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    सूरए यूसुफ़, आयतें 87-89, (कार्यक्रम 397)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 87 की तिलावत सुनते हैं।يَا بَنِيَّ اذْهَبُوا فَتَحَسَّسُوا مِنْ يُوسُفَ وَأَخِيهِ وَلَا تَيْئَسُوا مِنْ رَوْحِ اللَّهِ إِنَّهُ لَا يَيْئَسُ مِنْ رَوْحِ اللَّهِ إِلَّا الْقَوْمُ الْكَافِرُونَ (87)(हज़रत याक़ूब ने कहा) हे मेरे बच्चो! जाओ और यूसुफ़ तथा उसके भाई को खोजो और ईश्वर की दया से निराश न हो कि निश्चित रूप से ईश्वर की दया से काफ़िर गुट के अतिरिक्त कोई निराश नहीं होता। (12:87)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि जब हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम के पुत्रों ने उन्हें बिनयामिन को मिस्र में रोक लिए जाने की सूचना दी तो उन्हें अपने दूसरे पुत्र हज़रत यूसुफ़ की याद आ गई और वे ईश्वर के समक्ष बहुत रोए और गिड़गिड़ाए और उससे प्रार्थना की कि वह उनके पुत्रों को लौटा दे।चूंकि हज़रत याक़ूब, अपने पुत्र यूसुफ़ द्वारा देखे गए स्वप्न के आधार पर जानते थे कि वे जीवित हैं और बहुत ही उच्च स्थान तक पहुंचेगे अतः उन्होंने अपने पुत्रों से कहा कि वे मिस्र वापस जाएं और यूसुफ़ के बारे में पूछताछ करें और उन्हें खोजकर लाएं और साथ ही बिनयामिन को स्वतंत्र करने का मार्ग खोजें और सबको लेकर उनके पास आएं।हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने अपने पुत्रों को यूसुफ़ को खोजने के संबंध में आशावान बनाने के लिए और अपनी बात का तर्क प्रस्तुत करने के लिए कहा कि ईश्वर पर ईमान रखने वाला व्यक्ति कभी भी उसकी दया व कृपा की ओर से निराश नहीं होता और ईश्वर की दया की ओर से निराशा, कुफ़्र की निशानी है।इस आयत में आशा के लिए जो शब्द प्रयोग किया गया है वह रौह है जिसका मूल तत्व रीह अर्थात हवा है। इसका अर्थ यह है कि हवा चलने से मनुष्य शांति व संतोष का आभास करता है। क़ुरआने मजीद के कुछ व्याख्याकारों का कहना है कि रौह शब्द, रूह अर्थात प्राण से लिया गया है। क्योंकि जब मनुष्य की समस्याएं दूर हो जाती हैं तो उसे ऐसा लगता है कि जैसे उसमें नए प्राण फूंक दिए गए हों।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय दया व कृपा की प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए। घर में बैठकर ईश्वरीय दया की आशा रखना निरर्थक है। हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने भी अपने पुत्रों से कहा कि यूसुफ़ को खोजने का प्रयास करो और ईश्वरीय दया की ओर से भी निराश मत हो।ईश्वर के प्रिय बंदे सदैव लोगों को ईश्वरीय कृपा की ओर से आशावान रखते हैं और लोगों को निराश करने वाले, ईश्वरीय धर्म से दूर होते हैं।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 88 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا دَخَلُوا عَلَيْهِ قَالُوا يَا أَيُّهَا الْعَزِيزُ مَسَّنَا وَأَهْلَنَا الضُّرُّ وَجِئْنَا بِبِضَاعَةٍ مُزْجَاةٍ فَأَوْفِ لَنَا الْكَيْلَ وَتَصَدَّقْ عَلَيْنَا إِنَّ اللَّهَ يَجْزِي الْمُتَصَدِّقِينَ (88)तो जब वे यूसुफ़ के पास पहुंचे तो कहा कि हे (मिस्र के) शासक! हमें और हमारे परिवार को भयंकर अकाल ने चपेट में ले लिया है और हम (अनाज ख़रीदने के लिए) बहुत थोड़ा माल लेकर आए हैं तो हमें हमारा पूरा भाग दे दो और हम पर उपकार करो कि निसंदेह ईश्वर उपकार करने वालों को भला बदला देता है। (12:88)हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाई जब तीसरी बार उनके पास गए तो उन्होंने बहुत ही गिड़गिड़ा कर उनसे कहा कि इस बार वे अनाज ख़रीदने के लिए बहुत थोड़े पैसे लेकर आए हैं किन्तु उन्हें आशा है कि उन्हें पूरा भाग दिया जाएगा।