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    सूरए यूसुफ़, आयतें 25-27, (कार्यक्रम 381)

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    आइये पहले सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 25 की तिलावत सुनते हैं।وَاسْتَبَقَا الْبَابَ وَقَدَّتْ قَمِيصَهُ مِنْ دُبُرٍ وَأَلْفَيَا سَيِّدَهَا لَدَى الْبَابِ قَالَتْ مَا جَزَاءُ مَنْ أَرَادَ بِأَهْلِكَ سُوءًا إِلَّا أَنْ يُسْجَنَ أَوْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (25)और (यूसुफ़ तथा मिस्र के शासक की पत्नी) दोनों दरवाज़े की ओर दौड़े। उस महिला ने यूसुफ़ के कुर्ते को पीछे से फाड़ दिया, इसी समय उन दोनों ने उसके पति को द्वार पर पाया। वह बोल पड़ी जो तुम्हारी पत्नी के संबंध में बुरी नीयत रखे उसका बदला इसके अतिरिक्त क्या है कि उसे कारावास में डाल दिया जाए या कड़ी यातना दी जाए? (12:25)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि मिस्र के शासक की पत्नी ज़ुलैख़ा हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम पर मोहित हो गई थी और अपनी वासना की पूर्ति करना चाहती थी। एक दिन उसने यूसुफ़ और स्वयं को एक कमरे में बंद कर लिया, यद्यपि सारे द्वार बंद थे किन्तु यूसुफ़ उसकी अनैतिक इच्छा के समक्ष नहीं झुके और दरवाज़े की ओर भागे कि शायद बचने का कोई मार्ग निकल आए।ज़ुलैख़ा भी यूसुफ़ को रोकने के लिए उनके पीछे भागी और उनके कुर्ते को पीछे से पकड़ लिया किन्तु हज़रत यूसुफ़ रुके नहीं और इसी कारण उनका कुर्ता पीछे से फट गया। इसी बीच अचानक ही दरवाज़ा खुला और मिस्र का शासक दिखाई पड़ा। उसने उन दोनों से स्पष्टीकरण चाहा। इससे पूर्व कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम कुछ कहते ज़ुलैख़ा बोल पड़ी और उसने यूसुफ़ पर बुरी नीयत का आरोप लगा कर उन्हें कारावास में डालने और कड़ी यातना देने की मांग की।इस आयत से हमने सीखा कि केवल ज़बान से ईश्वर की शरण चाहना पर्याप्त नहीं है, व्यवहारिक रूप से भी पापों से दूर भागना चाहिए, चाहे सारे द्वार बंद ही क्यों न हों।कभी कभी विदित रूप से कुछ कर्म एक समान दिखाई पड़ते हैं किन्तु उनके लक्ष्य विभिन्न होते हैं। यूसुफ़ और ज़ुलैख़ा दोनों दौड़े थे किन्तु एक पाप करने के लिए और दूसरा पाप से बचने के लिए।सदैव सचेत रहना चाहिए क्योंकि कभी कभी आरोप लगाने वाला ही अपराधी होता है और अपने को बचाने के लिए, दूसरों की भावनाओं से लाभ उठाता है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 26 और 27 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ هِيَ رَاوَدَتْنِي عَنْ نَفْسِي وَشَهِدَ شَاهِدٌ مِنْ أَهْلِهَا إِنْ كَانَ قَمِيصُهُ قُدَّ مِنْ قُبُلٍ فَصَدَقَتْ وَهُوَ مِنَ الْكَاذِبِينَ (26) وَإِنْ كَانَ قَمِيصُهُ قُدَّ مِنْ دُبُرٍ فَكَذَبَتْ وَهُوَ مِنَ الصَّادِقِينَ (27)यूसुफ़ ने कहा कि इसी ने मुझ पर डोरे डाले थे। इस पर उस महिला के परिजनों में से एक ने गवाही दी कि यदि यूसुफ़ का कुर्ता आगे से फटा हो तो वह सही कर रही है और यूसुफ़ झूठ बोलने वालों में से हैं। (12:26) और यदि उसका कुर्ता पीछे से फटा है तो वह झूठ बोल रही है और यूसुफ़ सच्चों में से है। (12:27)ज़ुलैख़ा की ओर से हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम पर लांछन लगाए जाने के बाद उन्होंने अपना बचाव करते हुए स्वयं को हर प्रकार की बुरी नीयत से दूर बताया और कहा कि मैं ज़ुलैख़ा के संबंध में बुरी नीयत नहीं रखता था बल्कि वही मुझ पर डोरे डाल रही थी।