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    सूरए यूसुफ़, आयतें 90-92, (कार्यक्रम 398)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 90 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا أَئِنَّكَ لَأَنْتَ يُوسُفُ قَالَ أَنَا يُوسُفُ وَهَذَا أَخِي قَدْ مَنَّ اللَّهُ عَلَيْنَا إِنَّهُ مَنْ يَتَّقِ وَيَصْبِرْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ الْمُحْسِنِينَ (90)(हज़रत यूसुफ़ के भाइयों ने) कहा, क्या तुम ही यूसुफ़ हो? उन्होंने कहा, (हां) मैं ही यूसुफ़ हूं और यह मेरा भाई है। ईश्वर ने हम पर कृपा की है, निश्चत रूप से जो कोई ईश्वर से डरे और संयम से काम ले तो ईश्वर कभी भी भलाई करने वालों के प्रतिफल को व्यर्थ नहीं जाने देता। (12:90)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने उसके समक्ष अपने दुखों और कठिनाइयों का वर्णन किया तो उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने स्वयं को पहचनवाने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उनसे पूछा कि क्या तुम्हें इस बात का ज्ञान है कि यूसुफ़ और उनके भाई पर क्या बीती?सहसा ही उनके भाइयों को यह आभास हुआ कि यह व्यक्ति उनके भाई यूसुफ़ के बारे में कैसे जानता है? उन्होंने सोचना आरंभ किया और फिर उनके मन में यह बात आई कि कहीं यह व्यक्ति यूसुफ़ ही न हो? आयत कहती है कि वे एक साधारण से प्रश्न से यह समझ गए कि उनके भाई यूसुफ़ आज किस स्थान तक पहुंच चुके हैं किन्तु हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने इन सारी बातों को ईश्वर का उपकार बताते हुए कहा कि ईश्वर ने हम पर कृपा की और आज हम सब को एकत्रित कर दिया।स्वाभाविक है कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की ओर से इस प्रकार के व्यवहार ने उनके भाइयों को अधिक लज्जित कर दिया होगा जिन्होंने उन पर बहुत अत्याचार किए थे किन्तु दूसरी ओर वे अत्याधिक प्रसन्न भी थे और अपनी इस प्रसन्नता को छिपा नहीं पा रहे थे। शायद यूसुफ़ को गले लगाना, उनके जीवन का सबसे स्मरणीय पल था जिसने लज्जा और प्रसन्नता को एकत्रित कर दिया था।किन्तु क़ुरआने मजीद इस प्रकार की भावनाओं के उल्लेख के स्थान पर कि जो बहुत ही स्वाभाविक होती हैं और ऐसी परिस्थितियों में सभी लोगों के भीतर उत्पन्न हो सकती हैं, इस ईश्वरीय कृपा के कारणों का उल्लेख करते हुए कहता है, यदि हज़रत यूसुफ़ को इस प्रकार का उच्च स्थान प्राप्त हुआ तो उसका कारण यह है कि वे पाप के समक्ष झुके नहीं बल्कि डटे रहे और ईश्वर, इस प्रकार के लोगों के बदले को व्यर्थ नहीं जाने देता बल्कि इसी संसार में उन्हें सम्मान और सत्ता प्रदान करता है।इस आयत से हमने सीखा कि बहुत सी वास्तविकताएं समय बीतने के बाद स्पष्ट होती हैं और जो बात सदैव रहने वाली है वह सत्य है।सत्ता के योग्य वह होता है जो कटु घटनाओं, सत्ता और आंतरिक इच्छाओं के संबंध में भलि भांति परीक्षा में उत्तीर्ण हो।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 91 और 92 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا تَاللَّهِ لَقَدْ آَثَرَكَ اللَّهُ عَلَيْنَا وَإِنْ كُنَّا لَخَاطِئِينَ (91) قَالَ لَا تَثْرِيبَ عَلَيْكُمُ الْيَوْمَ يَغْفِرُ اللَّهُ لَكُمْ وَهُوَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ (92)(हज़रत यूसुफ़ के भाइयों ने) कहा, ईश्वर की सौगंध! ईश्वर ने तुम्हें हम पर श्रेष्ठता प्रदान की है, और हम ही दोषी थे। (12:91) उन्होंने कहा, आज तुम्हारी कोई पकड़ नहीं है, ईश्वर तुम्हें क्षमा करे और वह सबसे अधिक क्षमाशील है। (12:92)जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने उन्हें पहचान लिया और उनके भले व्यवहार को देखा तो अपने पिछले रवैये पर लज्जित हुए और उन्होंने उनके संबंध में किए गए अत्याचार को स्वीकार किया और कहा कि तुम हर दृष्टि से हम से उत्तम और श्रेष्ठ हो और हमने आकारण तुमसे ईर्ष्या की।हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने एक बार फिर महानता का प्रदर्शन करते हुए कि जो हुआ सो हुआ अब उसके बारे में बात न करें और आज के विचार में रहें कि हम सब एकत्रित और सकुशल हैं अतः आज अपने आपको धिक्कारने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप लोगों ने अतीत में कोई ग़लती की भी है तो आशा है कि ईश्वर आप लोगों को क्षमा कर देगा।इस्लाम के आरंभिक काल में भी जब इस्लामी सेना ने मक्का नगर पर विजय प्राप्त की तो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के कुछ साथियों ने अनेकेश्वरवादियों से प्रतिशोध लेने की योजना बनाई किन्तु पैग़म्बर ने कहा कि आज दया का दिन है और उन्होंने आम क्षमा की घोषणा की। इसके बाद आपने प्रतिशोध लेने की योजना बनाने वालों से कहा कि आज मैंने वही काम किया है जो मेरे भाई यूसुफ़ ने अपने पापी भाइयों के साथ किया था और उन्हें क्षमा कर दिया था।इस्लामी शिक्षाओं में इस बात पर बहुत अधिक बल दिया गया है कि जब किसी को शक्ति और सत्ता प्राप्त हो जाए तो उसे उन लोगों को क्षमा कर देना चाहिए कि यह कार्य सत्ता की प्राप्ति पर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता जताने के समान है। अलबत्ता हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की महानता इससे कहीं अधिक थी कि वे केवल अपने भाइयों को क्षमा करते अतः उन्होंने ईश्वर से अपने भाइयों को क्षमा करने की प्रार्थना की और उन्हें आशा दिलाई कि ईश्वर उन्हें क्षमा कर देगा। स्वाभाविक है कि जहां ईश्वर का बंदा क्षमा करे वहां ईश्वर से क्षमा के अतिरिक्त किसी अन्य बात की आशा नहीं रखी जा सकती।इन आयतों से हमने सीखा कि ईर्ष्या के कारण किसी के गुणों को छिपाना नहीं चाहिए क्योंकि एक दिन ऐसा आता है जब हमें अपमान के साथ उसे स्वीकार करना पड़ता है।यदि हम अपने आप को समझें और उसे स्वीकार करें तो ईश्वर की ओर से उन्हें क्षमा किए जाने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।जिन लोगों ने हम पर अत्याचार किया है और अपने कार्य से लज्जित हैं, उन्हें क्षमा कर देना चाहिए और उन पर कटाक्ष नहीं करना चाहिए।सत्ता और शक्ति की चरम सीमा पर क्षमा करना, ईश्वर के प्रिय बंदों का चरित्र है।