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    सूरए यूसुफ़, आयतें 93-95, (कार्यक्रम 399)

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    आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 93 की तिलावत सुनते हैं।اذْهَبُوا بِقَمِيصِي هَذَا فَأَلْقُوهُ عَلَى وَجْهِ أَبِي يَأْتِ بَصِيرًا وَأْتُونِي بِأَهْلِكُمْ أَجْمَعِينَ (93)(हज़रत यूसुफ़ ने) कहा, मेरी इस क़मीस को ले जाओ और इसे मेरे पिता के चेहरे पर डाल दो तो (उनकी आंखें वापस आ जाएंगी और वे) देखने लगेंगे और फिर अपने सभी परिजनों को लेकर मेरे पास आओ। (12:93)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि अंततः हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाइयों ने उन्हें पहचान लिया और अतीत में अपने बुरे व्यवहार के कारण लज्जित हो कर उनसे क्षमा मांगी किन्तु हज़रत यूसुफ़ की महानता इससे कहीं अधिक थी कि वे अपने भाइयों को दंडित करते। उन्होंने बहुत स्नेह से अपने भाइयों को गले लगाया और कहा कि मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह भी तुम्हारी ग़लतियों को क्षमा करे।जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम और उनके भाइयों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित हो गया तो उनके भाइयों ने इस दौरान जो कुछ उनके और उनके पिता के साथ हुआ था सब कुछ हज़रत यूसुफ़ को सुनाया और कहा कि उनके वियोग में हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम इतना रोए हैं कि उनकी आंखें चली गई हैं। अतः हज़रत यूसुफ़ ने उन लोगों को अपनी क़मीस दी और कहा कि वे इसे पिता के पास लेकर जाएं और उनके मुख पर डाल दें, इससे उनकी आंखें लौट आएंगी।रोचक बात यह है कि हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम स्वयं पैग़म्बर थे और उनकी प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती किन्तु ईश्वर ने यह निर्धारित किया था उनके पुत्र की क़मीस उनकी आंखों के ठीक होने का कारण बने, इससे पता चलता है कि न केवल ईश्वर के प्रिय और पवित्र बंदों का अस्तित्व ही भलाई और अनुकंपा का कारण है बल्कि उनके वस्त्र से भी अनुकंपाएं और विभूतियां प्राप्त की जा सकती हैं। इसमें वस्त्र के रंग और प्रकार की कोई भूमिका नहीं है, महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह ईश्वर के किसी प्रिय व पवित्र बंदे के साथ रहा हो।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के प्रिय बंदों से संबंधित वस्तुओं से विभूति प्राप्त करना वैध है और वे दुखों और रोगों को समाप्त कर सकती हैं।दुख भरी यादें रखने वालों के वातावरण को परिवर्तित करने से उन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने अपने परिवार को मिस्र बुलाकर उनके वातावरण को परिवर्तित करने का प्रयास किया।आइये अब सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 94 और 95 की तिलावत सुनते हैं। وَلَمَّا فَصَلَتِ الْعِيرُ قَالَ أَبُوهُمْ إِنِّي لَأَجِدُ رِيحَ يُوسُفَ لَوْلَا أَنْ تُفَنِّدُونِ (94) قَالُوا تَاللَّهِ إِنَّكَ لَفِي ضَلَالِكَ الْقَدِيمِ (95)और जब कारवां (मिस्र से) रवाना हुआ तो उनके पिता ने कहा, यदि तुम यह न समझो कि मेरा दिमाग़ चल गया है तो निश्चित रूप से मुझे यूसुफ़ की सुगंध का आभास हो रहा है (12:94) (उन्होंने) कहा कि ईश्वर की सौगंध! आप तो अब भी अपने पुराने भ्रम में पड़े हुए हैं। (12:95)हज़रत याक़ूब और हज़रत यूसुफ़ अलैहिमस्सलाम के बीच आत्मिक संबंध इतना प्रगाढ़ था कि जब हज़रत यूसुफ़ की क़मीस लेकर कारवां मिस्र से रवाना हुआ तो हज़रत याक़ूब ने जो वर्तमान सीरिया में थे, उसके अस्तित्व का आभास कर लिया। चूंकि वे जानते थे कि उनके परिवार वालों में से कोई भी उनकी बात को स्वीकार नहीं करेगा, अतः उन्होंने कहा कि यदि तुम मुझे पागल न समझो तो मैं तुम्हें बता रहा हूं कि मुझे यूसुफ़ की सुगंध का आभास हो रहा है।स्वाभाविक सी बात है कि परिवार के लोग उनके निकट थे वे उनसे कहते कि यूसुफ़ की मृत्यु को कई वर्ष बीत चुके हैं और आप अब भी यही समझते हैं कि वे जीवित हैं। आप कह रहे हैं कि मुझे उनकी सुगंध का आभास हो रहा है यह सारी बातें आपके पिछले भ्रम का परिणाम हैं।यह बात कि हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम को इतनी दूर से अपने पुत्र के अस्तित्व का किस प्रकार से आभास हो गया तो इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि यह पैग़म्बरों को प्राप्त विशेष ईश्वरीय ज्ञान के आधार पर भी हो सकता है, उदाहरण स्वरूप कोई माता अपनी संतान से बहूत दूर होने के बावजूद कभी कभी उसके बारे में चिंतित और व्याकुल हो जाती है और बाद में पता चलता है कि उसी समय उसकी संतान किसी कठिनाई या समस्या में ग्रस्त हो गई थी।अब यह भी प्रश्न मन में आ सकता है कि हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम को उसी समय इस प्रकार का आभास क्यों न हुआ जब हज़रत यूसुफ़ को कुएं में डाला गया या कारावास में डाला गया? और उन्होंने पहले इस प्रकार की बात क्यों न कही? इसका उत्तर यह है कि यह बात ईश्वर के गुप्त ज्ञानों में से हैं और उसी के हाथ में है तथा मनुष्य की उसमें कोई भूमिका नहीं है। ईश्वर ने इरादा किया था कि हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम कठिनाइयां और दुख सहन करके अनुभव प्राप्त करें और मिस्र जैसे देश के संचालन के योग्य हो जाएं। हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम को भी इस अवधि में उनकी प्रतीक्षा करते हुए हर अवसर पर संयम से काम लेना चाहिए था।इन्हीं में से एक अवसर उनके परिजनों और बच्चों का अप्रिय व्यवहार था जो उन्हें भ्रम में ग्रस्त समझ रहे थे जबकि साधारण लोगों को ईश्वर के प्रिय बंदों की बुद्धि को अपनी साधारण बुद्धि से नहीं परखना चाहिए।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य अपनी विदित इंद्रियों के अतिरिक्त कुछ ऐसी बातों का भी आभास कर सकता है जो अन्य लोगों की क्षमता से बाहर हैं। अलबत्ता यह सब बात उसके साथ नहीं होती बल्कि ईश्वर की आज्ञा से ही हो सकती है।जिस बात को हम नहीं जानते और नहीं समझते उसका तुरंत इन्कार नहीं कर देना चाहिए, हमें यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि संभवतः कुछ बातें ऐसी हैं जिनका हम आभास नहीं कर पाते किन्तु दूसरे लोग उनका आभास कर लेते हैं, जैसे ईश्वर की ओर से अपने पैग़म्बरों को भेजा जाने वाला संदेश।