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    सूरए यूसुफ़, आयतें 78-82, (कार्यक्रम 395)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 78 और 79 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا يَا أَيُّهَا الْعَزِيزُ إِنَّ لَهُ أَبًا شَيْخًا كَبِيرًا فَخُذْ أَحَدَنَا مَكَانَهُ إِنَّا نَرَاكَ مِنَ الْمُحْسِنِينَ (78) قَالَ مَعَاذَ اللَّهِ أَنْ نَأْخُذَ إِلَّا مَنْ وَجَدْنَا مَتَاعَنَا عِنْدَهُ إِنَّا إِذًا لَظَالِمُونَ (79)(यूसुफ़ के भाइयों ने) कहा, हे मिस्र के शासक! उसके एक बहुत वृद्ध पिता हैं तो हम में से किसी एक को उसके स्थान पर ले लो कि निश्चित रूप से हमारी दृष्टि में तुम एक भले व्यक्ति हो। (12:78) यूसुफ़ ने कहा कि मैं ईश्वर की शरण चाहता हूं इस बात से कि जिसके पास हम अपना समान पाएं उसके अतिरिक्त किसी अन्य को पकड़ लें, ऐसी स्थिति में तो हम निश्चित रूप से अत्याचारियों में से हो जाएंगे। (12:79)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने एक योजना के अंतर्गत मिस्र के शासक का मूल्यवान पियाला अपने छोटे भाई बिनयामिन के सामान में रखवा दिया और फिर उन्हें चोरी के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया, अलबत्ता उन्होंने इसकी सूचना पहले ही बिनयामिन को दे दी थी।यह आयत कहती है कि जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने देखा कि बिनयामिन को गिरफ़्तार कर लिया गया है और वे उनके बिना ही अपने घर वापस लौटने पर विवश हैं तो वे चिंतित हो गए। उन्हें वह वचन याद आया जो उन्होंने अपने पिता को दिया था, अतः उन्होंने प्रस्ताव दिया कि बिनयामिन के स्थान पर कोई दूसरा भाई मिस्र में रह जाए ताकि वे अपने पिता के पास लौट सकें।किन्तु चूंकि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम बिनयामिन से इस संबंध में पहले ही बात कर चुके थे अतः उन्होंने अपने भाइयों के इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और इसे मिस्र के क़ानून के विरुद्ध बताया। इसके अतिरिक्त यदि वे किसी अन्य भाई को बिनयामिन के स्थान पर रोक लेते तो उनके भाई घर वापस लौट कर बिनयामिन को चोर बताते और स्वयं भी उन्हें यातनाएं देते।इन आयतों से हमने सीखा कि जो लोग यूसुफ़ को अपमानित करना चाहते थे आज उन्हें मिस्र का शासक कहने पर विवश थे। यह ईश्वर का क़ानून है कि वह अत्याचारियों को अपमानित और अत्याचारग्रस्तों को सम्मानित करता है।नियमों और क़ानूनों का पालन हर एक के लिए आवश्यक है और सरकारी अधिकारियों के लिए भी वैध नहीं है कि वे क़ानून का उल्लंघन करें।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 80 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا اسْتَيْئَسُوا مِنْهُ خَلَصُوا نَجِيًّا قَالَ كَبِيرُهُمْ أَلَمْ تَعْلَمُوا أَنَّ أَبَاكُمْ قَدْ أَخَذَ عَلَيْكُمْ مَوْثِقًا مِنَ اللَّهِ وَمِنْ قَبْلُ مَا فَرَّطْتُمْ فِي يُوسُفَ فَلَنْ أَبْرَحَ الْأَرْضَ حَتَّى يَأْذَنَ لِي أَبِي أَوْ يَحْكُمَ اللَّهُ لِي وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِمِينَ (80)तो जब (यूसुफ़ के भाई) उसकी (मुक्ति की) ओर से निराश हो गए तो अलग जाकर परामर्श करने लगे। उनके बड़े भाई ने कहा कि क्या तुम्हें पता नहीं कि तुम्हारे पिता ने (बिनयामिन को वापस लाने के संबंध में) तुम से ईश्वरीय वचन लिया था और इससे पूर्व तुम लोग यूसुफ़ के मामले में भी ढिलाई कर चुके