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    सूरए यूसुफ़, आयतें 69-73, (कार्यक्रम 393)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या उन्हत्तर की तिलावत सुनते हैं।وَلَمَّا دَخَلُوا عَلَى يُوسُفَ آَوَى إِلَيْهِ أَخَاهُ قَالَ إِنِّي أَنَا أَخُوكَ فَلَا تَبْتَئِسْ بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (69)और जब वे यूसुफ़ के पास पहुंचे तो उन्होंने अपने भाई (बिनायामिन) को अपने पास स्थान दिया और कहा कि मैं तुम्हारा भाई हूं तो जो कुछ वे करते हैं उससे दुखी न हो। (12:69)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि अंततः हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम इस बात के लिए तैयार हो गए कि अपने पुत्र बिनयामिन को उनके भाइयों के साथ अनाज लाने के लिए मिस्र भेजे।यह आयत कहती है कि जब वे मिस्र पहुंचे तो हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने किसी प्रकार बिनयामिन से एकांत में बात की और उन्हें अपना परिचय देकर उनकी चिंता को समाप्त कर दिया क्योंकि वे अपने भाइयों के व्यवहार की ओर से चिंतित थे और सोच रहे थे कि उनके भाई उन्हें भी यूसुफ़ की भांति उनके पिता से अलग कर देंगे। हज़रत यूसुफ़ ने बिनयामिन से कहा कि वे उन्हीं के साथ रहें। यह बात बिनयामिन ने स्वीकार कर ली।इस आयत से हमने सीखा कि झूठ बोलना वर्जित है किन्तु हर सच बात कहना भी आवश्यक नहीं है। जब तक हज़रत यूसुफ़ ने उचित नहीं समझा अपने भाइयों को अपना परिचय नहीं दिया बल्कि केवल अपने एक भाई को अपने बारे में बताया।जब कोई अनुकंपा प्राप्त हो तो पिछली कटु घटनाओं को भूल जाना चाहिए, जब यूसुफ़ और बिनयामिन मिले तो उन्होंने पिछले दुख को भुला दिया।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 70 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا جَهَّزَهُمْ بِجَهَازِهِمْ جَعَلَ السِّقَايَةَ فِي رَحْلِ أَخِيهِ ثُمَّ أَذَّنَ مُؤَذِّنٌ أَيَّتُهَا الْعِيرُ إِنَّكُمْ لَسَارِقُونَ (70)तो जब हज़रत यूसुफ़ ने उनका सामान तैयार करा दिया तो पानी पीने का (मूल्यवान) बर्तन अपने भाई के सामान में रखवा दिया। फिर एक पुकारने वाले ने कहा कि हे कारवां वालो! निश्चित रूप से तुम सब चोर हो। (12:70)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम चाहते थे कि बिनयामिन को अपने पास ही रोक लें ताकि उनके भाई अगली यात्रा में उनके पिता और अन्य परिजनों को मिस्र लाने पर विवश हो जाएं। इसी कारण उन्होंने यह बात बिनयामिन को बताई और एक योजना तैयार की, जिस प्रकार से कि उन्होंने पिछली बार भी अपनी भाइयों को दिए गए अनाज में उसका दाम वापस रख दिया था ताकि वे अनाज लेने पुनः वापस आएं।इस बार हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की योजना यह थी कि एक मूल्यवान बर्तन बिनयामिन के सामान में रखवा दिया जाए और उन्होंने ऐसा किया। हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के कर्मचारियों को इस बात की सूचना नहीं थी अतः उन्होंने पूरे कारवां वालों को चोर कहा और उनके सामान की तलाशी ली।इस आयत से हमने सीखा कि किसी अधिक आवश्यक कार्य के लिए योजना बनाना वैध है किन्तु इसकी शर्त यह है कि किसी पर अत्याचार न हो और निर्दोष व्यक्ति को पहले से ही इसकी सूचना दे दी गई हो।अपने सहयोगियों और साथियों की ओर से सचेत रहना चाहिए क्योंकि किसी गुट में एक ग़लत व्यक्ति की उपस्थिति इस बात का कारण बनती है कि लोग पूरे गुट को ही बुरा समझें।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 71 और 72 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا وَأَقْبَلُوا عَلَيْهِمْ مَاذَا تَفْقِدُونَ (71) قَالُوا نَفْقِدُ صُوَاعَ الْمَلِكِ وَلِمَنْ جَاءَ بِهِ حِمْلُ بَعِيرٍ وَأَنَا بِهِ زَعِيمٌ (72)(यूसुफ़ के भाइयों ने) उनकी ओर मुड़कर कहा, तुमने क्या खो दिया है? (12:71) उन्होंने कहा कि हमसे शासक की नाप खो गई है और (शासक ने कहा है कि) जो कोई उसे लाएगा, उसे एक ऊंट के भार के बराबर अनाज दिया जाएगा और मैं इसका दायित्व लेता हूं। (12:72)हज़रत यूसुफ़ के कर्मचारियों को जब यह पता चला कि जिस नाप से लोगों को अनाज दिया जाता है वह खो गई है तो उन्होंने कारवां वालों के सामान की तलाशी आरंभ की और सबसे पहले हज़रत यूसुफ़ के भाइयों के सामान की तलाशी ली। हज़रत यूसुफ़ ने उस नाप को खोजने में प्रोत्साहन के लिए घोषणा की कि जो कोई उसे खोजकर लाएगा उसे एक ऊंट के भार के बराबर अनाज पुरस्कार स्वरूप दिया जाएगा और मैं स्वयं पुरस्कार के संबंध में उत्तरदायी हूं।इन आयतों से हमने सीखा कि किसी सार्थक कार्य में लोगों के बीच प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करने और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार निर्धारित करना, ईश्वर की दृष्टि में स्वीकार्य और प्रिय कार्य तथा पैग़म्बरों की परंपरा है।पुरस्कार, लाभहीन और औपचारिक नहीं बल्कि समय की आवश्यकता के अनुसार होना चाहिए, अकाल के समय में सर्वोत्तम पुरस्कार एक ऊंट के भार के बराबर अनाज था।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 73 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا تَاللَّهِ لَقَدْ عَلِمْتُمْ مَا جِئْنَا لِنُفْسِدَ فِي الْأَرْضِ وَمَا كُنَّا سَارِقِينَ (73)(यूसुफ़ के भाइयों ने) कहा, ईश्वर की सौगंध! तुम लोग जानते हो कि हम इस धरती में बिगाड़ पैदा करने के लिए नहीं आए हैं और हम कदापि चोर नहीं हैं। (12:73)जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों को यह पता चला कि उन्हें चोर समझा जा रहा है और इसीलिए उन्हें ऐसी दृष्टि से देखा जा रहा है तो उन्होंने अपना बचाव करते हुए कहा कि हम इससे पूर्व भी एक बार तुम्हारे देश में आ चुके हैं और हमने कोई अपराध या चोरी नहीं की थी तो अब तुम हमारे साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों कर रहे हो? तुम्हें तो ज्ञात है कि हम इस प्रकार का काम करने वाले लोग नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि अच्छा अतीत, कभी कभी लोगों के निर्दोष होने का प्रमाण होता है सिवाय इसके कि उनके अपराधी होने का कोई प्रबल प्रमाण हो।चोरी, धरती में बिगाड़ का एक प्रतीक है कि जो एक पूरे क्षेत्र के लोगों की तबाही का कारण बनती है।