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    सूरए यूसुफ़, आयतें 66-68, (कार्यक्रम 392)

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    आइये पहले सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 66 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ لَنْ أُرْسِلَهُ مَعَكُمْ حَتَّى تُؤْتُونِ مَوْثِقًا مِنَ اللَّهِ لَتَأْتُنَّنِي بِهِ إِلَّا أَنْ يُحَاطَ بِكُمْ فَلَمَّا آَتَوْهُ مَوْثِقَهُمْ قَالَ اللَّهُ عَلَى مَا نَقُولُ وَكِيلٌ (66)(हज़रत याक़ूब ने) कहा कि मैं कदापि उसे तुम्हारे साथ नहीं भेजूंगा जब तक तुम मुझे पक्का ईश्वरीय वचन न दे दो कि उसे मेरे पास अवश्य (वापस) ले आओगे सिवाय इसके कि तुम स्वयं ही कहीं घेर लिए जाओ। तो जब उन्होंने वचन दे दिया तो (हज़रत याक़ूब ने) कहा, जो कुछ हम कहते हैं उस पर ईश्वर दृष्टि रखने वाला है। (12:66)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम के पुत्रों को अनाज लेने की अगली बारी के लिए अपने छोटे भाई बिनयामिन को साथ लेकर जाना था किन्तु हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम जानते थे कि उनके पुत्र, यूसुफ़ की भांति बिनयामिन से भी ईर्ष्या करते हैं अतः उन्हें बहुत चिंता थी, दूसरी ओर उनके पास अनाज लाने के लिए बिनयामिन को मिस्र भेजने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था।अतः उन्होंने अपने पुत्रों से कहा कि वे ईश्वर की सौगंध खाकर वचन दें कि बिनयामिन को पूरी सुरक्षा के साथ वापस ले आएंगे सिवाय इसके कि स्वयं तुम्हारे साथ कोई घटना हो जाए। उन्होंने भी सौगंध खाकर वचन दिया कि जिसके बाद हज़रत याक़ूब ने कहा कि यह मत सोचना कि यह एक साधारण सी बात है जिसे तुम अपनी ज़बान से कह रहे हो बल्कि यदि तुम ने अपनी सौगंध तोड़ी तो ईश्वर तुम्हें दंडित करेगा क्योंकि जो कुछ हम कहते हैं ईश्वर उन सबसे अवगत है।इस आयत से हमने सीखा कि किसी कार्य के लिए ठोस वचन लेना क़ुरआन की पद्धति है। बेहतर है कि सामाजिक मामलों में भी लोगों से ठोस वचन लिया जाए।क़ानूनी मामलों में हर काम सतकर्ता से और सुदृढ़ ढंग से करना चाहिए किन्तु ईश्वर पर हमारे भरोसे में कमी का कारण न बने।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 67 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ يَا بَنِيَّ لَا تَدْخُلُوا مِنْ بَابٍ وَاحِدٍ وَادْخُلُوا مِنْ أَبْوَابٍ مُتَفَرِّقَةٍ وَمَا أُغْنِي عَنْكُمْ مِنَ اللَّهِ مِنْ شَيْءٍ إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَعَلَيْهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُتَوَكِّلُونَ (67)(हज़रत याक़ूब ने) कहा, हे मेरे बच्चो! (मिस्र में प्रवेश के समय) सभी एक ही द्वार से प्रविष्ट न होना बल्कि विभिन्न द्वारों से प्रवेश करना और मैं ईश्वर के मुक़ाबले में तुम्हें किसी बात से नहीं बचा सकता कि आदेश तो केवल ईश्वर का ही (चलता) है। मैंने उसी पर भरोसा किया है और सभी भरोसा करने वालों को उसी पर भरोसा करना चाहिए। (12:67)जब हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम के पुत्र मिस्र की यात्रा पर रवाना होने लगे तो उन्होंने उन लोगों को कुछ सिफ़ारिशें कीं। उन्होंने कहा कि सब के सब एक ही द्वार से प्रविष्ट न होना क्योंकि इससे लोगों में ईर्ष्या अथवा संवेदनशीलता उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने कहा कि सब लोग विभिन्न द्वारों से नगरों में प्रवेश करना ताकि इस प्रकार की बातों का सामना न करना पड़े।हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने कहा कि इस सिफ़ारिश का यह अर्थ नहीं है कि यदि ईश्वर की ओर से तुम्हारे लिए कोई बात निर्धारित हो तो तुम इससे बच जाओगे। इस आयत से पता चलता है कि ईश्वर की इच्छा और उसका आदेश इस संसार में सर्वोपरि है और हम उसे नहीं रोक सकते किन्तु हम जो बातें जानते और समझते हैं उनके अनुसार काम कर सकते हैं और साथ ही ईश्वर पर भरोसा कर सकते हैं कि जो वह चाहता है वही होता है।इस आयत से हमने सीखा कि सभी मामलों में चिंतन और युक्ति आवश्यक है किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि जो कुछ हम चाहते हैं वह हो कर ही रहेगा क्योंकि अंत में वही होता है जो ईश्वर की इच्छा होती है।हमें केवल ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए कि वही सर्वसमक्ष और हमारा हितैषी है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 68 की तिलावत सुनते हैं।وَلَمَّا دَخَلُوا مِنْ حَيْثُ أَمَرَهُمْ أَبُوهُمْ مَا كَانَ يُغْنِي عَنْهُمْ مِنَ اللَّهِ مِنْ شَيْءٍ إِلَّا حَاجَةً فِي نَفْسِ يَعْقُوبَ قَضَاهَا وَإِنَّهُ لَذُو عِلْمٍ لِمَا عَلَّمْنَاهُ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ (68)और जब (हज़रत याक़ूब के पुत्र) उसी प्रकार मिस्र में प्रविष्ट हुए जैसा उनके पिता ने आदेश दिया था तो यद्यपि वे ईश्वरीय बला को टाल नहीं सकते थे किन्तु यह एक इच्छा थी जो याक़ूब के हृदय में पैदा हुई जिसे उन्होंने पूरा कर लिया और वे हमारे द्वारा प्रदान किए गए ज्ञान के आधार पर ज्ञान वाले थे किन्तु अधिकांश लोग इसे नहीं जानते। (12:68)यह आयत एक बार फिर बल देकर कहती है कि हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने अपने पुत्रों को जिन बातों की सलाह दी थी वे ईश्वरीय इच्छा को रोक नहीं सकती थीं और उनका प्रभाव केवल यह होता है कि हज़रत याक़ूब की इच्छा पूरी हो जाती और उन्हें यह सोच कर संतोष प्राप्त हो जाता कि वे उनकी सलाह के अनुसार काम करेंगे।आगे चलकर आयत कहती है कि अलबत्ता हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम की यह सलाह भी उस ईश्वरीय ज्ञान के आधार पर थी जो ईश्वर ने अपने पैग़म्बरों को प्रदान किया है और यह उनका व्यक्तिगत ज्ञान नहीं है। पैग़म्बरों ने मानवीय मतों में ज्ञान अर्जित नहीं किया है, इसी कारण वे साधारण लोगों की भांति नहीं हैं। उनका शिक्षक ईश्वर है और वे जो कुछ कहते और करते हैं वह ईश्वरीय शिक्षा के आधार पर होता है। अपने पुत्रों को हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम की सलाह भी इन्हीं शिक्षाओं के आधार पर थी।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के प्रिय बंदों की प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है क्योंकि वे ईश्वर की इच्छा के अतिरिक्त कुछ चाहते ही नहीं।अधिकांश लोग, घटनाओं के विदित रूप और कारणों को ही देखते हैं और ईश्वरीय इच्छा की ओर से निश्चेत रहते हैं।