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    सूरए यूसुफ़, आयतें 19-22, (कार्यक्रम 379)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 19 और 20 की तिलावत सुनते हैं।وَجَاءَتْ سَيَّارَةٌ فَأَرْسَلُوا وَارِدَهُمْ فَأَدْلَى دَلْوَهُ قَالَ يَا بُشْرَى هَذَا غُلَامٌ وَأَسَرُّوهُ بِضَاعَةً وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِمَا يَعْمَلُونَ (19) وَشَرَوْهُ بِثَمَنٍ بَخْسٍ دَرَاهِمَ مَعْدُودَةٍ وَكَانُوا فِيهِ مِنَ الزَّاهِدِينَ (20)और एक कारवां वहां पहुंचा तो उन लोगों ने अपने पानी भरने वाले को भेजा तो जब उसने अपना डोल डाला तो पुकार उठा, अरे शुभ सूचना! यह तो एक बालक है। और उन लोगों ने उसे माल समझ कर छिपा लिया (ताकि कोई उस पर स्वामित्व का दावा न करे) और जो कुछ वे कर रहे थे ईश्वर उससे भलि भांति अवगत था। (12:19) और उन्होंने उसे बहुत ही कम दाम पर कुछ दिरहमों में बेच दिया और उन्हें उससे कोई विशेष लगाव नहीं था। (12:20)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने उन्हें कुएं में डाल दिया और उनकी क़मीस को झूठे रक्त में रंगा और फिर रोते हुए अपने पिता के पास आए और उन्हें बताया कि यूसुफ़ को भेड़िया खा गया और इस संबंध में अपने को दुखी दर्शाने लगे।आइये अब देखते हैं कि यूसुफ़ का क्या बना। वे कुछ समय तक कुएं में पड़े रहे, यहां तक कि एक कारवां आया और उसने अपनी प्यास बुझाने के लिए कुएं में डोल डाला। हज़रत यूसुफ़ ने डोल की रस्सी पकड़ ली और ऊपर आ गए। कारवां वालों ने उन्हें दास समझा जिसे मंडी में बेचकर धन कमाया जा सकता था।उन्होंने इस भय से कि कहीं कोई यूसुफ़ को पहचान कर उन पर अपने स्वामित्व का दावा न कर दे, उन्हें अपने सामान में छिपा दिया और फिर बाज़ार में जा कर बहुत सस्ते दामों में उन्हें बेच दिया क्योंकि उन्हें प्राप्त करने के लिए कारवां वालों को न तो कोई कष्ट उठाना पड़ा और न ही कोई राशि ख़र्च करनी पड़ी थी। कभी कभी ऐसा होता है कि जिस वस्तु को मनुष्य सरलता से प्राप्त करता है उसे सरलता से गंवा भी देता है और उसके मूल्य को नहीं समझता।इन आयतों से हमने सीखा कि कभी कभी मनुष्य के निकटवर्ती लोग ही उसे समस्याओं के कुएं में ढकेल देते हैं किन्तु ईश्वरीय कृपा इस बात का कारण बनती है कि अनजान लोग उसे मुक्ति दें, चाहे उनका लक्ष्य उसे मुक्ति देना न हो।कुछ लोग मनुष्यों को सामान समझते हैं और उसके मानवीय आयामों की ओर से अनभिज्ञ रहते हैं।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 21 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ الَّذِي اشْتَرَاهُ مِنْ مِصْرَ لِامْرَأَتِهِ أَكْرِمِي مَثْوَاهُ عَسَى أَنْ يَنْفَعَنَا أَوْ نَتَّخِذَهُ وَلَدًا وَكَذَلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِي الْأَرْضِ وَلِنُعَلِّمَهُ مِنْ تَأْوِيلِ الْأَحَادِيثِ وَاللَّهُ غَالِبٌ عَلَى أَمْرِهِ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ (21)और मिस्र के जिस व्यक्ति ने उसे ख़रीदा था उसने अपनी पत्नी से कहा कि इसे आदर सत्कार के साथ रखना, हो सकता है कि यह भविष्य में हमें लाभ पहुंचाए या हम इसे अपना बेटा ही बना लें। और इस प्रकार हमने यूसुफ़ को (मिस्र की उस) धरती में स्थान दिया और उन्हें सपनों की व्याख्या का ज्ञान प्रदान किया। और ईश्वर को अपने मामले पर पूरा अधिकार है किन्तु अधिकांश लोग इसे नहीं समझते। (12:21)जब कारवां वालों ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को बेचने के लिए मंडी में रखा तो मिस्र के दरबार के एक प्रतिनिधि ने उन्हें ख़रीद लिया और शासक के पास ले गया। मिस्र का शासक उन्हें अपने घर ले गया ताकि वे घर का काम काज भी करें और उसकी पत्नी का दिल भी बहलाएं क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थी और अब उन्हें संतान की कोई आशा भी नहीं रह गई थी।इस स्थान पर ईश्वर कहता है कि मिस्र के शासक के घर में यूसुफ़ के आने से उनके सत्ता में आने और जो कुछ उन्होंने स्वप्न में देखा था उसके व्यवहारिक होने का मार्ग प्रशस्त हो गया।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के हृदय ईश्वर के हाथ में हैं, यूसुफ़ का प्रेम मिस्र के शासक के हृदय में इस प्रकार बस गया कि वह उन्हें अपने बच्चे के समान चाहने लगा, जबकि विदित रूप से वे एक दास के अतिरिक्त कुछ नहीं थे।ईश्वर की परंपरा है कि कठिनाइयों के बाद सुख प्रदान करता है। जैसा कि ईश्वर ने यूसुफ़ को कुएं की गहराइयों से उठाकर सम्मान के शिखर तक पहुंचा दिया।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 22 की तिलावत सुनते हैं।وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُ آَتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا وَكَذَلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ (22)और जब यूसुफ़ युवावस्था की सीमा को पहुंचे तो हमने उन्हें पैग़म्बरी और ज्ञान प्रदान किया और इस प्रकार हम भलाई करने वालों को बदला दिया करते हैं। (12:22)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की घटना में ईश्वर उनके आध्यात्मिक स्थान की ओर संकेत करते हुए कहता है कि वे मिस्र के शासक के घर में बड़े हुए किन्तु चूंकि वे भले व पवित्र व्यक्ति थे अतः जब वे पैग़म्बरी और ईश्वरीय ज्ञान जैसी विशेष ईश्वरीय कृपाएं प्राप्त करने के योग्य हो गये तो हमने उन्हें यह वस्तुएं प्रदान कर दीं। यह ईश्वरीय परंपरा है कि वह इस संसार में भले लोगों को भला बदला देता है।जी हां! ईश्वर अपने पैग़म्बरों को समाज के लोगों के बीच से ही चुनता है और विभिन्न घटनाओं द्वारा उनकी परीक्षा लेता है ताकि उनमें इस महान दायित्व को ग्रहण करने की क्षमता उत्पन्न हो जाए और लोगों के बीच भी उनकी उपयोगिता सिद्ध हो जाए।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों के ज्ञान का एक भाग, अर्जित करने योग्य नहीं होता बल्कि ईश्वर की ओर से प्रदान होता है।ईश्वर की ओर से प्राप्त होने वाले दायित्व के लिए ऐसी योग्यता की आवश्यकता होती है जिसकी लोगों में उपस्थिति के बारे में केवल ईश्वर को ज्ञान होता है।केवल ज्ञान और शरीर संबंधी योग्यताएं ही ईश्वर की विशेष कृपाओं की प्राप्ति के लिए पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि भला और पवित्र होना भी आवश्यक है।