता से मुक्ति प्राप्त कर सकते थे।इस स्थिति में ईश्वर ने, यूसुफ़ को जिनकी आयु बहुत अधिक नहीं थी और संभावित रूप से एकांत और कुएं के अंधकार से भयभीत हो सकते थे, सांत्वना दी और अपने विशेष संदेश के माध्यम से उनसे कहा कि इस बात से दुखी मत हो कि उन्होंने तुम्हें इस कुएं में डाल दिया है। शीघ्र ही ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होंगी कि यही लोग तुम्हारे पास आएंगे और तुम इन्हें इनके इस बुरे कर्म से अवगत कराओगे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय संदेश केवल पैग़म्बरों से विशेष नहीं है बल्कि वह अपने अन्य पवित्र बंदों के पास भी अपना संदेश भेजता है। उस समय हज़रत यूसुफ़ पैग़म्बर नहीं बने थे किन्तु ईश्वर ने उनके पास अपना संदेश भेजा।भविष्य के प्रति आशा, जीवन जारी रखने के लिए सबसे बड़ी पूंजी है। ईश्वर ने अपने संदेश द्वारा यूसुफ़ को अपने जीवन के प्रति आशावान बना दिया है।कठिनाइयों और संकटों में ईश्वर की दया व कृपा की ओर से आशावान रहना चाहिए और किसी भी स्थिति में निराश नहीं होना चाहिए।