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    सूरए यूसुफ़, आयतें 74-77, (कार्यक्रम 394)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 74 और 75 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا فَمَا جَزَاؤُهُ إِنْ كُنْتُمْ كَاذِبِينَ (74) قَالُوا جَزَاؤُهُ مَنْ وُجِدَ فِي رَحْلِهِ فَهُوَ جَزَاؤُهُ كَذَلِكَ نَجْزِي الظَّالِمِينَ (75)(सरकारी कर्मचारियों ने) कहा, तो यदि तुम झूठे हुए तो उसका क्या दंड होगा? (12:74) (यूसुफ़ के भाइयों ने) कहा कि जिसके भी सामान में वह नाप मिल जाए वह स्वयं ही उसका दंड होगा, हम इसी प्रकार अत्याचारियों को दंड देते हैं। (12:75)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने अपने भाई बिनयामिन को अपने पास रोकने तथा अपने माता-पिता को मिस्र बुलाने का मार्ग प्रशस्त करने के लिए एक योजना तैयार की और बिनयामिन को उससे अवगत करा दिया। उन्होंने शासक के मूल्यवान पियाले को बिनयामिन के सामान में छिपा दिया और जब सरकारी कर्मचारियों को पियाले के गुम हो जाने की सूचना मिली तो उन्होंने उसे खोजना आरंभ किया और बिनयामिन को चोरी के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया।किन्तु हज़रत यूसुफ़ के भाइयों ने चोरी के आरोप से अपना बचाव किया और कहा कि यदि तुम्हारा पियाला खो गया है तो इसमें हमारा कोई दोष नहीं है। सरकारी कर्मचारियों ने कहा कि यदि वह तुम लोगों के सामान में मिला तो तुम्हारा दंड क्या होगा? उन्होंने उत्तर में कहा कि हमारे क्षेत्र में यह परंपरा है कि यदि कोई चोरी करता है तो उसे उस व्यक्ति का दास बना दिया जाता है जिसके माल की चोरी हुई है ताकि उसकी क्षतिपूर्ति हो सके।इन आयतों से हमने सीखा कि अपराधी के साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए कि वह स्वयं अपने बारे में अपनी अंतरात्मा के आधार पर निर्णय करे और सरलता से न्याय को स्वीकार कर ले।क़ानून के क्रियान्वयन में भेद-भाव से काम नहीं लेना चाहिए। चोर को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए चाहे वह कोई महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ही क्यों न हो।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 76 की तिलावत सुनते हैं।فَبَدَأَ بِأَوْعِيَتِهِمْ قَبْلَ وِعَاءِ أَخِيهِ ثُمَّ اسْتَخْرَجَهَا مِنْ وِعَاءِ أَخِيهِ كَذَلِكَ كِدْنَا لِيُوسُفَ مَا كَانَ لِيَأْخُذَ أَخَاهُ فِي دِينِ الْمَلِكِ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ نَرْفَعُ دَرَجَاتٍ مَنْ نَشَاءُ وَفَوْقَ كُلِّ ذِي عِلْمٍ عَلِيمٌ (76)तो अपने भाई के सामान से पहले उनके सामान की तलाशी ली और फिर पियाले को अपने भाई के सामान में से बाहर निकाला। इस प्रकार से हमने यूसुफ़ के हित में युक्ति की। वे (मिस्र के) शासक के क़ानून के अनुसार अपने भाई को अपने पास नहीं रोक सकते थे, सिवाय इसके कि ईश्वर चाहे। इस प्रकार हम जिसे चाहते हैं, उसे उच्च स्थान प्रदान करते हैं और हर जानकार के ऊपर एक दूसरा जानकार है। (12:76)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की योजना के अनुसार, उन्होंने अपने भाइयों के संदेह को रोकने के लिए पहले बड़े भाइयों के समान की तलाशी ली और फिर छोटे भाई बिनयामिन के सामान की तलाशी ली तथा मूल्यवान पियाला उनके सामान से बाहर निकाला और घोषणा की कि वे चोर हैं और जैसा कि उनके भाइयों ने कहा था कि उनके क्षेत्र में चोर का दंड यह होता है कि उसे उस व्यक्ति का दास बना दिया जाता है जिसके सामान की चोरी होती है।