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    सूरए यूसुफ़, आयतें 83-86, (कार्यक्रम 396)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 83 और 84 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ أَنْفُسُكُمْ أَمْرًا فَصَبْرٌ جَمِيلٌ عَسَى اللَّهُ أَنْ يَأْتِيَنِي بِهِمْ جَمِيعًا إِنَّهُ هُوَ الْعَلِيمُ الْحَكِيمُ (83) وَتَوَلَّى عَنْهُمْ وَقَالَ يَا أَسَفَى عَلَى يُوسُفَ وَابْيَضَّتْ عَيْنَاهُ مِنَ الْحُزْنِ فَهُوَ كَظِيمٌ (84)(हज़रत याक़ूब ने) कहा, तुम्हारे मन (की इच्छाओं) ने, मामले को इस प्रकार तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत किया अतः अब भली प्रकार से धैर्य से काम लेना आवश्यक है। आशा है कि ईश्वर उन सबको मुझे लौटा दे कि निसंदेह वही सबसे अधिक जानकार और तत्वदर्शी है। (12:83) और वे (अपने पुत्रों से) मुंह फेरकर बैठ गए और कहा, हाय यूसुफ़! और इसके बाद दुख के मारे उनकी दोनों आखें सफ़ेद हो गईं किन्तु वे अपने क्रोध को पीते रहे। (12:84)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाई अपने पिता के पास लौटे जबकि बिनयामिन हज़रत यूसुफ़ के पास मिस्र में ही रुके रहे। उनके भाइयों ने जो कुछ देखा था उसके आधार पर उन्होंने बिनयामिन को चोर बताया।इन आयतों में हज़रत याक़ूब अपने बेटों से कहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस बार भी तुम्हारी आंतरिक इच्छाओं ने एक बुरे कर्म को तुम्हें सुंदर बना कर दिखाया जिसके परिणाम स्वरूप बिनयामिन को मिस्र में ही रुकना पड़ा और मुझे यूसुफ़ के साथ ही बिनयामिन का भी विरह सहना करना पड़ेगा किन्तु मैं धैर्य करूंगा और मुझे आशा है कि ईश्वर उन्हें अवश्य लौटाएगा और हम सब पुनः एक साथ जीवन व्यतीत करेंगे।अलबत्ता हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम का धैर्य वेदना और दुख के साथ था और वे अपने पुत्रों के विरह में इतना रोए कि उनकी आखें चली गईं क्योंकि वे अपने दुख को ज़बान पर नहीं लाते थे किन्तु उनका मन बहुत अधिक दुखी रहता था। यद्यपि हज़रत यूसुफ़ के भाइयों ने इस बार कोई ग़लती नहीं की थी और वे बिनयामिन को कोई क्षति भी नहीं पहुंचाना चाहते थे किन्तु ये समस्याएं, यूसुफ़ के बारे में उनके बुरे व्यवहार की याद दिलाती थीं, यही कारण था कि हज़रत याक़ूब ने इस स्थान पर भी अपने पुत्रों की आलोचना की और स्वयं को धैर्य व संयम की सिफ़ारिश की, अलबत्ता ऐसा धैर्य जिसमें ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध कुछ न कहा जाए।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर पर ईमान रखने वाला व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में धैर्य करता है क्योंकि वह जानता है कि कठिनाइयां, अकारण नहीं होतीं और ईश्वर मनुष्य की सभी बातों से अवगत है।अपने प्रियजनों के विरह पर रोना एक स्वाभाविक बात है, ईश्वर के प्रिय बंदे भी इससे अपवाद नहीं हैं।यूसुफ़ का महत्त्व इतना अधिक था कि उनके पिता उनके विरह में रोते रोते अंधे हो गए, यहां तक कि जब उन्हें बिनयामिन के बंदी बनाए जाने का समाचार मिला तब भी उन्होंने यूसुफ़ का नाम लिया और उनके विरह पर दुखी हुए।