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    सूरए यूसुफ़, आयतें 28-30, (कार्यक्रम 382)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 28 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا رَأَى قَمِيصَهُ قُدَّ مِنْ دُبُرٍ قَالَ إِنَّهُ مِنْ كَيْدِكُنَّ إِنَّ كَيْدَكُنَّ عَظِيمٌ (28)तो जब मिस्र के शासक ने देखा कि यूसुफ़ का कुर्ता पीछे से फटा हुआ है तो (वह वास्तविकता को समझ गया और उसने) कहा, निसंदेह यह तुम महिलाओं की चालों में से है और निश्चय की तुम्हारी चाल बड़ी गहरी होती है। (12:28)पिछले कार्यक्रम में हमने बताया था कि भागते समय हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का कुर्ता ज़ुलैख़ा के हाथों से पीछे से फट गया और जब बात खुल गई तो ज़ुलैख़ा के एक परिजन ने फ़ैसला सुनाया कि यदि उनका कुर्ता पीछे से फटा हो तो वे निर्दोष हैं और ज़ुलैख़ा झूठ बोल रही है।यह आयत कहती है कि मिस्र के शासक ने इस फ़ैसले के बाद देखा कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का कुर्ता पीछे से फटा हुआ है कि जो उनके निर्दोष होने का प्रमाण है अतः उसने अपनी पत्नी को संबोधित करते हुए कहा कि जो कुछ तुमने कहा वह मुझे धोखा देने और अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए था जबकि अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए तुम महिलाओं की चालें बहुत गहरी होती हैं और मनुष्य को आश्चर्य में डाल देती हैं।इस आयत से हमने सीखा कि सत्य कभी छिपा नहीं रहता और अपराधी को एक न एक दिन अपमानित होना ही पड़ता है।सत्य बात को स्वीकार कर लेना चाहिए चाहे वह हमारे अहित में ही क्यों न हो, जैसा कि मिस्र के शासक ने स्वीकार कर लिया कि यूसुफ़ निर्दोष हैं और उसकी पत्नी दोषी है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 29 की तिलावत सुनते हैं।يُوسُفُ أَعْرِضْ عَنْ هَذَا وَاسْتَغْفِرِي لِذَنْبِكِ إِنَّكِ كُنْتِ مِنَ الْخَاطِئِينَ (29)(मिस्र के शासक ने) कहा, हे यूसुफ़ इस बात को जाने दो और तू (हे ज़ुलैख़ा) अपने इस पाप के कारण क्षमा मांग कि निश्चित रूप से तू पापियों में से है। (12:29)इन आयतों से पता चलता है कि मिस्र का शासक वास्तविकताओं को स्वीकार करने वाला और न्यायप्रेमी व्यक्ति था क्योंकि जब उसकी समझ में आ गया कि यूसुफ़ निर्दोष हैं तो उसने कहा कि वे उसके और उसकी पत्नी के सम्मान की रक्षा के लिए इस बात का कहीं और उल्लेख न करें किन्तु उसने यह बात धमकी के स्वर में नहीं बल्कि निवेदन के रूप में कही।दूसरी ओर उसने अपनी पत्नी को, जिसे वह दोषी पा चुका था, क्षमा मांगने का आदेश दिया कि जो ईश्वर की ओर से हिसाब किताब और पारितोषिक तथा दंड दिए जाने की व्यवस्था पर आस्था को दर्शाता है। अलबत्ता, दोषी पत्नी को केवल इतना ही शाब्दिक दंड नहीं देना चाहिए था बल्कि इस बुरे कर्म के लिए उसके साथ और कड़ा व्यवहार करना चाहिए था।इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों के किसी भी बुरे कर्म को देखने या सुनने के बाद हमें उसे अन्य लोगों को नहीं बताना चाहिए।पुरुषों और महिलाओं के बीच बेलगाम संबंध, इतिहास के समस्त कालों में और सभी जातियों के बीच बुरे समझे जाते रहे हैं।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या तीस की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ نِسْوَةٌ فِي الْمَدِينَةِ امْرَأَةُ الْعَزِيزِ تُرَاوِدُ فَتَاهَا عَنْ نَفْسِهِ قَدْ شَغَفَهَا حُبًّا إِنَّا لَنَرَاهَا فِي ضَلَالٍ مُبِينٍ (30)नगर की महिलाओं ने (ज़ुलैख़ा की आलोचना करते हुए) कहा कि मिस्र के शासक की पत्नी अपने युवा दास पर डोरे डाल रही थी और उसका प्रेम उसके हृदय में घर कर चुका है और हम देख रहे हैं कि वह खुली हुई पथभ्रष्टता में है। (12:30)यद्यपि मिस्र के शासक ने आदेश दिया था कि यह घटना लोगों के कान तक न पहुंचे किन्तु स्वाभाविक है कि शासकों के दरबारों में बहुत से लोग रहते हैं, उनमें से किसी ने यह बात दूसरों तक पहुंचा दी और फिर यह बात पूरे नगर में फैल गई। स्पष्ट है कि यह बात लोगों विशेष कर महिलाओं के लिए स्वीकार करने योग्य नहीं थी कि मिस्र के शासक की पत्नी एक दास से अपनी वासना की पूर्ति चाहती थी। अतः उन्होंने ज़ुलैख़ा की आलोचना आरंभ कर दी और उसे इस मामले में दोषी ठहराया।अलबत्ता दूसरी ओर वे यह भी समझ गई थीं कि वह दास कोई साधारण व्यक्ति नहीं है और उसमें विशेष शारीरिक और नैतिक गुण होने चाहिए कि जिन पर ज़ुलैख़ा मंत्रमुग्ध हो गई थी, अतः वे भी अपने मन में यूसुफ़ को देखने की इच्छा रखती थीं और वे जो ताने दे रही थीं, उसका एक भाग ईर्ष्या के कारण था जो आलोचना के रूप में सामने आ रहा था।रोचक बात यह है कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के जीवन में दो गुटों ने उनसे अत्यधिक प्रेम को पथभ्रष्टता का चिन्ह बताया। प्रथम उनके भाई थे जिन्होंने यूसुफ़ से अपने पिता के गहरे प्रेम को उनकी पथभ्रष्टता की निशानी बताया और कहा कि हम देखते हैं कि हमारे पिता खुली हुई पथभ्रष्टता में हैं और दूसरा गुट महिलाओं का था जिन्होंने यूसुफ़ से ज़ुलैख़ा के गहरे प्रेम के कारण कहा कि वह खुली हुई पथभ्रष्टता में है।यद्यपि हज़रत यूसुफ़ से उनके पिता का प्रेम अत्यंत पवित्र और ईश्वरीय था और ज़ुलैख़ा का प्रेम अपवित्र और शैतानी था किन्तु इससे यह पता चलता है कि प्रेम का संबंध उन लोगों की समझ से परे है जो प्रेम में ग्रस्त नहीं हुए हैं और इसी लिए वे प्रेमी को पथभ्रष्ट कहते हैं, जिस प्रकार से ईश्वर के प्रेम में डूबे हुए उसके सच्चे प्रेमियों को बहुत से लोग पागल और बहका हुआ कहते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि पाप करने के लिए द्वार बंद करने के बावजूद अपमान का मार्ग खुला ही रहता है और पाप एक न एक दिन मनुष्य को अपमानित करके ही रहता है।पुरुष, परिवार का ज़िम्मेदार होता है और परिवार के लोगों की ग़लतियों को उसी से संबंधित किया जाता है, जैसा कि इस घटना में लोगों ने मिस्र के शासक की पत्नी के रूप में ज़ुलैख़ा की आलोचना की।