क़ुरआने मजीद कहता है कि इस प्रकार की युक्ति ईश्वर ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को सिखाई थी अन्यथा उनके पास अपने भाई को रोकने का कोई मार्ग नहीं था। यदि उनके भाई अपने क्षेत्र की परंपरा के बारे में नहीं बताते तो मिस्र के क़ानून के अनुसार हज़रत यूसुफ़ बिनयामिन को चोरी के आरोप में अपने पास नहीं रोक सकते थे।आगे चलकर आयत कहती है कि मिस्र में हज़रत यूसुफ़ को जो उच्च स्थान प्राप्त हुआ था वह ईश्वर की इच्छा के अनुसार था कि जिसका ज्ञान, हर प्रकार के ज्ञान के ऊपर और उससे श्रेष्ठ है और ईश्वर सदैव यूसुफ़ के मन में नई नई युक्तियां डालता था ताकि वे अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।इस आयत से हमने सीखा कि किसी भी देश के क़ानूनों का पालन उसमें रहने वालों के लिए आवश्यक है चाहे उसकी सरकार ग़ैर ईश्वरीय क्यों न हो, अलबत्ता यदि वह क़ानून, ईश्वरीय आदेशों के विपरीत हो तो वहां से पलायन कर जाना चाहिए, ईश्वरीय क़ानून का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।ज्ञान, श्रेष्ठता व वरीयता का कारण है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 77 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا إِنْ يَسْرِقْ فَقَدْ سَرَقَ أَخٌ لَهُ مِنْ قَبْلُ فَأَسَرَّهَا يُوسُفُ فِي نَفْسِهِ وَلَمْ يُبْدِهَا لَهُمْ قَالَ أَنْتُمْ شَرٌّ مَكَانًا وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا تَصِفُونَ (77)(यूसुफ़ के भाइयों ने) कहा कि यदि उसने चोरी की है तो इससे पूर्व उसका भाई भी चोरी कर चुका है। यूसुफ़ ( इस बात से अप्रसन्न हुए किन्तु अपनी इस अप्रसन्नता को मन में) छिपाए रहे और उनके समक्ष इसे व्यक्त नहीं किया। उन्होंने कहा कि तुम बहुत ही बुरे लोग हो और जो कुछ तुम कह रहे हो इसके बारे में ईश्वर ही अधिक जानने वाला है। (12:77)यद्यपि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने चोरी नहीं की थी किन्तु उन्हें यह भी पता था कि उनके भाई बिनयामिन ने भी चोरी नहीं की है, अतः आशा यह थी कि वे अपने छोटे भाई का बचाव करते और उन पर लगे निराधार आरोप को समाप्त करने का प्रयास करते किन्तु मानो वे भी यही चाहते थे कि बिनयामिन को चोरी के आरोप में मिस्र में ही रोक लिया जाए और वे उनके बिना ही अपने पिता के पास लौटें क्योंकि उनके पिता बिनयामिन से भी बहुत अधिक प्रेम करते थे जबकि वे चाहते थे कि हज़रत याक़ूब का ध्यान उनकी ओर अधिक हो।किन्तु हज़रत यूसुफ़ के दुष्ट भाइयों ने न केवल यह कि अपने छोटे भाई का बचाव नहीं किया बल्कि अपने दूसरे भाई यूसुफ़ पर भी अकारण चोरी का आरोप लगाया ताकि सरकारी कर्मचारियों का संदेह और अधिक दृढ़ हो जाए और वे बिनयामिन को गिरफ़्तार करके मिस्र में ही रोक लें और हुआ भी ऐसा ही।आगे चलकर आयत कहती है कि यद्यपि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम सत्ता में थे और बड़ी सरलता से अपने भाइयों को दिए जाने वाले अनाज को वापस ले सकते थे या उन सभी को चोरी के आरोप में गिरफ़्तार कर सकते थे किन्तु उन्होंने धैर्य व संयम से काम लिया और अपने ऊपर लगने वाले चोरी के आरोप को भी क्षमा कर दिया। उन्होंने कहा कि जो कुछ तुम कह रहे हो उसके बारे में ईश्वर बेहतर जानता है किन्तु मेरी दृष्टि में तुम्हारी वर्तमान स्थिति उस बात से कहीं बुरी है जो तुम अपने भाइयों के बारे में कह रहे हो। शासक का पियाला तुम लोगों के सामान में से मिला है और इसका दंड साधारण नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए लोगों के कटाक्षों को सहन करना और धैर्य से काम लेना पड़ता है।रहस्योद्धाटन हर स्थान पर उचित नहीं होता बल्कि अधिकतर अवसरों पर दूसरों के रहस्यों को छिपाना, बहुत आवश्यक होता है, विशेषकर शासकों के लिए जिनका पद सबसे उच्च होता है और उन्हें सार्वजनिक हितों को अपने व्यक्तिगत मामलों की भेंट नहीं चढ़ाना चाहिए।