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    सूरए यूसुफ़, आयतें 16-18, (कार्यक्रम 378)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या सोलह की तिलावत सुनते हैं।وَجَاءُوا أَبَاهُمْ عِشَاءً يَبْكُونَ (16)और (यूसुफ़ के भाई) रात के समय रोते हुए अपने पिता के पास आए। (12:16)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने अपने षड्यंत्र को व्यवहारिक बनाया और उन्हें एक कुएं में डाल दिया और फिर लौट आए। स्वाभाविक सी बात थी कि उनके पिता हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम सबसे पहले हज़रत यूसुफ़ के बार में प्रश्न करते। यूसुफ़ के भाई रोते हुए ही घर में प्रविष्ट हुए ताकि स्वयं को अपने पिता का शुभचिंतक दर्शाएं और उनके मन से किसी भी प्रकार के षड्यंत्र की संभावना को समाप्त कर दें।इस आयत से हमने सीखा कि हर किसी के आंसूओं पर भरोसा नहीं करना चाहिए, संभव है कि कुछ मिथ्याचारी आंसू बहाकर स्वयं को निर्दोष सिद्ध करना चाहें।भावनाओं को भड़काना और रोने जैसे भावनात्मक हथकंडों का प्रयोग, षड्यंत्रकारियों की शैलियों में से एक है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 17 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا يَا أَبَانَا إِنَّا ذَهَبْنَا نَسْتَبِقُ وَتَرَكْنَا يُوسُفَ عِنْدَ مَتَاعِنَا فَأَكَلَهُ الذِّئْبُ وَمَا أَنْتَ بِمُؤْمِنٍ لَنَا وَلَوْ كُنَّا صَادِقِينَ (17)(यूसुफ़ के भाइयों ने) कहा कि हे पिता! हम दौड़ की प्रतियोगिता करने के लिए गए और यूसुफ़ को अपने सामान के पास छोड़ दिया तो भेड़िए ने उसे खा लिया और आप तो हमारी बात का विश्वास नहीं करेंगे, चाहे हम सच्चे ही क्यों न हों। (12:17)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने बनावटी आंसूओं के साथ ही एक बड़ा झूठ भी गढ़ा उन्होंने कहा कि जब हम खेलने गए तो यूसुफ़ सामान के पास रह गए और चूंकि वे अकेले थे इस लिए भेड़िए ने उन्हें खा लिया। जबकि वे यह बात भूल गए कि वे यूसुफ़ को खेलकूद के लिए ही अपने पिता के पास से ले गए थे और तय यह था कि यूसुफ़ उनके साथ मरुस्थल में खेलने के लिए जाए न यह कि उनके भाई खेलें और वे सामान की रखवाली करें।यूसुफ़ के भाइयों ने झूठ बोलने पर ही संतोष नहीं किया बल्कि उन्होंने अपने पिता पर आरोप लगाया कि उन्हें उन पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि हम सच कह रहे हैं किन्तु आप हमारी बातों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, आपको हम पर भरोसा नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि कभी कभी एक झूठ कई झूठों का कारण बनता है। यूसुफ़ के भाइयों ने अपनी ग़लती को छिपाने के लिए कई झूठ बोले और अपने काम के परिणाम के बारे में यह नहीं सोचा कि इससे उनका अपमान हो सकता है।झूठा व्यक्ति इस बात पर आग्रह करता है कि लोग उसे सच्चा समझें क्योंकि उसे सच्चाई के सामने आने का भय रहता है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्य 18 की तिलावत सुनते हैं।وَجَاءُوا عَلَى قَمِيصِهِ بِدَمٍ كَذِبٍ قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ أَنْفُسُكُمْ أَمْرًا فَصَبْرٌ جَمِيلٌ وَاللَّهُ الْمُسْتَعَانُ عَلَى مَا تَصِفُونَ (18)और (यूसुफ़ की) क़मीस में झूठा ख़ून लगा कर अपने पिता के पास ले आए। उन्होंने कहा (ऐसा नहीं है कि यूसुफ़ को भेड़िया खा गया हो) बल्कि तुम्हारी (शैतानी) इच्छाओं ने इस को सजा संवार कर तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत कर दिया अतः अब भले प्रकार से धैर्य व संयम से काम लेना आवश्यक है और जो कुछ तुम कह रहे हो उसके बारे में मैं ईश्वर से सहायता चाहता हूं। (12:18)यूसुफ़ के भाईयों ने अपनी झूठी कहानी को आगे बढ़ाते हुए कि जो रोने धोने से आरंभ हुई थी, हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के वस्त्र में एक पशु का रक्त लगा कर उसे अपने पिता के समक्ष प्रस्तुत कर दिया और इसे भेड़िए द्वारा यूसुफ़ को खा लेने के अपने दावे का ठोस प्रमाण बताया।किन्तु हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम जो ईश्वर के पैग़म्बर थे, वास्तविकता से अवगत थे और जानते थे कि हज़रत यूसुफ़ जीवित हैं, उन्होंने अपने पुत्रों के धोखे में आए बिना कहा कि यह सब तुम लोगों की ईर्ष्या का परिणाम है। यूसुफ़ से ईर्ष्या के कारण ही तुम लोगों ने यह घृणित कार्य किया और मुझे उससे अलग कर दिया। तुम यह सोच रहे थे कि यूसुफ़ को मुझसे दूर करके उसे क्षति पहुंचाओगे जबकि यूसुफ़ के अतिरिक्त तुमने मुझे भी ऐसा दुख दे दिया है कि ईश्वर की सहायता के बिना मुझे धैर्य नहीं आएगा।हज़रत याक़ूब की ओर से अपने बेटों के विरुद्ध और यूसुफ़ की खोज के लिए कोई कार्यवाही न किए जाने का कारण शायद वह स्वप्न था जो हज़रत यूसुफ़ ने उन्हें बताया था और उसके आधार पर वे जानते थे कि उनका पुत्र जीवित भी है और सुरक्षित भी और साथ ही बहुत उच्च स्थान तक पहुंचेगा, इसी कारण उन्होंने केवल अपने संबंध में अप्रसन्नता प्रकट की और कहा कि ईश्वर मुझे धैर्य प्रदान करे कि मैं यूसुफ़ के विरह को सहन कर सकूं।इस आयत से हमने सीखा कि आंतरिक इच्छाएं, मनुष्य की दृष्टि में पापों को भी सुंदर बना कर प्रस्तुत करती हैं और पाप का औचित्य दर्शाने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।सभी घटनाएं एक आयाम से ईश्वरीय परीक्षाएं होती हैं और हमें अपनी तैयारी के साथ धैर्य और संयम का प्रदर्शन करना चाहिए।भला संयम यह है कि मनुष्य को दुखों और कठिनाइयों के बावजूद अनुकंपाओं के प्रति कृतघ्न नहीं होना चाहिए बल्कि ईश्वर से सहायता मांगते रहना चाहिए।