islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए यूसुफ़, आयतें 23-24, (कार्यक्रम 380)

    सूरए यूसुफ़, आयतें 23-24, (कार्यक्रम 380)

    Rate this post

    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 23 की तिलावत सुनते हैं।وَرَاوَدَتْهُ الَّتِي هُوَ فِي بَيْتِهَا عَنْ نَفْسِهِ وَغَلَّقَتِ الْأَبْوَابَ وَقَالَتْ هَيْتَ لَكَ قَالَ مَعَاذَ اللَّهِ إِنَّهُ رَبِّي أَحْسَنَ مَثْوَايَ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ (23)और जिस स्त्री के घर में यूसुफ़ थे उसने उन पर डोरे डाले और दरवाज़े बंद कर दिए और कहने लगी लो आओ। यूसुफ़ ने कहा, मैं ईश्वर की शरण चाहता हूं, निश्चित रूप से मेरे पालनहार ने मुझे अच्छा ठिकाना प्रदान किया है और निसंदेह अत्याचारी कभी सफल नहीं होते। (12:23)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा कि मिस्र के शासक ने किसी को दासों की मंडी में भेजा और हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को अपने घर में सेवा के लिए ख़रीद लिया किन्तु जब उसने उनके सौंदर्य को देखा तो अपनी पत्नी से कहा कि इनका आदर सत्कार करो। इस प्रकार से हज़रत यूसुफ़ को उसके घर में विशेष सम्मान प्राप्त हो गया और उनके तथा अन्य दासों एवं सेवकों के बीच अंतर रखा जाने लगा।हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को जिन्हें अपने भाइयों की उपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ा था और उन्हें कुएं में डाल दिया गया था, मिस्र के शासक के घर में एक अन्य कड़ी परीक्षा का सामना करना पड़ा। यह ऐसी परीक्षा थी जो हज़रत यूसुफ़ की आयु के किसी भी युवा को देनी पड़ सकती है और उसे कठिन अवसरों पर अपनी आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रित रखने के लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए।मिस्र के शासक की पत्नी ज़ुलैख़ा हज़रत यूसुफ़ पर मोहित हो गई और उसने उनसे कि जो उसके दास थे, अपनी वासना की पूर्ति करनी चाही। उसने एक दिन अपने आप को और यूसुफ़ को कमरे में बंद कर लिया और उनसे अपनी अवैध इच्छा की पूर्ति करनी चाही किन्तु हज़रत यूसुफ़ का उत्तर अत्यंत स्पष्ट था। उन्होंने कहा कि यद्यपि मैं तेरा दास हूं किन्तु उससे पहले मैं ईश्वर का दास हूं और मैं ईश्वर की शरण चाहता हूं कि इस प्रकार का पाप करूं।हज़रत यूसुफ़ ने कहा कि किस प्रकार मैं तेरी इच्छा को ईश्वर की इच्छा पर प्राथमिकता दे सकता हूं। ईश्वर ने ही मुझे कुएं की गहराईयों से मिस्र के दरबार तक पहुंचाया और मुझे सम्मानित किया। मैं कदापि ऐसा काम नहीं कर सकता। और यदि मैंने ऐसा किया तो मैं अपने आप पर भी अत्याचार करूंगा और अपने मालिक अर्थात मिस्र के शासक पर भी क्योंकि उसने मुझे अमानतदार समझकर अपने घर में रखा है।इस आयत से हमने सीखा कि काम वासना इतनी सशक्त होती है कि यदि इसे नियंत्रित न किया जाए वह मिस्र के शासक की पत्नी को एक दास के क़दमों में डाल देती है।