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    सूरए यूसुफ़, आयतें 50-52, (कार्यक्रम 388)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या पचास की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ الْمَلِكُ ائْتُونِي بِهِ فَلَمَّا جَاءَهُ الرَّسُولُ قَالَ ارْجِعْ إِلَى رَبِّكَ فَاسْأَلْهُ مَا بَالُ النِّسْوَةِ اللَّاتِي قَطَّعْنَ أَيْدِيَهُنَّ إِنَّ رَبِّي بِكَيْدِهِنَّ عَلِيمٌ (50)और मिस्र के शासक ने कहा, (यूसुफ़ को) मेरे पास लाओ, तो जब दूत उनके पास आया तो यूसुफ़ ने कहा, अपने स्वामी के पास लौट जाओ और उससे पूछो कि उन महिलाओं का क्या मामला है जिन्होंने अपने हाथ काट लिए थे? निश्चित रूप से मेरा पालनहार उनके छल से भलिभांति अवगत है। (12:50)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से मिस्र के शासक के स्वप्न की व्याख्या करने को कहा गया तो उन्होंने बिना किसी शर्त के यह काम कर दिया बल्कि सूखे और अकाल से बचाव का मार्ग भी बताया किन्तु जब शासक ने उन्हें अपने पास बुलाया तो उन्होंने यह बात स्वीकार नहीं की और कहा कि उन्हें कारावास में डाले जाने का कारण स्पष्ट होना चाहिए। इसी कारण वे उन महिलाओं के बारे में जांच के लिए कहते हैं जिन्होंने छल कपट द्वारा उन्हें देखने के लिए बुलाया था।हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का यह व्यवहार शायद इस कारण था कि उस घटना को वर्षों बीत चुके थे और संभवतः मिस्र का शासक और उसके दरबार के लोग यह बात भूल चुके थे और सोच रहे थे कि वस्तुतः यूसुफ़ दोषी थे, इसी कारण वे कारावास में हैं। इसके अतिरिक्त हज़रत यूसुफ़ नहीं चाहते थे कि उनके ऊपर उपकार किया जाए और राजकीय क्षमा के माध्यम से वे कारवास से बाहर आएं बल्कि वे मिस्र के शासक को यह समझाना चाहते थे कि उसके शासन में निर्दोष लोगों पर कितना अन्याय व अत्याचार हो रहा है।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम का कथन है कि मुझे हज़रत यूसुफ़ के संयम पर आश्चर्य होता है कि जब मिस्र के शासक को अपने स्वप्न की व्याख्या के लिए उनकी आवश्यकता हुई तो उन्होंने यह नहीं कहा कि जब तक मुझे रिहा नहीं किया जाता, मैं यह काम नहीं करूंगा। और जब उन्हें रिहा किया जाने लगा तो उन्होंने कहा कि जब तक मेरा निर्दोष होना सिद्ध नहीं हो जाता, मैं कारावास से बाहर नहीं आऊंगा।इस आयत से हमने सीखा कि सरकार के विद्वानों के विचारों से लाभ उठाना चाहिए चाहे वे कारावास में ही क्यों न हों, अलबत्ता इसी के साथ उनकी रिहाई का मार्ग भी प्रशस्त करना चाहिए।किसी भी मूल्य पर रिहाई मूल्यवान नहीं होती, सम्मान की बहाली और निर्दोष सिद्ध होना, रिहाई से भी अधिक मूल्यवान है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 51 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ مَا خَطْبُكُنَّ إِذْ رَاوَدْتُنَّ يُوسُفَ عَنْ نَفْسِهِ قُلْنَ حَاشَ لِلَّهِ مَا عَلِمْنَا عَلَيْهِ مِنْ سُوءٍ قَالَتِ امْرَأَةُ الْعَزِيزِ الْآَنَ حَصْحَصَ الْحَقُّ أَنَا رَاوَدْتُهُ عَنْ نَفْسِهِ وَإِنَّهُ لَمِنَ الصَّادِقِينَ (51)मिस्र के शासक ने (महिलाओं से) कहा, जब तुमने यूसुफ़ पर डोरे डाले तो तुम्हारा क्या मामला था? उन्होंने