islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए यूसुफ़, आयतें 37-40, (कार्यक्रम 385)

    सूरए यूसुफ़, आयतें 37-40, (कार्यक्रम 385)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 37 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ لَا يَأْتِيكُمَا طَعَامٌ تُرْزَقَانِهِ إِلَّا نَبَّأْتُكُمَا بِتَأْوِيلِهِ قَبْلَ أَنْ يَأْتِيَكُمَا ذَلِكُمَا مِمَّا عَلَّمَنِي رَبِّي إِنِّي تَرَكْتُ مِلَّةَ قَوْمٍ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَهُمْ بِالْآَخِرَةِ هُمْ كَافِرُونَ (37)(यूसुफ़ ने) कहा, जो भोजन तुम्हें दिया जाता है उसके आने से पूर्व ही मैं तुम्हें तुम्हारे सपनों का अर्थ बता दूंगा। यह उन बातों में से है जिसकी शिक्षा मुझे मेरे पालनहार ने दी है। मैंने उस जाति का पंथ छोड़ दिया है जो ईश्वर पर ईमान नहीं रखती और प्रलय का इन्कार करती है। (12:37)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम दरबार के दो अन्य बंदियों के साथ कारावास में पहुंचे। उन दोनों ने अलग अलग सपना देखा और हज़रत यूसुफ़ से उसका उल्लेख किया।यह आयत कहती है कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने पहले तो उनसे कहा कि वे उन्हें उनके सपनों का अर्थ बताएंगे ताकि वे उनकी बात सुनें और उन्होंने कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद के विषय के बारे में बात आरंभ की और कहा कि यदि ईश्वर ने मुझे यह विशेषता प्रदान की है कि मैं सपनों का अर्थ बता सकता हूं तो यह इस कारण है कि मैंने अनेकेश्वरवाद की रीति और कुफ़्र के पंथ को छोड़ दिया है और ईश्वर की छाया में आ गया हूं। यदि तुम यह देख रहे हो कि मैं तुम्हारे सपनों का अर्थ बता सकता हूं तो यह मेरी व्यक्तिगत विशेषता नहीं है बल्कि ईश्वर की कृपा है कि उसने मुझे यह ज्ञान सिखाया है। मेरा ईश्वर वही है जिस पर मेरी जाति वाले ईमान नहीं रखते तथा प्रलय का इन्कार करते हैं और संसार को ही अंत समझते हैं।रोचक बात यह है कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम जानते थे कि वे दोनों बंदी ईश्वर पर ईमान नहीं रखते और अनेकेश्वरवादी हैं किन्तु वे उन्हें संबोधित करके नहीं कहते कि तुम लोग ईश्वर पर ईमान नहीं रखते बल्कि कहते हैं कि मेरी जाति के लोग ऐसे हैं और उनका मार्ग सही नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि जो कोई कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद के अंधकारों से दूर हो जाता है ईश्वर उसके मन और हृदय को ज्ञान व तत्वदर्शिता के प्रकाश से उज्जवलित कर देता है और वह ऐसी वास्तविकताओं से अवगत हो जाता है जिन्हें दूसरे नहीं जान पाते।अवसरों से उत्तम ढंग से लाभ उठाना चाहिए। हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने कारावास में सांस्कृतिक और धार्मिक कार्य किया और अवसर से सही ढंग से लाभ उठाया।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 38 की तिलावत सुनते हैं।وَاتَّبَعْتُ مِلَّةَ آَبَائِي إِبْرَاهِيمَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ مَا كَانَ لَنَا أَنْ نُشْرِكَ بِاللَّهِ مِنْ شَيْءٍ ذَلِكَ مِنْ فَضْلِ اللَّهِ عَلَيْنَا وَعَلَى النَّاسِ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ (38)(यूसुफ़ ने) कहा, मैं अपने पूर्वजों इब्राहीम, इस्हाक़ और याक़ूब के (सच्चे) पंथ का अनुसरण करता हूं। किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराना हमें शोभा नहीं देता। यह हम पर और लोगों का अनुग्रह है किन्तु अधिकांश लोग कृतज्ञता नहीं दर्शाते। (12:38)कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद से दूर रहने के संबंध में अपनी बात को जारी रखते हुए हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि यदि मैंने अपनी जाति