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    सूरए यूसुफ़, आयतें 110-111, (कार्यक्रम 404)

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    आइये पहले सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 110 की तिलावत सुनते हैं।حَتَّى إِذَا اسْتَيْئَسَ الرُّسُلُ وَظَنُّوا أَنَّهُمْ قَدْ كُذِبُوا جَاءَهُمْ نَصْرُنَا فَنُجِّيَ مَنْ نَشَاءُ وَلَا يُرَدُّ بَأْسُنَا عَنِ الْقَوْمِ الْمُجْرِمِينَ (110)(लोगों को ईश्वर के मार्ग की ओर बुलाने का क्रम जारी रहा) यहां तक कि पैग़म्बर (लोगों के मार्गदर्शन की ओर से) निराश हो गए और (काफ़िरों ने हमारी ओर से दी जाने वाली मोहलत के कारण) यह सोचा कि उनसे झूठ बोल (कर दंड का वादा किया) गया है। इसी समय उन तक हमारी सहायता पहुंच गई फिर हमने जिसे चाहा उसे मुक्ति प्रदान कर दी और अपराधी लोगों पर से हमारे दंड को टाला नहीं जा सकता। (12:110)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वर ने लोगों के मार्गदर्शन के लिए उन्हीं में से कुछ पैग़म्बरों का चयन किया और उनके पास अपना विशेष संदेश वहि भेजा ताकि वे दूरदर्शिता और तत्वदर्शिता के आधार पर लोगों को ईश्वरीय मार्ग की ओर आमंत्रित करें किन्तु अधिकांश लोगों ने उनकी बातों को स्वीकार नहीं किया और उन्हें झुठला दिया।यह आयत कहती है कि किन्तु पैग़म्बर अपने मार्ग पर अडिग रहे और उन्होंने लोगों का मार्गदर्शन करना नहीं छोड़ा परंतु अंततः वे लोगों द्वारा अपने निमंत्रण के स्वीकार किए जाने की ओर से निराश हो गए। इस अवसर पर काफ़िरों ने उन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि तुम्हारा वादा सच्चा था तो ईश्वर की ओर से दंड आना चाहिए था और हम विरोधियों को उसमें ग्रस्त हो जाना चाहिए था।जब बात यहां तक पहुंच गई और काफ़िरों ने किसी भी प्रकार से सत्य को स्वीकार नहीं किया तो ईश्वर ने पैग़म्बरों और उनके साथियों को मुक्ति दी और काफ़िरों को दंड में ग्रस्त कर दिया। जैसा कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम जैसे महान पैग़म्बर ने दसियों वर्षों तक लोगों को ईश्वर की ओर बुलाया किन्तु केवल कुछ ही लोग उन पर ईमान लाए। अतः धरती पर एक भयंकर तूफ़ान आया और ईमान वालों के अतिरिक्त सभी लोग मारे गए।इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िरों को मोहलत देना और उन्हें दंडित करने में विलंब करना, ईश्वर की एक परंपरा है।ईश्वरीय दंड प्रलय से विशेष नहीं हैं, कभी कभी इसी संसार में भी वह पापियों और अपराधियों को दंडित करता है।न तो ईमान वालों को ईश्वरीय दया की ओर से निराश होना चाहिए और न ही काफ़िरों को अपने भविष्य की ओर से आशावान रहना चाहिए।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 111 की तिलावत सुनते हैं जो इस सूरे की अंतिम आयत है। لَقَدْ كَانَ فِي قَصَصِهِمْ عِبْرَةٌ لِأُولِي الْأَلْبَابِ مَا كَانَ حَدِيثًا يُفْتَرَى وَلَكِنْ تَصْدِيقَ الَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ وَتَفْصِيلَ كُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ (111)

    निश्चित रूप से पिछले लोगों के वृत्तांतों में बुद्धि वालों के लिए शिक्षा सामग्री है। यह (क़ुरआन) कोई मनगढ़ंत बात नहीं है बल्कि यह उन किताबों की पुष्टि करने वाला है जो इससे पहले थीं, यह क़ुरआन हर बात का विस्तार (से वर्णन करने वाला) और ईमान वालों के लिए मार्गदर्शन और दया है। (12:111)सूरए यूसुफ़ के अंत में आने वाली इस आयत में एक महत्त्वपूर्ण बिंदु की ओर संकेत किया गया है कि हज़रत यूसुफ़ और उनके भाइयों के वृत्तांत सहित क़ुरआने मजीद में वर्णित घटनाएं लोगों की शिक्षा के लिए आई हैं न यह कि क़ुरआने मजीद कहानियों या इतिहास की कोई पुस्तक है। अलबत्ता केवल बुद्धि वाले ही इससे शिक्षा लेते हैं और अधिकांश लोग इन घटनाओं को पढ़ते या सुनते तो हैं किन्तु उन पर ध्यान नहीं देते।आगे चलकर आयत कहती है कि बुद्धि वाले लोग इस आसमानी किताब की आयतों में चिंतन करके भलि भांति यह बात समझ लेते हैं कि क़ुरआने मजीद किसी मनुष्य की ओर से लिखी गई किताब नहीं है बल्कि यह ईश्वरीय कथन है जो पिछली आसमानी किताबों से समन्वित है। इसमें ऐसी अनेक वास्तविकताओं का वर्णन किया गया है जो परिवार, अर्थव्यवस्था, राजनीति, कला, संस्कृति तथा अन्य सभी मामलों में लोगों का मार्गदर्शन करती हैं।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद की घटनाएं, किसी लेखक की कल्पनाएं नहीं बल्कि वास्तविकताओं का वर्णन और शिक्षा सामग्री हैं।यदि बुद्धि वाले क़ुरआने मजीद की आयतों में चिंतन करें तो उन्हें ईश्वरीय दया व मार्गदर्शन प्राप्त हो जाएगा क्योंकि वे उसकी वास्तविकताओं पर ईमान ले आएंगे।हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम, भी षड्यंत्रों के बावजूद सम्मान और सत्ता की चरम सीमा पर पहुंचे। उनकी घटना लोगों के लिए उत्तम पाठ है कि यदि हम ईश्वर के दास बन जाएं तो वह अपने दासों को कभी अकेला नहीं छोड़ता।