हो अतः मैं तो इस स्थान से तब तक वापस नहीं जाऊंगा जब तक मेरे पिता मुझे अनुमति न दे दें या ईश्वर मेरे बारे में कोई निर्णय न कर दे कि वह सबसे अच्छा निर्णय करने वाला है। (12:80)जब हज़रत यूसुफ़ के भाई उनकी ओर से निराश हो गए तो उन्होंने वापस लौटने का इरादा किया किन्तु बड़े भाई ने लौटने से इन्कार कर दिया और कहा कि पिता की दृष्टि में हमारा जो अतीत है उसे देखते हुए मैं वापस नहीं लौटूंगा सिवाय इसके कि पिता किसी तरह से मुझे अनुमति दें या ईश्वर मेरा फ़ैसला करे अथवा मुझे कोई दूसरा मार्ग सुझाए क्योंकि मैं वर्तमान स्थिति में पिता के पास लौट कर नहीं जा सकता।इस आयत से हमने सीखा कि अन्य लोगों यहां तक कि अपने भाइयों और परिजनों के अनुरोध और आग्रह से भी क़ानून के पालन में रुकावट नहीं आनी चाहिए, बल्कि दृढ़ता के साथ क़ानून को लागू करना चाहिए।वचन लेने से लोग अपने दायित्वों का अधिक गंभीरता से पालन करते हैं।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 81 और 82 की तिलावत सुनते हैं।ارْجِعُوا إِلَى أَبِيكُمْ فَقُولُوا يَا أَبَانَا إِنَّ ابْنَكَ سَرَقَ وَمَا شَهِدْنَا إِلَّا بِمَا عَلِمْنَا وَمَا كُنَّا لِلْغَيْبِ حَافِظِينَ (81) وَاسْأَلِ الْقَرْيَةَ الَّتِي كُنَّا فِيهَا وَالْعِيرَ الَّتِي أَقْبَلْنَا فِيهَا وَإِنَّا لَصَادِقُونَ (82)(यूसुफ़ के बड़े भाई ने कहा) तुम लोग अपने पिता की ओर लौट जाओ। उनसे कहना कि हे पिता! तुम्हारे पुत्र ने चोरी की है और हमने केवल उसकी बात की गवाही दी है जिसका हमें ज्ञान था और हम ग़ैब अर्थात ईश्वरीय ज्ञान से अवगत नहीं हैं (12:81) और (यदि आपको हमारी बातों पर विश्वास न हो तो) आप उस बस्ती (के लोगों) से पूछ लें जिसमें हम थे और उस कारवां से भी जिसमें हम वापस लौटे हैं (ताकि आपको विश्वास हो जाए) कि निश्चित रूप से हम सच्चे हैं। (12:82)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों की वार्ता में बड़े भाई ने कहा कि मैं मिस्र में ही रुकूंगा ताकि शायद मिस्र के शासक को दया आ जाए और वह बिनयामिन को स्वतंत्र कर दे। इसी के साथ उसने अपने भाइयों से कहा कि वे अपने पिता के पास वापस लौट जाएं और जो कुछ देखा और समझा है, उसे उन्हें बता दें। इस संबंध में वे कारवां के लोगों को अपनी बात की पुष्टि करने के लिए पेश कर सकते हैं। उन्हें अपने पिता से कहना चाहिए कि बिनयामिन को चोर के रूप में गिरफ़्तार कर लिया गया है और मैं उसे स्वतंत्र कराने के लिए मिस्र में रुक गया हूं।अलबत्ता हज़रत यूसुफ़ के बड़े भाई ने जो कुछ कहा था वह सच था किन्तु उन लोगों का बुरा अतीत इस बात का कारण बनता कि हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम उनकी बातों पर विश्वास न करते और सोचते कि उन्होंने यूसुफ़ की भांति बिनयामिन को भी उनसे अलग करने के लिए कोई षड्यंत्र रचा है। इसी कारण बड़े भाई ने किसी को साक्षी के रूप में प्रस्तुत करने के बारे में सोचा ताकि पिता का संदेह समाप्त हो जाए।इन आयतों से हमने सीखा कि जब तक ठोस प्रमाण और साक्ष्य न मिल जाए तब तक आरोपियों के संबंध में निर्णय करते समय जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। हज़रत यूसुफ़ के बड़े भाई ने कहा कि बिनयामिन को चोरी के आरोप में पकड़ा गया है किन्तु हमें वास्तविकता का ज्ञान नहीं हैबुरा अतीत, मनुष्य की सच्ची बात के संबंध में भी लोगों के संदेह का कारण बनता है, हमें अपने अतीत के संबंध में बहुत सतर्क रहना चाहिए।