के मार्ग को छोड़ दिया है तो अपनी आंतरिक इच्छाओं का पालन नहीं करना चाहता हूं बल्कि मैंने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम जैसे महान पैग़म्बरों का मार्ग अपनाया है कि जो मेरे पूर्वज हैं। हज़रत इब्राहीम के वंशज होने के नाते हमें यह बात शोभा नहीं देती कि हम उनके मार्ग को छोड़ कर अनेकेश्वरवादियों के मार्ग पर चल पड़ें। इन पैग़म्बरों का अस्तित्व हम पर और सभी लोगों पर ईश्वर की कृपा है किन्तु खेद की बात यह है कि अधिकांश लोगों ने उनका मूल्य नहीं समझा और उनकी बातों पर ध्यान देने के बजाए अपने मार्ग पर चलते रहे।इस आयत से हमने सीखा कि पूर्वजों पर गर्व और उनका अनुसरण, ऐसी स्थिति में प्रिय कार्य हो सकता है जब उनका मार्ग सही और सच्चा रहा हो।पैग़म्बरों का अस्तित्व ईश्वर की महान कृपाओं में से एक है और उनका अनुसरण, इस कृपा के प्रति कृतज्ञता के समान है जबकि उनकी अवज्ञा एक प्रकार से कृतघ्नता है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 39 और 40 की तिलावत सुनते हैं।يَا صَاحِبَيِ السِّجْنِ أَأَرْبَابٌ مُتَفَرِّقُونَ خَيْرٌ أَمِ اللَّهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ (39) مَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِهِ إِلَّا أَسْمَاءً سَمَّيْتُمُوهَا أَنْتُمْ وَآَبَاؤُكُمْ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ بِهَا مِنْ سُلْطَانٍ إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ أَمَرَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ (40)(यूसुफ़ ने) कहा, हे कारावास के मेरे दोनों साथियों! अनेक ईश्वर बेहतर हैं या एकमात्र ईश्वर जो प्रभुत्वशाली है? (12:39) तुम ईश्वर के अतिरिक्त जिनकी उपासना करते हो वे उन नामों के अतिरिक्त कुछ नहीं जिनका नाम भी स्वयं तुमने और तुम्हारे पिताओं ने रखा है। ईश्वर ने उनके लिए कोई तर्क नहीं उतारा है। हुक्म अर्थात शासन का अधिकार केवल ईश्वर के लिए ही है। उसने आदेश दिया है कि तुम उसके अतिरिक्त किसी की उपासना न करो। यही सीधा और सही धर्म है किन्तु अधिकांश लोग नहीं जानते। (12:40)कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद से दूरी व एकेश्वरवाद के अनुसरण के संबंध में अपनी बात को जारी रखते हुए हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम कारावास के अपने दोनों साथियों को संबोधित करते हुए कहते हैं, तुम स्वंय ही एकेश्वरवाद और अनेकेश्वरवाद की तुलना करो। अनेकेश्वरवादी इस संसार में हर वस्तु के लिए पालनहार बना देते हैं और फिर उसे प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।जबकि ईमान वाले केवल अनन्य ईश्वर पर ईमान रखते हैं कि जो पूरे ब्रह्ममांड का स्वामी है। हर वस्तु पर उसका नियंत्रण है और ईमान वाले केवल उसी को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, तो अब बताओ कि इनमें से कौन सा पंथ उत्तम है?अनेकेश्वरवादियों ने हर वस्तु के लिए एक देवता बना रखा है और वे कहते हैं कि यह वर्षा का देवता है और वह वायु का देवता है जबकि यह सब काल्पनिक बातें हैं। यह ऐसे शीर्षक हैं जिनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। ये केवल नाम हैं कि जो लोगों की ज़बान पर आते हैं। न किसी बाहरी वास्तविकता ने और न ही किसी बौद्धिक तर्क ने इस प्रकार के देवताओं के अस्तित्व की पुष्टि की है बल्कि इसके विपरीत ईश्वर ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि उसके अतिरिक्त किसी की उपासना न की जाए।इन आयतों से हमने सीखा कि आस्था संबंधी समस्याओं को प्रश्न और तुलना के रूप में प्रस्तुत करना, लोगों को धर्म की ओर बुलाने की शैलियों में से एक है।मनुष्य की आस्थाओं को, पूर्वजों की रीतियों के अंधे अनुसरण पर नहीं बल्कि बौद्धिक अथवा ईश्वरीय तर्क पर आधारित होना चाहिए।