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    सूरए यूसुफ़, आयतें 56-60, (कार्यक्रम 390)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या छप्पन और सत्तावन की तिलावत सुनते हैं।وَكَذَلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِي الْأَرْضِ يَتَبَوَّأُ مِنْهَا حَيْثُ يَشَاءُ نُصِيبُ بِرَحْمَتِنَا مَنْ نَشَاءُ وَلَا نُضِيعُ أَجْرَ الْمُحْسِنِينَ (56) وَلَأَجْرُ الْآَخِرَةِ خَيْرٌ لِلَّذِينَ آَمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ (57)और इस प्रकार हमने यूसुफ़ को मिस्र की धरती में सत्ता प्रदान की कि वे उसमें जहां चाहें रहें। हम जिसे चाहते हैं अपनी दया का पात्र बनाते हैं और हम भलाई करने वालों के बदले को व्यर्थ नहीं जाने देते। (12:56) और जो लोग ईमान लाए और ईश्वर से डरते रहे तो निसंदेह उनके लिए प्रलय का प्रतिफल सबसे उत्तम है। (12:57)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि मिस्र के शासक ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को अपने पास बुलाया और उन्हें अपना विशेष सलाहकार नियुक्त किया। ये आयतें कहती हैं कि यह मिस्र का शासक नहीं था जिसने यूसुफ़ के लिए इस प्रकार का मार्ग प्रशस्त किया था बल्कि ईश्वर ने यूसुफ़ की पवित्रता और भलाई का प्रतिफल उन्हें देना चाहा था इसीलिए उसने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी कि यूसुफ़ ऐसे स्थान तक पहुंच गए कि सरकारी मामलों में जिस प्रकार का चाहें निर्णय करें।आगे चलकर आयत कहती है कि यह ईश्वर की परंपरा है कि वह भले कर्म करने वालों को इसी संसार में प्रतिफल देता है और उन्हें अपनी विशेष दया का पात्र बनाता है। इसके अतिरिक्त प्रलय में उनका प्रतिफल सुरक्षित रहता है कि जो सांसारिक प्रतिफल से कहीं अधिक व उत्तम होता है। अलबत्ता शर्त यह है कि भला कर्म वास्तविक ईमान और ईश्वर से भय के साथ हो अन्यथा ईश्वर पर ईमान के बिना किए गए भले कर्म का केवल इसी संसार में प्रतिफल मिलता है।इन आयतों से हमने सीखा कि भले लोगों को जो ईश्वरीय भय रखते हैं सम्मानित करना ईश्वर की परंपरा है चाहे अपवित्र लोगों और अत्याचारियों को यह बात बुरी ही क्यों न लगे और वे उनका अनादर ही क्यों न करें।ईश्वरीय विचारधारा में हर कर्म का प्रतिफल मिलता है अतः भले कर्म करने वालों को चिंतित नहीं होना चाहिए।ईश्वरीय पारितोषिक, सांसारिक पारितोषिक से कहीं उच्च होता है क्योंकि वह किसी समय अथवा स्थान तक सीमित नहीं होता और नहीं उसमें कोई दोष होता है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 58 की तिलावत सुनते हैं।وَجَاءَ إِخْوَةُ يُوسُفَ فَدَخَلُوا عَلَيْهِ فَعَرَفَهُمْ وَهُمْ لَهُ مُنْكِرُونَ (58)और (अकाल के कारण) यूसुफ़ के भाई (खाद्य सामग्री लेने के लिए मिस्र) आए और उनके पास पहुंचे। उन्होंने उन्हें पहचान लिया जबकि वे उन्हें नहीं पहचान पाए। (12:58)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्साम की भविष्यवाणी के अनुसार सात वर्षों तक निरंतर वर्षा हुई और लोग हर प्रकार से संपन्न रहे किन्तु उसके बाद सात वर्षों तक अकाल पड़ा और अकाल का प्रभाव फ़िलिस्तीन और कन्आन तक पहुंचा।हज़रत याक़ूब ने अपने पुत्रों को अनाज के लिए मिस्र भेजा। वे मिस्र के वित्त विभाग के प्रमुख अर्थात हज़रत यूसुफ़ के पास पहुंचे। वे तुरंत अपने भाइयों को पहचान गए किन्तु वे लोग उन्हें पहचान न सके क्योंकि हज़रत यूसुफ़ को कुएं में डालने की घटना को वर्षों बीत चुके थे और उन्हें उनके जीवित होने की अपेक्षा नहीं थी। किन्तु समय चक्र ने ऐसा काम किया कि वही यूसुफ़ मिस्र के शासक के बाद उस देश के सबसे बड़े अधिकारी बन चुके थे और उनके घमंडी और अहंकारी भाई उनके समक्ष बड़े अपमान से खड़े होकर उनसे अन्न मांग रहे थे।हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने भी उचित नहीं समझा कि इन परिस्थितियों में उन्हें अपना परिचय दें अतः उन्होंने एक अज्ञात व्यक्ति की भांति उनके साथ व्यवहार किया और आदेश दिया कि दूसरों की भांति उन्हें भी परिजनों की संख्या के अनुसार गेहूं दिया जाए।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान का दायित्व मनुष्य से मांग करता है कि वह वंचित और अकाल ग्रस्त क्षेत्रों के संबंध में संवेदनशील रहे और उनकी सहायता करे चाहे वह स्वयं किसी अन्य क्षेत्र का ही क्यों न हो और वहां के लोग उसके धर्म के न हों।कठिन और संकटमयी स्थिति में सभी लोगों को एक दृष्टि से देखना चाहिए। न्याय की मांग है कि संभावनाओं की सही वितरण शैली अपनाकर सभी को एक समान संभावनाएं प्रदान की जानी चाहिए।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 59 और 60 की तिलावत सुनते हैं।وَلَمَّا جَهَّزَهُمْ بِجَهَازِهِمْ قَالَ ائْتُونِي بِأَخٍ لَكُمْ مِنْ أَبِيكُمْ أَلَا تَرَوْنَ أَنِّي أُوفِي الْكَيْلَ وَأَنَا خَيْرُ الْمُنْزِلِينَ (59) فَإِنْ لَمْ تَأْتُونِي بِهِ فَلَا كَيْلَ لَكُمْ عِنْدِي وَلَا تَقْرَبُونِ (60)और जब यूसुफ़ ने उनका सामान तैयार कर दिया तो उनसे कहा कि अगली बार अपने पिता के पुत्र को भी मेरे पास लाना। क्या तुम नहीं देखते कि मैं सही ढंग से नाप तोल करता हूं और मैं सबसे अच्छा मेज़बान हूं। (12:59) और यदि तुम उसे मेरे पास नहीं लेकर आए तो न तो तुम्हें कोई सामान मिलेगा और न ही तुम मुझ से निकट हो पाओगे। (12:60)जैसा कि इतिहास में वर्णित है कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने अकाल के समय अनाज लेते हुए उनसे कहा कि पिता की ओर से हमारा एक अन्य भाई भी है। हज़रत यूसुफ़ ने कहा कि यदि तुम्हें उसका भाग चाहिए तो उसे मेरे पास लेकर आओ। उन्होंने कहा कि हमारे पिता वृद्ध हो चुके हैं और हमने उसे अपने पिता की सेवा के लिए उनके पास छोड़ दिया है। हज़रत यूसुफ़ ने कहा कि इस बार मैं तुम्हें उसका और तुम्हारे पिता का भी संपूर्ण भाग दिए देता हूं किन्तु यदि अगली बार तुम अनाज लेना चाहो तो तुम्हें उसे साथ लाना होगा अन्यथा मैं तुम्हें न तो उसका भाग दूंगा और न ही तुम्हारा भाग।ये आयतें अकाल के समय लोगों के बीच अनाज बांटने में हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की सीधी उपस्थिति और देख रेख का उल्लेख करती हैं जिससे लोगों के अधिकारों पर भरपूर ढंग से ध्यान दिए जाने और दायित्व पालन का पता चलता है। खेद की बात यह है कि आजकल की सरकारें और अधिकारी इस बात पर ध्यान नहीं देते और अधिकारी केवल आदेश देते हैं, मामलों की देख रेख नहीं करते।इन आयतों से हमने सीखा कि सत्ता का ग़लत लाभ उठाते हुए प्रतिशोध लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए। हज़रत यूसुफ़ ने अपने अत्याचारी भाइयों को अनाज दिया और उनसे प्रतिशोध नहीं लिया। उन्होंने अपने भाइयों का सत्कार किया कि जो पैग़म्बरों की विशेषता है।क़ानून लागू करने में साधारण लोगों और अपने परिजनों में अंतर नहीं रखना चाहिए बल्कि सभी को समान दृष्टि से देखना चाहिए।पूरी दृढ़ता के साथ क़ानून लागू करना चाहिए और इसमें प्रेम और स्नेह आड़े नहीं आना चाहिए।