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    सूरए यूसुफ़, आयतें 61-65, (कार्यक्रम 391)

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    आइये पहले सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 61 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا سَنُرَاوِدُ عَنْهُ أَبَاهُ وَإِنَّا لَفَاعِلُونَ (61)उन्होंने कहा, हम उसके पिता से वार्ता (उन्हें सहमत करने का प्रयास) करेंगे और हमें यह काम तो करना ही है। (12:61)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाई अनाज लेने के लिए उनके पास आए तो उन्हें पहचान नहीं पाए और कहने लगे, हमारे वृद्ध पिता और छोटा भाई नहीं आ सके हैं अतः हमें उनका भाग भी दिया जाए। हज़रत यूसुफ़ ने स्वीकार कर लिया किन्तु उनसे कहा कि अगली बार जब तुम अनाज लेने के लिए आना तो अपने छोटे भाई को भी साथ लाना अन्यथा तुम्हें उसका भाग नहीं दिया जाएगा।यह आयत कहती है कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने यह बात स्वीकार कर ली और कहा कि यद्यपि हमारे पिता उसे हमारे साथ भेजने के लिए तैयार नहीं होंगे किन्तु हम उन्हें तैयार करने का प्रयास करेंगे। वे भलिभांति जानते थे कि उनके पिता हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम हज़रत यूसुफ़ और उनके छोटे भाई बिनयामिन से उनकी ईर्ष्या से अवगत हैं और हज़रत यूसुफ़ की घटना के बाद बिनयामिन को कभी भी अपने से दूर नहीं जाने देते अतः वे इतनी लंबी यात्रा पर उन्हें उनके भाइयों के साथ भेजने पर कदापि तैयार नहीं होंगे।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 62 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ لِفِتْيَانِهِ اجْعَلُوا بِضَاعَتَهُمْ فِي رِحَالِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَعْرِفُونَهَا إِذَا انْقَلَبُوا إِلَى أَهْلِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ (62)यूसुफ़ ने अपने सेवकों से कहा, इन्होंने अनाज के बदले में जो कुछ दिया है उसे इनके सामान में ही रख दो, जब वे अपने घर लौटेंगे तो शायद उसे पहचान लें और फिर शायद लौट आएं। (12:62)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने अपने भाइयों को पुनः मिस्र लौटाने के लिए आदेश दिया कि जो धन उन्होंने अनाज के बदले में दिया है, उसे उनके सामान में रख दिया जाए ताकि जब वे वापस घर लौट कर उसे देखें तो अनाज लेने के लिए फिर से मिस्र की यात्रा करने पर प्रोत्साहित हों और यात्रा की कठिनाइयों के कारण उनका विचार बदल न जाए।अलबत्ता स्पष्ट है कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम मिस्र के कोषाध्यक्ष थे और इस प्रकार से अपने भाइयों को धन नहीं दे सकते थे, अतः उन्होंने अपने निजी पैसों से भाइयों के अनाज के दाम चुकाए थे।इस आयत से हमने सीखा कि अपने परिजनों और सगे संबंधियों से जुड़े रहने का अर्थ यह है कि उनकी बुराई के मुक़ाबले में उनकी हर संभव सहायता की जाए, उनसे प्रतिशोध लेने का प्रयास न किया जाए और उनके प्रति हृदय में द्वेष न रखा जाए।पुरुषार्थ और महानता हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से सीखनी चाहिए। उन्होंने न केवल यह कि पिछली घटनाओं के कारण अपने भाइयों को अनाज से वंचित नहीं रखा बल्कि अनाज के लिए दिए गए उनके धन को भी अपने पास से उन्हें लौटा दिया।