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    सूरए यूसुफ़, आयतें 53-55, (कार्यक्रम 389)

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    आइये सबसे पहले सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 53 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا أُبَرِّئُ نَفْسِي إِنَّ النَّفْسَ لَأَمَّارَةٌ بِالسُّوءِ إِلَّا مَا رَحِمَ رَبِّي إِنَّ رَبِّي غَفُورٌ رَحِيمٌ (53)और मैं कदापि अपने आपको मुक्त नहीं करता क्योंकि निश्चित रूप से मन सदैव ही बुराई पर उकसाता है सिवाय इसके कि मेरा पालनहार दया करे। निसंदेह मेरा पालनहार अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (12:53)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने कारावास से अपनी रिहाई के लिए अपने निर्दोष सिद्ध होने की शर्त रखी थी। मिस्र के शासक की पत्नी ज़ुलैख़ा ने शासक के समक्ष अपने पाप को स्वीकार किया और यूसुफ़ को निर्दोष बताया।यह आयत एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु की ओर संकेत करती है और वह यह कि मनुष्य की आंतरिक इच्छाएं, उसे बुराइयों की ओर बुलाती रहती हैं और उसे पाश्विक व्यवहारों पर उकसाती हैं जिनका बुद्धि, तर्क अथवा सामाजिक नियमों से कोई संबंध नहीं है बल्कि परिणामों पर ध्यान दिए बिना केवल व्यक्तिगत कामनाओं की पूर्ति के लिए ऐसे कर्म किए जाते हैं।इस बीच वह एकमात्र वस्तु जो बुद्धि पर आंतरिक इच्छाओं की विजय के मार्ग में बाधा बनती है, ईश्वर की दया व कृपा है कि जो मनुष्य को ख़तरों और बुराइयों से सुरक्षित रखती है और मनुष्य को यह अनुमति नहीं देती कि जो कुछ उसके मन में आए वह करता चला जाए। स्वाभाविक है कि वही व्यक्ति इस दया व कृपा का पात्र बनेगा जो ईश्वर पर ईमान रखता हो और सदैव उससे सहायता चाहता हो।क़ुरआने मजीद में मनुष्य के मन के लिए कई चरणों का उल्लेख हुआ। पहला चरण उस मन का है जो पाश्विक चरणों में है और मनुष्य को पाश्विक व्यवहार का आदेश देता रहता है। इसे नफ़से अम्मारा कहा जाता है। इसके ऊपर वाले चरण में नफ़से लव्वामा अर्थात धिक्कारने वाला मन होता है जो मनुष्य की ग़लतियों के लिए उसे धिक्कारता रहता है और तौबा व प्रायश्चित का मार्ग प्रशस्त करता है। और सबसे ऊपरी चरण में नफ़से मुतमइन्ना अर्थात संतुष्ट मन होता है। इस चरण तक केवल ईश्वर के पैग़म्बर और उसके प्रिय बंदे ही पहुंच पाते हैं। कठिन से कठिन स्थिति में ईश्वर के प्रति उनकी आशा और संतोष में कमी नहीं आती और वे ईश्वरीय परीक्षाओं में सफल रहते हैं।इस घटना में भी हज़रत यूसुफ़ अपने को निर्दोष सिद्ध करने के पश्चात, घमंड में ग्रस्त होने से बचने के लिए कहते हैं कि मैं भी एक मनुष्य हूं और मेरा मन भी मुझे उसकी बात के लिए उकसाता था जो ज़ुलैख़ा चाहती थी किन्तु यह ईश्वर की कृपा थी जिसने मुझे मुक्ति दिलाई और पाश्विक वासनाओं में ग्रस्त नहीं होने दिया।इस आयत से हमने सीखा कि कभी भी स्वयं को ग़लतियों और भटकाव से सुरक्षित नहीं समझना चाहिए और न ही कभी पवित्रता के लिए अपनी सराहना करनी चाहिए कि सदैव ही ख़तरा सामने होता है।मनुष्य के समक्ष चाहे जितने भी ख़तरे हों उसे ईश्वर की दया व कृपा की ओर से निराश नहीं होना चाहिए कि वह अत्यंत क्षमाशील और दयावान है।आइये अब सूरए युसुफ़ की आयत संख्या 54 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ الْمَلِكُ ائْتُونِي بِهِ أَسْتَخْلِصْهُ لِنَفْسِي فَلَمَّا كَلَّمَهُ قَالَ إِنَّكَ الْيَوْمَ لَدَيْنَا مَكِينٌ أَمِينٌ (54)मिस्र के शासक ने कहा, यूसुफ़ को मेरे पास लाओ ताकि मैं उसे अपना विशेष सलाहकार बनाऊं। तो जब उसने बात की तो कहा, आज हमारे निकट तुम्हारा बहुत उच्च स्थान है और एक अमानतदार व्यक्ति हो। (12:54)जब मिस्र के शासक ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम और ज़ुलैख़ा की वार्ता सुनी और उसकी दृष्टि में हज़रत यूसुफ़ का निर्दोष और साथ ही महान होना सिद्ध हो गया तो उसने उन्हें अपने पास बुलाया और देश तथा सरकार के बारे में उसने उन्हें अपना निजी सलाहकार बना लिया ताकि देश के सभी अधिकारियों को यह बात समझ में आ जाए कि उन्हें हज़रत यूसुफ़ के आदेशों का पालन और उनका सम्मान करना चाहिए।