उन्होंने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से अनुरोध किया कि वे पहली बार की भांति जब उन्होंने उनके पैसे लौटा दिए थे, इस बार उनसे पूरे पैसे न लें और उनके साथ दया व कृपा का व्यवहार करें।इस आयत से हमने सीखा कि दरिद्रता और आवश्यकता, मनुष्य के अहं को तोड़ देती है, वे भाई जो बहुत घमंड से कहा करते थे कि हम शक्तिशाली गुट हैं और सोचते थे कि उनके पिता ग़लती पर हैं, आज वे गिड़गिड़ा कर अनाज मांग रहे हैं।ईश्वरीय प्रतिफल, लोगों में दूसरों की सेवा व सहायता की दृढ़ प्रेरणा उत्पन्न करता है।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 89 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ هَلْ عَلِمْتُمْ مَا فَعَلْتُمْ بِيُوسُفَ وَأَخِيهِ إِذْ أَنْتُمْ جَاهِلُونَ (89)(हज़रत यूसुफ़ ने) कहा, क्या तुम्हें पता चल गया कि तुमने यूसुफ़ और उसके भाई के साथ क्या किया जब तुम अज्ञानी थे? (12:89)अनाज प्राप्त करने के लिए अपने भाइयों की ओर से गिड़गिड़ा कर किए गए अनुरोध ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की पवित्र और प्रेम से भरी आत्मा पर इतना प्रभाव डाला कि वे उनके साथ अपने संबंध और अपने ऊपर बीतने वाली घटनाओं को छिपा नहीं सके। अतः उन्होंने एक अर्थपूर्ण प्रश्न पूछकर अपने भाइयों को चौंका दिया और वे उन्हें पहचान गए। हज़रत यूसुफ़ ने यह कहने के स्थान पर कि मैं वही यूसुफ़ हूं और तुम मेरे वही दोषी भाई हो, यह कहा कि क्या तुम्हें याद है कि तुमने उस समय यूसुफ़ और उसके भाई बिनयामिन के साथ अज्ञानता में क्या किया था जब तुम अहंकारी युवा थे?उन्होंने यह प्रश्न पूछ कर अपने भाइयों को यह समझा दिया कि उन्हें अपने और उनके बारे में सब कुछ पता है और यदि आज वे विवश होकर उनसे भलाई की आशा रखते हैं तो उन्हें भी अपने बुरे अतीत के संबंध में ईश्वर से क्षमा मांगते हुए तौबा व प्रायश्चित करना चाहिए।हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के इस व्यवहार में जो बिन्दु सबसे महत्त्वपूर्ण है वह यह है कि उन्होंने अपने भाइयों से कहा कि तुम ने यह सब जान बूझकर नहीं बल्कि अज्ञानता के कारण किया, मानो वे उनसे कह रहे हों कि इसमें तुम्हारा बहुत अधिक दोष नहीं था, तुम शैतान के धोखे में आ गए और ऐसा ग़लत काम कर बैठे। तुम तो मेरे भाई हो और तुम मेरे साथ कोई बुराई नहीं करना चाहते थे, यह तो शैतान था जिसने हमारे बीच जुदाई डाल दी और यह सारी समस्याएं उत्पन्न कीं। जैसा कि इसी सूरे की आयत नंबर एक सौ में भी यही बात कही गई है।इस आयत से हमने सीखा कि अन्य लोगों विशेषकर अपने सगे संबंधियों के बारे में किया जाने वाला अत्याचार, भुलाया नहीं जा सकता और किसी न किसी दिन अवश्य ही सामने आता है।शौर्य कहता है कि कल जिन लोगों ने हम पर अत्याचार किया था और आज उन्हें हमारी आवश्यकता है, सत्ता प्राप्त होने पर हमें उनके साथ भलाई का व्यवहार करना चाहिए, प्रतिशोध नहीं लेना चाहिए।