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    सूरए यूसुफ़, आयतें 31-33, (कार्यक्रम 383)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 31 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا سَمِعَتْ بِمَكْرِهِنَّ أَرْسَلَتْ إِلَيْهِنَّ وَأَعْتَدَتْ لَهُنَّ مُتَّكَأً وَآَتَتْ كُلَّ وَاحِدَةٍ مِنْهُنَّ سِكِّينًا وَقَالَتِ اخْرُجْ عَلَيْهِنَّ فَلَمَّا رَأَيْنَهُ أَكْبَرْنَهُ وَقَطَّعْنَ أَيْدِيَهُنَّ وَقُلْنَ حَاشَ لِلَّهِ مَا هَذَا بَشَرًا إِنْ هَذَا إِلَّا مَلَكٌ كَرِيمٌ (31)तो जब (मिस्र के शासक की पत्नी ने) नगर की महिलाओं की आलोचना को सुना तो उन्हें बुला भेजा और उनके लिए भव्य सभा का आयोजन किया और (फल काटकर खाने के लिए) हर एक के हाथ में एक चाक़ू दे दिया। और (यूसुफ़ से) कहा कि इनके सामने से निकल जाओ। तो जैसे ही उन्होंने यूसुफ़ को देखा तो उन्हें बड़ा (ही सुंदर) पाया और अपने हाथों को काट लिया और बोल उठीं धन्य है ईश्वर! यह तो मनुष्य है ही नहीं बल्कि यह तो कोई भला फ़रिश्ता है। (12:31)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि जब मिस्र की महिलाओं ने सुना कि उनके शासक की पत्नी ज़ुलैख़ा अपने दास पर मोहित हो गई है तो उन्होंने उसकी आलोचना की किन्तु साथ ही वे उस दास को देखना चाहती थीं कि वह कैसा है कि ज़ुलैख़ा रानी होने के बावजूद उस पर मोहित हो गई है।दूसरी ओर ज़ुलैख़ा भी अपने काम का औचित्य और यूसुफ़ से प्रेम का कारण दर्शाने के प्रयास में थी अतः उसने मिस्र के दरबार की महिलाओं तथा अन्य प्रतिष्ठित महिलाओं को एक भव्य सभा में आमंत्रित किया और उनके खाने पीने का प्रबंध किया। हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का सौंदर्य ऐसा था कि सारी महिलाएं आश्चर्यचकित रह गई और ईश्वर का गुणगान करने लगीं कि उसने इस प्रकार के सुंदर मनुष्य की रचना की है कि जो मनुष्य लगता ही नहीं और उसे फ़रिश्ता कहा जाना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि कभी कभी आलोचना, सद्भावना और शुभचिंतन के कारण नहीं बल्कि ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता के कारण होती है।कभी कभी लोग काम के लिए दूसरों की आलोचना करते हैं किन्तु यदि उन्हें भी उसी परीक्षा से गुज़रना पड़े तो वे भी वही ग़लती करते हैं। मिस्र की महिलाएं जो ज़ुलैख़ा का परिहास कर रही थीं, यूसुफ़ को क्षण भर देख कर स्वयं भी स्तब्ध रह गईं।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 32 की तिलावत सुनते हैं।قَالَتْ فَذَلِكُنَّ الَّذِي لُمْتُنَّنِي فِيهِ وَلَقَدْ رَاوَدْتُهُ عَنْ نَفْسِهِ فَاسْتَعْصَمَ وَلَئِنْ لَمْ يَفْعَلْ مَا آَمُرُهُ لَيُسْجَنَنَّ وَلَيَكُونَنْ مِنَ الصَّاغِرِينَ (32)(ज़ुलैख़ा ने मिस्र की महिलाओं से) कहा, यह वही है जिसके कारण तुमने मेरी आलोचना की थी। और मैंने इसे रिझाने का प्रयास किया था किन्तु यह बच निकला। और जो कुछ मैं इसे आदेश दे रही हूं, उसका इसने पालन नहीं किया तो क़ैद कर दिया जाएगा और अपमानित भी होगा। (12:32)यद्यपि ज़ुलैख़ा ने अपने पति के समक्ष यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को पापी और अपने को निर्दोष बताया था किन्तु जब उसने मिस्र की प्रतिष्ठित महिलाओं की प्रतिक्रिया देखी तो अपने कर्म को स्वीकार किया और कहा कि अब तो तुम ने भी मान लिया होगा कि मैं अकारण उस पर मोहित नहीं हूं और अब तुम मेरी आलोचना नहीं करोगी।किन्तु इसके साथ ही यह भी जान लो कि यूसुफ़ ने मेरी इच्छा की पूर्ति नहीं की अतः मैं उसे जेल में डलवा दूंगी ताकि उसे पता चल जाए कि दास को अपने स्वामी के आदेश की अवमानना नहीं करनी चाहिए। विचित्र बात यह है कि इस स्थान पर ज़ुलैख़ा ने हज़रत यूसुफ़ की पवित्रता को भी स्वीकार किया और उन्हें कारावास में डालने का भी आदेश दिया ताकि दूसरों के लिए पाठ रहे और कोई उसके विरोध का साहस न करे। आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 33 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ رَبِّ السِّجْنُ أَحَبُّ إِلَيَّ مِمَّا يَدْعُونَنِي إِلَيْهِ وَإِلَّا تَصْرِفْ عَنِّي كَيْدَهُنَّ أَصْبُ إِلَيْهِنَّ وَأَكُنْ مِنَ الْجَاهِلِينَ (33)यूसुफ़ ने कहा, प्रभुवर मेरी दृष्टि में कारावास उस काम से अधिक प्रिय है जिसकी ओर मुझे ये बुला रही हैं। और यदि तूने मुझे इनकी चालों से न बचाया तो मैं इनकी ओर झुक सकता हूं और ऐसी स्थिति में मैं अज्ञानियों में से हो जाऊंगा। (12:33)यद्यपि मिस्र के शासक को यूसुफ़ के निर्दोष होने का विश्वास था और उसकी पत्नी ने मिस्र की महिलाओं के समक्ष अपने पाप को स्वीकार भी किया था किन्तु उसने ज़ुलैख़ा के कहने पर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को कारावास में डाल दिया। इससे पता चलता है कि अत्यधिक सुख और ऐश्वर्य, पुरुषार्थ को महिलाओं की वासना के अधीन बना देता है और ऐसे लोग जनता पर राज करते हैं।किन्तु इसके मुक़ाबले में पवित्र लोग दूसरों की वासनाओं की पूर्ति करने के स्थान पर कारावास में जाने के लिए तैयार रहते हैं। वे ईश्वर की प्रसन्नता को अपनी और दूसरों की इच्छा पर प्राथमिकता देते हैं और कभी भी ईश्वर की अवज्ञा के मूल्य पर दूसरों की इच्छा को स्वीकार नहीं करते चाहे वह उनका अभिभावक ही क्यों न हो।इस आयत से हमने सीखा कि नैतिक पवित्रता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इतिहास में बहुत से लोगों को अपनी नैतिक पवित्रता के कारण कारवास में जाना पड़ा है। इसके मुक़ाबले में यदि विदित रूप से स्वतंत्र रहना, अनेक मानवीय मान्यताओं को छोड़ने के मूल्य पर हो तो उसका कोई मूल्य नहीं है।पाप के वातावरण से दूर रहना मूल्यवान है चाहे इस मार्ग में कठिनाइयां सहन करनी पड़ें।अज्ञानता केवल निरक्षरता का नाम नही है। अनैतिक और बेलगाम इच्छाओं का पालन भी अज्ञानता ही है।