पुरुषों और महिलाओं का सीमा से अधिक मेलजोल, उनके बहकने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, घटना से पहले ही उसे रोकने का मार्ग खोज लेना चाहिए और पुरुषों और महिलाओं के अनुचित मेलजोल को रोक कर व्यभिचार पर अंकुश लगाना चाहिए।ईश्वर का आज्ञापालन, लोगों की प्रसन्नता से अधिक महत्त्वपूर्ण है। ईश्वर का आज्ञापालन, माता पिता, कार्यालय के अधिकारी और शासक सभी के आदेशों के पालन पर प्राथमिकता रखता है।जब सारे द्वार बंद हो जाते हैं तो ईश्वर की दया का द्वार खुला रहता है और पाप से बचने के लिए ईश्वर की शरण में जाया जा सकता है ताकि वह मनुष्य की मुक्ति के लिए कोई मार्ग खोल दे।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 24 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ هَمَّتْ بِهِ وَهَمَّ بِهَا لَوْلَا أَنْ رَأَى بُرْهَانَ رَبِّهِ كَذَلِكَ لِنَصْرِفَ عَنْهُ السُّوءَ وَالْفَحْشَاءَ إِنَّهُ مِنْ عِبَادِنَا الْمُخْلَصِينَ (24)और निसंदेह उस स्त्री ने यूसुफ़ से बुराई का इरादा किया और यदि वे भी अपने पालनहार का तर्क न देख लेते तो उसकी ओर बढ़ते। इस प्रकार हमने ऐसा किया ताकि बुराई और अश्लीलता को उनसे दूर रखें कि निश्चित रूप से यूसुफ़ हमारे चुने हुए बंदों में से थे। (12:24)पिछली आयतों में हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की ओर से कठिन और कड़ी परिस्थिति में ईश्वर की शरण चाहने की ओर संकेत के बाद इस आयत में कहा गया है कि यदि उनका ध्यान ईश्वर और उसकी सहायता की ओर न होता तो स्वाभाविक रूप से वे भी पाप की ओर उन्मुख हो जाते किन्तु यूसुफ़ के हृदय में ईमान की जो ज्योति प्रकाशमान थी वह सबसे उत्तम तर्क थी और उसी ने उन्हें इस बुरे कर्म से रोके रखा।हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम यदि अपनी विदित बुद्धि पर भरोसा करते तो बड़ी सरलता से कह सकते थे कि मैंने उससे किसी बात की इच्छा नहीं जताई है और वह मेरी मालकिन है तथा मेरा अधिकार उसके हाथ में है तो यदि मैं उसकी बात मान लूं तो मैं दास होने के अपने कर्तव्य का पालन करूंगा।किन्तु ईमान की शक्ति, बुद्धि की शक्ति से कहीं अधिक सशक्त होती है। बुद्धि आंतरिक इच्छाओं से संघर्ष में बहुत जल्दी घुटने टेक देती है किन्तु ईश्वर पर ईमान की शक्ति इतनी मज़बूत होती है कि उसके माध्यम से केवल व्यभिचार ही नहीं बल्कि हर प्रकार की अनैतिक आंतरिक इच्छाओं के समक्ष डटा जा सकता है और सफल भी हुआ जा सकता है।इस आयत से हमने सीखा कि यदि हम वास्तव में और मन की गहराइयों से ईश्वर की शरण में जाएं तो ईश्वर अवश्य ही हमारी सहायता करता है और यदि ईश्वरीय सहायता न हो तो हर किसी के पांव लड़खड़ा सकते हैं।ईश्वर की उपासना में निष्ठा के फल, प्रलय के अतिरिक्त इस संसार में भी मिलते हैं जिनमें जीवन के कठिन अवसरों पर ईश्वरीय सहायता की प्राप्ति शामिल है।सामान्य लोगों की भांति पैग़म्बरों की भी इच्छाएं होती हैं और उन्हें भी पाप में ग्रस्त होने का ख़तरा होता है किन्तु ईश्वर पर दृढ़ ईमान के चलते वे पाप में ग्रस्त नहीं होते और ईश्वर उन्हें पापों और बुराइयों से बचाए रखता है।