मिस्र का शासक जो दोनों पक्षों की बात सुन चुका था, इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता था कि उसकी पत्नी एक दास से अपनी कामेच्छा की पूर्ति चाहती है और दूसरी ओर वह भी नहीं मान सकता था कि एक दास में इतना दुस्साहस हो कि वह उसकी पत्नी को बुरी नज़र से देखे। यही कारण था कि वह असमंजस में था।इसी बीच उसके एक बुद्धिमान सलाहकार ने या फिर पालने में लेटे हुए एक बच्चे ने जिसने यह सारी बातें सुनी थीं, कहा कि यदि यूसुफ़ की बुरी नीयत होती तो स्वाभाविक रूप से उनके और ज़ुलैख़ा के बीच झड़प होती और इस स्थिति में यदि यूसुफ़ का कुर्ता फटता तो आगे का फटता किन्तु यूसुफ़ का कुर्ता पीछे से फटा हुआ है जो इस बात का प्रमाण है कि वे भाग रहे थे अतः ज़ुलैख़ा झूठ बोल रही है। रोचक बात यह है कि यह व्यक्ति या पैग़म्बरे इस्लाम के कथनानुसार एक शिशु जो स्वयं ज़ुलैख़ा के परिजनों में से था उसने उसके विरुद्ध निर्णय सुनाया।यूसुफ़ और ज़ुलैख़ा की घटना से हज़रत मरयम की घटना याद आ जाती है और समझ में आता है कि जो जितना अधिक पवित्र होता है, उतना ही अधिक उस पर आरोप लगता है। हज़रत मरयम अपने काल की सबसे पवित्र महिला थीं किन्तु उन पर भी ऐसा लांछन लगाया गया कि वे मृत्यु की कामना करने लगीं। हज़रत यूसुफ़ भी अपने काल के सबसे पवित्र मनुष्य थे किन्तु उन पर भी लांछन लगाया गया किन्तु दोनों अवसरों पर ईश्वर ने उत्तम ढंग से दोनों को निर्दोष सिद्ध कर दिया।हज़रत यूसुफ़ की घटना में तीन स्थानों पर कुर्ते की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पहली बार जब उन्हें कुएं में डाला गया और ख़ून से सने उनके कुर्ते को उनके पिता के पास ले जाया गया तो चूंकि कुर्ता फटा नहीं था इसलिए उनके भाइयों का यह झूठ खुल गया कि यूसुफ़ को भेड़िये ने खा लिया है। दूसरी बात इसी स्थान पर जब कुर्ते के पीछे से फटने के कारण उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया और तीसरी बात घटना के अंत में जब उनके कुर्ते को नेत्रहीन हो चुके उनके पिता हज़रत याक़ूब अलैहिस्सालाम की आंखों पर डाला जाता है तो उनकी आंखें लौट आती हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि आरोप लगाए जाने की स्थिति में अपना बचाव करते हुए वास्तविक अपराधी को सामने लाना चाहिए, चाहे अपने बचने और उसके दंडित किए जाने की आशा न हो।जब ईश्वर चाह लेता है तो अपराधी के परिजन भी उसके विरुद्ध गवाही देने लगते हैं।फ़ैसला करते समय अपराध के चिन्हों की गहन समीक्षा करना आवश्यक है क्योंकि अभियोजक और अभियुक्त के बयानों के अतिरिक्त अपराध के लक्षणों की भी गहरी समीक्षा होनी चाहिए।