आइये अब सूरए सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 63 और 64 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا رَجَعُوا إِلَى أَبِيهِمْ قَالُوا يَا أَبَانَا مُنِعَ مِنَّا الْكَيْلُ فَأَرْسِلْ مَعَنَا أَخَانَا نَكْتَلْ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ (63) قَالَ هَلْ آَمَنُكُمْ عَلَيْهِ إِلَّا كَمَا أَمِنْتُكُمْ عَلَى أَخِيهِ مِنْ قَبْلُ فَاللَّهُ خَيْرٌ حَافِظًا وَهُوَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ (64)तो जब वे अपने पिता के पास वापस लौटे तो उन्होंने कहा, हे पिता! हमें आदेश दिया गया है कि अब तो अनाज की माप हमारे लिए बंद कर दी गई है, अतः आप हमारे भाई को हमारे साथ भेज दीजिए ताकि हम अनाज में से अपना भाग ले सकें और निश्चित रूप से हम उसके रक्षक हैं। (12:63) उन्होंने कहा, क्या मैं इसके मामले में भी तुम पर वैसा ही विश्वास करुं जैसा इससे पूर्व इसके भाई के मामले में कर चुका हूं? प्रत्येक दशा में ईश्वर सबसे बड़ा रक्षक और सबसे अधिक कृपालु है। (12:64)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम द्वारा अपने भाइयों को यह आदेश दिए जाने के बाद कि अगली बार अनाज लेने के लिए वे अपने छोटे भाई बिनायामिन को भी साथ लेकर आएं, उनके भाइयों ने अपने पिता को वचन दिया कि वे बिनयामिन को सुरक्षित ले जाएंगे और सुरक्षित वापस लाएंगे, किन्तु एक ओर तो हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम के मन में हज़रत यूसुफ़ की कटु घटना थी और दूसरी ओर अनाज प्राप्त करने के लिए उनके पास बिनयामिन को उनके साथ भेजने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था। इसी कारण उन्होंने ईश्वर पर भरोसा करते हुए अपने पुत्र को उसके हवाले किया और उससे प्रार्थन की कि वह बिनयामिन की रक्षा करे।इन आयतों से हमने सीखा कि कठिन और संकटमयी समय में केवल ईश्वर पर भरोसे से ही हृदय को शांति प्राप्त होती है अतः हमें केवल उसी की शरण में जाना चाहिए तथा उसी से सहायता मांगनी चाहिए।एक कटु अनुभव से स्वयं को अलग नहीं किया जा सकता। कभी कभी हमें दूसरे पक्ष को समय देना चाहिए कि अपने आपको सामने ला सके। साथ ही हमें अतीत को भी याद रखना चाहिए।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 65 की तिलावत सुनते हैंوَلَمَّا فَتَحُوا مَتَاعَهُمْ وَجَدُوا بِضَاعَتَهُمْ رُدَّتْ إِلَيْهِمْ قَالُوا يَا أَبَانَا مَا نَبْغِي هَذِهِ بِضَاعَتُنَا رُدَّتْ إِلَيْنَا وَنَمِيرُ أَهْلَنَا وَنَحْفَظُ أَخَانَا وَنَزْدَادُ كَيْلَ بَعِيرٍ ذَلِكَ كَيْلٌ يَسِيرٌ (65)और जब उन्होंने अपना सामान खोला तो देखा कि उनका माल उन्हें लौटा दिया गया है। उन्होंने कहा, हे पिता! हमें और क्या चाहिए? यह हमारा माल भी हमें लौटा दिया गया है और हम अपने परिजनों के लिए खाद्य सामग्री लाएंगे और अपने भाई की भी रक्षा करेंगे तथा उसे अपने साथ लेकर एक ऊंट का अतिरिक्त भार ले आएंगे कि यह माप मिस्र के शासक के लिए बहुत ही सहज है। (12:65)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने अपने भाइयों से अनाज के मूल्य के रूप में जो धन लिया था, उसे उनके सामान में रखवा दिया था। शायद यदि वे आरंभ में ही यह कह देते कि मैं तुम से कुछ नहीं लूंगा तो उनके भाइयों को अचरज भी होता और एक प्रकार से वे इसे अपना अपमान भी समझते कि माने वे भिखारी हों और उन्हें पैसे देने की आवश्यकता नहीं है किन्तु हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की महानता यह है कि उन्होंने विदित रूप से अनाज का मूल्य लिया और गुप्त रूप से उसे उनके सामान में रखवा दिया क्योंकि, सेवा बिना उपकार जताए होनी चाहिए।अलबत्ता जब उनके भाई अपने पिता के पास लौटे तो उन्होंने इसे हज़रत यूसुफ़ का काम नहीं बताया बल्कि गोल मोल रूप में कहा कि हमें धन लौटा दिया गया है। उन्होंने इसे एक प्रकार से अपना सौभाग्य बताया।इस आयत से हमने सीखा कि पुरुष पर अपने परिजनों और इसी प्रकार अपने माता पिता का ख़र्चा का दायित्व है।अनाज के अभाव के समय में खाद्य पदार्थों की कोटाबंदी एक आवश्यक कार्य है ताकि किसी के साथ अन्याय न होने पाए और हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम सहित सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों की शैली रही है।