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    सूरए यूसुफ़, आयतें 7-10, (कार्यक्रम 376)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या सात और आठ की तिलावत सुनते हैं।لَقَدْ كَانَ فِي يُوسُفَ وَإِخْوَتِهِ آَيَاتٌ لِلسَّائِلِينَ (7) إِذْ قَالُوا لَيُوسُفُ وَأَخُوهُ أَحَبُّ إِلَى أَبِينَا مِنَّا وَنَحْنُ عُصْبَةٌ إِنَّ أَبَانَا لَفِي ضَلَالٍ مُبِينٍ (8)निश्चित रूप से यूसुफ़ और उनके भाईयों के वृत्तांत में (वास्तविकता की) खोज में रहने वालों के लिए (मार्गदर्शन) की निशानियां हैं। (12:7) उस समय कि जब (यूसुफ़ के भाईयों ने) कहा कि यूसुफ़ और उनके भाई (बिनयामिन) हमारे पिता के निकट हमसे अधिक प्रिय हैं जबकि हम अधिक शक्तिशाली हैं। निसंदेह हमारे पिता खुली हुई पथभ्रष्टता में हैं। (12:8)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि क़ुरआने मजीद की आयतों के अनुसार हज़रत यूसुफ़ की घटना एक स्वप्न से आरंभ होती है जिसमें भविष्य में उनके उच्च स्थान की ओर संकेत किया गया है किन्तु इस स्थान की प्राप्ति सरल नही है बल्कि इसके लिए अनेक उतार चढ़ाव से गुज़रना होगा। वास्तविकता की खोज में रहने वालों को इस पर ध्यान देते हुए इससे पाठ सीखना चाहिए।जो कुछ पिछली आयत में कहा गया है वह हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के स्वप्न के बारे में था किन्तु उनके जागने के पश्चात घटना एक दूसरे ढंग से आरंभ होती है। यूसुफ़ के भाईयों को, जो उनके सौतेल भाई थे, उनसे और उनके सगे भाई बिनयामिन से ईर्ष्या होने लगी। वे यूसुफ़ और उनके भाई से पिता के स्वाभाविक प्रेम को देखकर ईर्ष्या करने लगे और कहने लगे कि पिता उन दोनों को हमसे अधिक चाहते हैं जबकि हम शक्तिशाली युवा हैं, इस दृष्टि से पिता भूल कर रहे हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद में वर्णित बातों से केवल वही लोग लाभान्वित होते हैं जो वास्तविकता की खोज में रहते हैं।अपने बच्चों के प्रति अपने व्यवहार की ओर से सतर्क रहना चाहिए क्योंकि यदि उन्हें भेदभाव का आभास हुआ तो ईर्ष्या की ज्वाला उनके अस्तित्व को अपने घेरे में ले लेगी।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 9 की तिलावत सुनते हैं।اقْتُلُوا يُوسُفَ أَوِ اطْرَحُوهُ أَرْضًا يَخْلُ لَكُمْ وَجْهُ أَبِيكُمْ وَتَكُونُوا مِنْ بَعْدِهِ قَوْمًا صَالِحِينَ (9)(यूसुफ़ के भाइयों ने एक दूसरे से कहा कि) यूसुफ़ की हत्या कर दो या उसे दूर किसी स्थान पर फेंक दो ताकि तुम्हारे पिता का ध्यान केवल तुम्हारी ओर रहे और इसके बाद तुम (अपने पापों से तौबा करके) भले लोग बन जाना। (12:9)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के साथ उनके पिता के प्रेमपूर्ण व्यवहार से भ्रांति ने उनके भाइयों को इस सीमा तक पहुंचा दिया कि वे यह सोचने लगे कि उन्हें किसी प्रकार मार्ग से हटा दिया जाए ताकि पिता का ध्यान हमारी ओर आकृष्ट हो जाए फिर बाद में हम तौबा कर लेंगे और ईश्वर हमें क्षमा कर देगा और हम भले लोगों में शामिल हो जाएंगे।उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि तौबा पाप करने के बहाने का नहीं बल्कि पाप से पश्चाताप का नाम है। यदि कोई मनुष्य यह कहे कि मैं अभी पाप कर लेता हूं और भविष्य में तौबा कर लूंगा तो वह केवल अपने आपको धोखा देता है, उस व्यक्ति की भांति जो यह कहे कि मैं अभी यह विषाक्त भोजन खा लेता हूं और बाद में चिकित्सक के पास चला जाऊंगा और वह मेरा उपचार कर देगा।प्रत्येक दशा में यूसुफ़ की हत्या या उन्हें किसी दूरवर्ती मरुस्थल में छोड़ने की योजना, एक शैतानी विचार और यूसुफ़ से उनके भाइयों की गहरी ईर्ष्या को दर्शाती थी। यह बात सभी परिवार के लिए ख़तरे की घंटी और माता पिता के लिए चेतावनी हो सकती है।इस आयत से हमने सीखा कि ईर्ष्या, मनुष्य को अपने भाई की हत्या की सीमा तक ले जा सकती है। केवल हज़रत यूसुफ़ और उनके भाइयों के मामले में ही नहीं बल्कि हाबील और क़ाबील के मामले में ईर्ष्या के कारण एक भाई ने दूसरे भाई की हत्या कर दी।बच्चे माता पिता की दृष्टि में प्रिय बनना चाहते हैं और प्रेम का आभाव एक बहुत बड़ा ख़तरा है जो उन्हें सही मार्ग से भटका सकता है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 10 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ قَائِلٌ مِنْهُمْ لَا تَقْتُلُوا يُوسُفَ وَأَلْقُوهُ فِي غَيَابَةِ الْجُبِّ يَلْتَقِطْهُ بَعْضُ السَّيَّارَةِ إِنْ كُنْتُمْ فَاعِلِينَ (10)उनमें से एक ने कहा कि यदि तुम करना चाहते हो तो यूसुफ़ की हत्या न करो और उसे कुंए की अधंकारमयी गहराईयों में फेंक दो कि शायद कोई कारवां उसे उठा ले जाए। (12:10)चूंकि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के कुछ भाइयों में ईर्ष्या कम और कुछ में अधिक थी अतः उनके कुछ भाईयों ने उनकी हत्या की योजना का विरोध किया। उनमें से एक ने कहा कि यूसुफ़ की हत्या की कोई आवश्यकता नहीं है। उसे एक कुंए में डाल देना काफ़ी होगा जिससे हमारी समस्या का समाधान हो जाएगा और हम अपने भाई के ख़ून से अपने हाथों को भी नहीं रंगेंगे। यूसुफ़ भी कुंए में सुरक्षित रहेगा और पानी निकालने के लिए आने वाला कोई कारवां उसे कुएं से बाहर निकाल लेगा।इस योजना पर सभी भाइयों ने सहमति जताई और इस प्रकार हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम मौत से बच गए। विचित्र बात यह है कि कभी कभी बुराई के रोकने का कोई आदेश कि जिसके कारण किसी की जान बच गई हो, इतिहास के महान परिवर्तनों का कारण बना है। इस घटना में एक भाई के विरोध के कारण हज़रत यूसुफ़ की जान बच गई, हज़रत यूसुफ़ ने सत्ता में आने के बाद मिस्र को सूखे और पतन से मुक्ति दिलाई।इसी प्रकार फ़िरऔन की पत्नी ने उसे हज़रत मूसा की हत्या से रोका और उसकी जान बचाई। आगे चलकर हज़रत मूसा ने बनी इस्राईल को फ़िरऔन के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। यह स्पष्ट उदाहरण क़ुरआने मजीद की इस आयत की पुष्टि करते हैं कि जिस किसी ने एक व्यक्ति को जीवन दिया तो मानो उसने समस्त मनुष्यों को जीवन दिया।इस आयत से हमने सीखा कि यदि हम पूर्ण रूप से किसी बुरे काम को नहीं रोक सकते तो जितना संभव हो उसे कमज़ोर बना देना चाहिए, जैसा कि हज़रत यूसुफ़ के एक भाई ने कहा कि उनकी हत्या करने के बजाए उन्हें कुएं में डाल दो।ग़लत काम में बहुसंख्या के सामने नहीं झुकना चाहिए बल्कि अपना विचार प्रस्तुत करना चाहिए कि शायद उसे स्वीकार कर लिया जाए।