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 85 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا تَاللَّهِ تَفْتَأُ تَذْكُرُ يُوسُفَ حَتَّى تَكُونَ حَرَضًا أَوْ تَكُونَ مِنَ الْهَالِكِينَ (85)(हज़रत याक़ूब के पुत्रों ने) कहा, ईश्वर की सौगंध! आप यूसुफ़ को इतना याद करेंगे कि बीमार पड़ जाएंगे अथवा प्राण त्याग देंगे। (12:85)स्पष्ट है कि मिस्र में बिनयामिन के गिरफ़्तार कर लिए जाने से हज़रत याक़ूब का घाव हरा हो गया और वे हज़रत यूसुफ़ को याद करने लगे किन्तु उनके भाई जो उनके अस्तित्व को सहन नहीं कर सकते थे, यह नहीं चाहते थे कि उनके पिता यूसुफ़ का नाम लें अतः उन्होंने हज़रत याक़ूब से कहा कि यदि उनकी यही स्थिति रही तो यूसुफ़ का दुख आपकी जान ले लेगा। उसे भूल जाइये क्योंकि हमने स्वयं अपनी आंखों से देखा था कि भेड़िया उसे खा गया था, आप स्वयं को क्यों इतना तड़पाते हैं।अलबत्ता यह बात भी स्पष्ट है कि वही यूसुफ़ के विरह में तड़पेगा जो उनके गुणों से अवगत होगा। उन भाइयों को यूसुफ़ से क्या प्रेम होगा जो उन पर पिता के स्नेह से ईर्ष्या करते हों और किसी न किसी प्रकार उन्हें पिता से दूर करने का षड्यंत्र रचते हों।इस आयत से हमने सीखा कि हज़रत याक़ूब, हज़रत यूसुफ़ के गुणों को पहचान कर उनसे प्रेम करते थे और यही कारण था कि वे सदैव उन्हें याद करते रहते थे। हमें भी यह देखने के लिए कि हम ईश्वर से कितना प्रेम करते हैं, यह देखना चाहिए कि हम उसे कितना याद करते हैं।हमें भौतिक प्रेम के स्थान पर वास्तविकता और गुणों से प्रेम करना चाहिए।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 86 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ إِنَّمَا أَشْكُو بَثِّي وَحُزْنِي إِلَى اللَّهِ وَأَعْلَمُ مِنَ اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ (86)याक़ूब ने कहा, मैं अपने (प्रकट) दुख और (छिपे) शोक की शिकायत केवल ईश्वर के समक्ष करता हूं और मैं ईश्वर की ओर से वह कुछ जानता हूं जो तुम नहीं जानते। (12:86)क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों से पता चलता है कि ईश्वर के प्रिय बंदे अपने दुखों व कठिनाइयों का उल्लेख ईश्वर से करते हैं और उससे अपनी कठिनाइयों और समस्याओं के सामाधान की प्रार्थना करते हैं। जैसा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी दरिद्रता की समाप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की और हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से अपने रोग और अन्य समस्याओं की समाप्ति का निवेदन किया।इस आयत में हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ईश्वर से अपने पुत्र के वियोग की शिकायत करते हैं क्योंकि पैग़म्बरों की दृष्टि में अनुकंपाएं प्रदान करना ईश्वर की कृपा है जबकि उन्हें वापस लेना उसकी तत्वदर्शिता के आधार पर होता है अतः दोनों परिस्थितियों में ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करना चाहिए किन्तु इसी के साथ कठिनाई की समाप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहना चाहिए।इसके अतिरिक्त यह बात भी थी कि हज़रत याक़ूब अलैहिस्ससलाम को विश्वास था कि हज़रत यूसुफ़ जीवित हैं, क्योंकि उन्होंने जो स्वप्न देखा था वह इस बात की पुष्टि करता था। यदि उन्हें यह ज्ञात होता कि हज़रत यूसुफ़ अब इस संसार में नहीं हैं तो वे उन्हें भुला सकते थे।इस आयत से हमने सीखा कि अपनी समस्याओं के बारे में लोगों से शिकायत करना निंदनीय है किन्तु ईश्वर के समक्ष गिड़गिड़ाना, ईश्वर के पवित्र बंदों की शैली है।कभी भी ईश्वर की कृपा की ओर से निराश नहीं होना चाहिए, उज्जवल भविष्य की आशा रखना, ईश्वर के प्रिय बंदों की एक विशेषता है।