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    सूरए यूसुफ़, आयतें 4-6, (कार्यक्रम 375)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या चार की तिलावत सुनते हैं।إِذْ قَالَ يُوسُفُ لِأَبِيهِ يَا أَبَتِ إِنِّي رَأَيْتُ أَحَدَ عَشَرَ كَوْكَبًا وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ رَأَيْتُهُمْ لِي سَاجِدِينَ (4)जब यूसुफ़ ने अपने पिता से कहा कि हे मेरे पिता! मैंने सपने में ग्यारह तारों तथा सूर्य और चंद्रमा को देखा है और देखा कि वे मुझे सज्दा कर रहे हैं। (12: 4)क़ुरआने मजीद में हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की घटना एक ऐसे स्वप्न से आरंभ होती है जिसमें उन्हें उज्जवल भविष्य की शुभ सूचना दी गई है। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम कहते हैं कि स्वप्न तीन प्रकार के होते हैं, एक ईश्वर की ओर से शुभ सूचना होती है, दूसरा शैतान की ओर से दुख होता है और तीसरा मनुष्य की प्रतिदिन की समस्याएं होती हैं जिन्हें वह स्वप्न में देखता है और दुखी होता है।अलबत्ता ईश्वर के प्रिय और पवित्र बंदों के स्वप्न सच्चे होते हैं अर्थात उनके लिए वे ईश्वर के संदेश होते हैं जैसे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने सपने में देखा था कि वे ईश्वर के आदेश से अपने पुत्र इस्माईल की बलि चढ़ा रहे हैं। इसी प्रकार ऐसे लोगों के स्वप्न ऐसी वास्तविकताओं का उल्लेख करते हैं जो भविष्य में घटने वाली होती हैं जैसे हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का यही स्वप्न जिसके अनुसार वे बहुत ही उच्च स्थान तक पहुंचे और उनके ग्यारह भाइयों तथा माता पिता ने उनकी प्रशंसा की।इस आयत से हमने सीखा कि स्वप्न, वास्तविकताओं को समझने का एक मार्ग है जो कुछ लोगों को प्राप्त होता है।माता-पिता को अपने बच्चों के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करना चाहिए ताकि बच्चे भी उन पर भरोसा करें और उन्हें अपनी समस्याओं से अवगत कराएं।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या पांच की तिलावत सुनते हैं।قَالَ يَا بُنَيَّ لَا تَقْصُصْ رُؤْيَاكَ عَلَى إِخْوَتِكَ فَيَكِيدُوا لَكَ كَيْدًا إِنَّ الشَّيْطَانَ لِلْإِنْسَانِ عَدُوٌّ مُبِينٌ (5)यूसुफ़ के पिता ने कहा कि हे मेरे पुत्र! अपने स्वप्न का अपने भाइयों से उल्लेख न करना कि वे तुम्हारे विरुद्ध षड्यंत्र करने लगेंगे। निश्चित रूप से शैतान, मनुष्य का खुला हुआ शत्रु है। (12: 5)हज़रत यूसुफ़ के पिता हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम, ईश्वरीय पैग़म्बर थे, वे समझ गए कि उनके पुत्र का स्वप्न एक साधारण बात नहीं है बल्कि भविष्य में उसकी महानता और परिपूर्णता का सूचक है। अतः उन्होंने हज़रत यूसुफ़ से कहा कि वे अपने स्वप्न का उल्लेख अपने भाइयों से न करें क्योंकि संभव है कि उनके भीतर ईर्ष्या की भावना उत्पन्न हो जाए और वे उन्हें कोई क्षति पहुंचा दें।मूल रूप से बच्चों के बीच ईर्ष्या ऐसी बात है जिसकी ओर से माता पिता और संतान सभी को सचेत रहना चाहिए। माता पिता को एक बच्चे की विशेषता का उल्लेख करके दूसरे बच्चों के बीच ईर्ष्या की भूमि प्रशस्त नहीं करना चाहिए। यही कारण था कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने अपने भाइयों से छिपकर अपने पिता को अपने स्वप्न के बारे में बताया और उन्होंने भी उनसे कहा कि वे इस बारे में अपने भाइयों को कुछ न बताएं।इस आयत से हमने सीखा कि जिस प्रकार से एक सपने के बारे में दूसरों को बताने से संकट उत्पन्न हो सकता है उसी प्रकार जागते में भी जो बातें हम देखते हैं उनका हर स्थान पर और हर किसी से उल्लेख नहीं करना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि इससे संकट उत्पन्न हो जाए।घर और समाज के वातावरण में ईर्ष्या का ख़तरा, एक गंभीर विषय है और बहुत सी बातों को छिपाकर अनेक समस्याओं को रोका जा सकता है।,आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या छह की तिलावत सुनते हैं।وَكَذَلِكَ يَجْتَبِيكَ رَبُّكَ وَيُعَلِّمُكَ مِنْ تَأْوِيلِ الْأَحَادِيثِ وَيُتِمُّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكَ وَعَلَى آَلِ يَعْقُوبَ كَمَا أَتَمَّهَا عَلَى أَبَوَيْكَ مِنْ قَبْلُ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْحَاقَ إِنَّ رَبَّكَ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (6)और इस प्रकार तुम्हारा पालनहार तुम्हारा चयन कर लेगा और सपनों की व्याख्या का ज्ञान तुम्हें सिखा देगा अपनी विभूतियां तुम पर और याक़ूब के परिवार पर पूरी कर देगा जिस प्रकार से कि उसने इससे पूर्व तुम्हारे पिताओं इब्राहीम और इसहाक़ पर अपनी विभूतियां पूरी कर दी थीं। निश्चित रूप से तुम्हारा पालनहार अत्यंत ज्ञानी और तत्वदर्शी है। (12: 6)हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम अपने पुत्र को नसीहत जारी रखते हुए कहते हैं कि भविष्य में ईश्वर तुम्हें अपना पैग़म्बर बनाएगा और इस प्रकार हमारे परिवार पर अपनी विभूतियों को पूरा कर देगा। इसके अतिरिक्त वह तुम्हें सपनों की व्याख्या का ज्ञान भी प्रदान करेगा ताकि तुम लोगों को सपनों की वास्तविकताओं से अवगत करा सको।हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम की यह भविष्यवाणी, ईश्वरीय ज्ञान के आधार पर थी कि जो ईश्वर अपने पैग़म्बरों को प्रदान करता है और उन्हें भविष्य की बातों से अवगत करा देता है। इसके अतिरिक्त वे अपने पुत्र के स्वप्न से भी यह बात समझ सकते थे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर मनुष्यों के बीच से सबसे उत्तम लोगों को अपनी पैग़म्बरी के लिए चुनता है और उन्हें आवश्यक ज्ञान प्रदान करता है ताकि वे लोगों के मार्गदर्शन का माध्यम बनें।अपने परिवार में पैग़म्बरी जारी रखने के संबंध में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की प्रार्थना को ईश्वर ने स्वीकार कर लिया था और उनके वंश में हज़रत इसहाक़ और हज़रत इस्माईल जैसे पैग़म्बर जन्में जिससे इस परिवार की पवित्रता का पता चलता है।