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    सूरए यूसुफ़, आयतें 34-36, (कार्यक्रम 384)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 34 की तिलावत सुनते हैं।فَاسْتَجَابَ لَهُ رَبُّهُ فَصَرَفَ عَنْهُ كَيْدَهُنَّ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ (34)ईश्वर ने यूसुफ़ की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उन्हें महिलाओं की चालों से दूर रखा। निसंदेह वह सबकी सुनने वाला और सबसे अधिक जानकार है। (12:34)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को ज़ुलैख़ा ने कारावास में डालने की धमकी दी और उन्होंने स्वयं भी ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उन्हें ज़ुलैख़ा की अनैतिक इच्छाओं से बचाने के लिए कुछ समय के लिए कारवास में भेज दे ताकि वे महिलाओं की चालों और वासनाओं से बच जाएं।यह आयत कहती है कि ईश्वर ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और उन्हें महिलाओं की चालों से मुक्ति दिला दी। रोचक बात यह है कि यूसुफ़ को कारावास में डालना, ज़ुलैख़ा की इच्छा थी जो उसके आदेश पर पूरी भी हुई किन्तु यह आयत कहती है कि उनका जेल में जाना, उनकी इच्छा थी जो ईश्वर ने पूरी की।मानो क़ुरआने मजीद यह कह रहा है कि यद्यपि ज़ुलैख़ा यूसुफ़ को कारवास में डालना चाहती थी किन्तु यदि ईश्वर की इच्छा न होती तो यह काम न होता। यह ईमान वालों के लिए बड़ा पाठ है कि शत्रुओं की चालें और हथकंडे, ईश्वर की इच्छा के बिना व्यवहारिक नहीं हो सकते। अतः उसी पर भरोसा करना चाहिए ताकि वह शत्रुओं के षड्यंत्रों को विफल बना दे।इस आयत से हमने सीखा कि यदि हम स्वयं को बुराइयों से दूर रखना चाहें तो ईश्वर उसका मार्ग प्रशस्त कर देता है और हमारी इच्छा की पूर्ति करता है।ज़ुलैख़ा यूसुफ़ को दंडित करने के लिए उन्हें कारावास में डलवा देना चाहती थी किन्तु हज़रत यूसुफ़ की दृष्टि में कारावास, पाप और ईश्वर की अवज्ञा से बचने का साधन था।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 35 की तिलावत सुनते हैं।ثُمَّ بَدَا لَهُمْ مِنْ بَعْدِ مَا رَأَوُا الْآَيَاتِ لَيَسْجُنُنَّهُ حَتَّى حِينٍ (35)फिर( यूसुफ़ की पवित्रता के) चिन्ह देखने के बाद उनके मन में विचार आया कि कुछ अवधि के लिए उन्हें कारावास में डाल दिया जाए। (12:35)अत्याचारी शासन व्यवस्था की विशेषताओं में से एक यह है कि हर बात शासकों और दरबारियों की वैध या अवैध इच्छाओं के आधार पर होती है और आम जनता को शासकों का दास समझा जाता है, इस प्रकार से कि शासकों को यह अधिकार होता है कि जनता के बारे में जो चाहें निर्णय करें। उनके निर्णय के सही या ग़लत होने की कोई बात ही नहीं होती।हज़रत यूसुफ़ और ज़ुलैख़ा के मामले में भी सब को ज्ञात हो गया कि दोष ज़ुलैख़ा का है यहां तक कि उसने यूसुफ़ के निर्दोष होने की बात लोगों के बीच स्वीकार भी की किन्तु अंततः मिस्र के शासक के दरबार वालों ने निर्णय किया कि शासक की पत्नी के सम्मान की रक्षा के लिए यूसुफ़ को कारावास भेजा जाए ताकि कुछ दिनों के बाद लोग इस विषय को भूल जाएं।इस आयत से हमने सीखा कि पवित्र होना और पवित्र बाक़ी रहना सरल कार्य नहीं है क्योंकि अत्याचारी शासनों में उसी को सबसे अधिक क्षति होती है जो सबसे अधिक पवित्र होता है।दूषित समाज में बुरे और व्यभिचारी लोग स्वतंत्र रहते हैं जबकि पवित्र लोगों को कारावास में डाला जाता है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 36 की तिलावत सुनते हैं।وَدَخَلَ مَعَهُ السِّجْنَ فَتَيَانِ قَالَ أَحَدُهُمَا إِنِّي أَرَانِي أَعْصِرُ خَمْرًا وَقَالَ الْآَخَرُ إِنِّي أَرَانِي أَحْمِلُ فَوْقَ رَأْسِي خُبْزًا تَأْكُلُ الطَّيْرُ مِنْهُ نَبِّئْنَا بِتَأْوِيلِهِ إِنَّا نَرَاكَ مِنَ الْمُحْسِنِينَ (36)और यूसुफ़ के साथ दो अन्य युवा भी कारावास में पहुंचे। उनमें से एक ने (यूसुफ़) से कहा कि मैंने स्वप्न में देखा कि शराब (के लिए अंगूर) निचोड़ रहा हूं। दूसरे ने कहा कि मैंने स्वप्न में देखा है कि मैं अपने सर पर रोटी उठाए हुए हूं और चिड़ियां उसमें से खा रही हैं। हमें इसका अर्थ बता हो कि हम तुम्हें भले लोगों में देखते हैं। (12:36)मिस्र के शासक के आदेश पर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को कारावास में डाल दिया गया। उनके साथ ही दो अन्य लोग भी कारावास में आए जिन्हें दरबार ने किसी अपराध के दंड स्वरूप कारावास में भेजा था। उन दोनों ने सपना देखा और अपने सपने का हज़रत यूसुफ़ से उल्लेख किया क्योंकि उन्होंने भी ज़ुलैख़ा की अनैतिक इच्छा और हज़रत यूसुफ़ की पवित्रता की बात सुनी थी और वे उन्हें भला आदमी समझते थे।जी हां, यदि भला मनुष्य कारावास में भी डाल दिया जाए तो वह बंदियों के भरोसे का पात्र बन जाता है और दूसरे उसे अपने रहस्य बताते हैं और वह बंदियों को भी प्रभावित कर सकता है।उन दो बंदियों के स्वप्न भी अलग अलग और विचित्र थे। अतः वे स्वयं भी समझ गए थे कि उनके स्वप्न अर्थपूर्ण और उनके कारावास के जीवन से संबंधित हैं। एक ने स्वयं को शराब बनाते हुए देखा था दूसरे ने पक्षियों को खाना खिलाते हुए।प्रत्येक दशा में जो बात महत्त्वपूर्ण है वह कारावास में हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का विशेष स्थान और सम्मान है कि जिसने उन्हें दूसरों से भिन्न बना दिया था और सभी लोग उन पर विशेष ध्यान देने लगे थे। इतिहास में वर्णित है कि वे कारावास में रोगियों का ध्यान रखते थे और दरिद्रों की सहायता करते थे। वे कारावास में थे किन्तु मनुष्य थे और उनके नैतिक गुण उनके पूरे अस्तित्व से प्रकाशमान थे।