कहा, धन्य है ईश्वर, हमने तो उसमें कोई बुराई नहीं पाई। (इसी बीच) मिस्र के शासक की पत्नी बोली, अब सच बात सामने आ गई है। वह मैं ही थी जिसने उस पर डोरे डाले थे और निसंदेह वह सच्चों में से है। (12:51)क़ुरआने मजीद में ईश्वर की एक परंपरा, पवित्रता एवं ईश्वरीय भय के कारण कठिन मामलों में राहत दिलाने पर आधारित है। मिस्र के शासक की पत्नी, जिसने हज़रत यूसुफ़ पर यह आरोप लगाया था कि वे उस पर बुरी दृष्टि रखते थे जिसके कारण उन्हें कारावास में जाना पड़ा था, आज अपनी ज़बान से उनके सच्चे होने की बात स्वीकार कर रही है। उसकी इसी स्वीकारोक्ति के कारण हज़रत यूसुफ़ की रिहाई का मार्ग प्रशस्त हुआ और वे सम्मान के साथ कारावास से बाहर आए।यह ईश्वर का इरादा है कि वास्तविक दोषी अपने अपराध को स्वीकार करता है ताकि सबके समक्ष हज़रत यूसुफ़ का निर्दोष होना सिद्ध हो जाए, यद्यपि कुछ वास्तविकताओं के स्पष्ट होने के लिए समय बीतने की आवश्यकता होती है।इस आयत से हमने सीखा कि सत्य, सदैव छिपा नहीं रहता, इसी कारण झूठ सदैव बाक़ी नहीं रहता।सामाजिक व नैतिक मामलों में पवित्रता ऐसी बात है जिसके मूल्य को व्यभिचारी लोग भी स्वीकार करते हैं।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 52 की तिलावत सुनते हैं।ذَلِكَ لِيَعْلَمَ أَنِّي لَمْ أَخُنْهُ بِالْغَيْبِ وَأَنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي كَيْدَ الْخَائِنِينَ (52)(यूसुफ़ ने कहा कि) मैंने यह बात इसलिए कही कि (मिस्र का शासक) जान ले कि मैंने एकांत में उसके साथ विश्वासघात नहीं किया है और निश्चित रूप से ईश्वर विश्वासघात करने वालों की चालों को सफल नहीं होने देता। (12:52)इस आयत के संबंध में व्याख्याकारों के बीच दो मत पाये जाते हैं। एक गुट का मानना है कि यह कथन मिस्र के शासक की पत्नी ज़ुलैख़ा का है जो यह कहना चाहती है कि यद्यपि मैं पाप करना चाहती थी किन्तु ऐसा हो नहीं सका। किन्तु अधिकांश व्याख्याकारों का मानना है कि यह कथन हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का है जो यह कहना चाहते हैं कि यदि मैंने कारावास से अपनी स्वतंत्रता के लिए महिलाओं के विषय के स्पष्ट होने की शर्त लगाई थी तो उसका कारण यह था कि मिस्र के शासक और उसकी पत्नी को यह ज्ञात हो जाए कि मैंने अतीत में कोई विश्वासघात नहीं किया था और मैं निर्दोष हूं। मैं पिछली बातों को फिर से सामने लाकर मिस्र के शासक की पत्नी से प्रतिशोध नहीं लेना चाहता था बल्कि मैं अपने सम्मान की बहाली का इच्छुक था ताकि मेरे संबंध में पाई जाने वाली भ्रांतियां समाप्त हो जाएं।रोचक बात यह है कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम इस मामले के स्पष्ट होने को ईश्वर से संबंधित बताते हैं ताकि शासक का ध्यान इस ओर आकृष्ट करें कि घटनाओं के संबंध में ईश्वर की इच्छा की निर्णायक भूमिका होती है।इस आयत से हमने सीखा कि किसी के साथ भी विश्वासघात अप्रिय है चाहे वह अत्याचारी और काफ़िर ही क्यों न हो।वास्तविक ईमान का चिन्ह, एकांत में पाप से बचना है।यदि हम पवित्र हों तो ईश्वर इस बात की अनुमति नहीं देगा कि अपवित्र लोग हमारे सम्मान को ठेस पहुंचाएं बल्कि वे स्वयं ही अपमानित होंगे और हमारी पवित्रता सिद्ध हो जाएगी।