मिस्र के शासक और हज़रत यूसुफ़ के वार्तालाप से दो बातें सिद्ध हो गईं, एक हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की महानता और दूसरे उनकी अमानतदारी और ये दोनों विशेषताएं सरकार के संचालन में बहुत प्रभावी होती हैं। जब कभी महानता और अमानतदारी एकत्रित हो जाती हैं, समाज की प्रगति और योग्यताओं के निखरने का कारण बनती हैं और जहां कहीं इनमें से एक का आभाव होता है तो समस्याएं और कठिनाइयां उत्पन्न होने लगती हैं।इस आयत से हमने सीखा कि महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के लिए लोगों के अनुभव के साथ दायित्व निर्वाह की उनकी क्षमता भी महत्त्वपूर्ण है। केवल पवित्रता, सच्चाई और अमानतदारी पर्याप्त नहीं है बल्कि शक्ति और योग्यता भी आवश्यक है।सच्चा और अमानतदार व्यक्ति सभी की दृष्टि में सम्मानीय होता है, चाहे निर्धन हो या धनवान, काफ़िर हो या ईमान वाला।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 55 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ اجْعَلْنِي عَلَى خَزَائِنِ الْأَرْضِ إِنِّي حَفِيظٌ عَلِيمٌ (55)(यूसुफ़ ने) कहा, मुझे मिस्र की धरती के ख़ज़ानों का अधिकारी बना दो कि निसंदेह मैं जानकार रक्षक हूं। (12:55)जब मिस्र के शासक ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को अपने पास बुलाया और अपना निजी सलाहकार नियुक्त किया तथा उन्हें एक अमानतदार और योग्य व्यक्ति घोषित किया तो उन्होंने प्रस्ताव दिया कि उन्हें सरकारी ख़ज़ाने की देखभाल का दायित्व सौंपा जाए और उन्हें स्वयं को इस कार्य के लिए योग्य बताया।मिस्र के शासक ने जो स्वप्न देखा था उसके आधार पर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम जानते थे कि पहले सात वर्षों तक अकाल पड़ेगा और उन्हें अनाज एकत्रित करना होगा जबकि दूसरे सात वर्षों में एक सटीक कार्यक्रम के अंतर्गत उन्हें लोगों के बीच अनाज बांटना था। हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम इस कार्य में दक्ष थे अतः उन्होंने इस दायित्व को निभाने के लिए अपनी तत्परता की घोषणा की।वस्तुतः हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने कोई सरल और साधारण नहीं बल्कि एक कठिन और ख़तरनाक दायित्व संभालने का प्रस्ताव दिया था उन्हें पद और परिस्थिति की चाह नहीं बल्कि वे तो अकाल के दौरान लोगों को राहत पहुंचाने के विचार में थे। जैसा कि इतिहास में वर्णित है कि हज़रत यूसुफ़ ने दूसरे सात वर्षों की समाप्ति पर मिस्र के शासक से कहा कि मेरे पास जो कुछ संपत्ति और सरकारी माल है वह मैं सब का सब वापस देता हूं। सत्ता मेरे लिए लोगों की मुक्ति का साधन थी और मैं तुम से भी कहता हूं कि लोगों के साथ न्याय का व्यवहार करो।इस आयत से हमने सीखा कि जहां आवश्यकता हो अपनी योग्यता का वर्णन करना चाहिए तथा संवेदनशील दायित्वों को अपने हाथ में लेने के लिए स्वेच्छा से आगे बढ़ना चाहिए।दायित्व और पद प्रदान करने के संबंध में जाति, क़बीला, राष्ट्रीयता और भाषा मानदंड नहीं बल्कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात योग्यता व क्षमता है। हज़रत यूसुफ़ मिस्र के नहीं थे और एक दास के रूप में मिस्र पहुंचे थे किन्तु मिस्र के शासक ने उन्हें सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपा था।