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    सूरए रअद, आयतें 1-3, (कार्यक्रम 405)

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    इससे पहले सूरए यूसुफ़ की आयतों की व्याख्या समाप्त हुई। अब हम सूरए रअद की आयतों की व्याख्या आरंभ करेंगे। यह सूरा मक्के में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम पर उतरा है और इसमें कुल छियालिस आयतें हैं। सूरए रअद में आकाशों और धरती की सृष्टि, सूर्य और चंद्रमा के ईश्वर के अधीन होने, वनस्पतियों और पेड़ों की सृष्टि, धरती और आकाशों में मौजूद वस्तुओं की ओर से ईश्वर के गुणगान और ईश्वर पर ईमान की छाया में शांति व संतोष की प्राप्ति के बारे में बातें वर्णित हैं। तो आइये अब सूरए रअद की पहली आयत की तिलावत सुनते हैं। بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ المر تِلْكَ آَيَاتُ الْكِتَابِ وَالَّذِي أُنْزِلَ إِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ الْحَقُّ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ (1)ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। अलिफ़ लाम मीम रा। यह (ईश्वर की) किताब की आयतें हैं। और (हे पैग़म्बर!) जो कुछ आपके पालनहार की ओर से आपके पास भेजा गया है वह सत्य है किन्तु अधिकांश लोग ईमान नहीं लाते। (13:1)सूरए रअद का आरंभ भी क़ुरआने मजीद के अन्य 28 सूरों की भांति हुरूफ़े मुक़त्तेआत अर्थात अलग अलग अक्षरों से होता है कि जो क़ुरआने मजीद के रहस्यों में से हैं किन्तु चूंकि प्रायः इन अक्षरों के बाद क़ुरआने मजीद का नाम और उसके भेजे जाने का उल्लेख हुआ है तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ईश्वर यह कहना चाहता है कि क़ुरआन मैंने भेजा है वह यद्यपि अनंतकालीन चमत्कार है किन्तु यह अरबी भाषा के इन साधारण अक्षरों से बना है और यदि तुम में भी क्षमता है तो इन्हीं अक्षरों से क़ुरआने मजीद जैसी कोई किताब ले आओ।आगे चलकर आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम तथा अन्य ईमान वालों को सांत्वना देते हुए कहती है कि यदि बहुत से लोग क़ुरआने मजीद और इस आसमानी किताब की शिक्षाओं पर ईमान नहीं लाते हैं तो उसकी सत्यता में संदेह नहीं करना चाहिए क्योंकि सत्य के साथ द्वेष और हठधर्मी इस बात का कारण बनती है कि कुछ लोग क़ुरआने मजीद को स्वीकार न करें और यह इस आसमानी किताब में कमी को नहीं दर्शाती।इस आयत से हमने सीखा कि किसी मत को स्वीकार करने या न करने का मानदंड लोगों की संख्या नहीं बल्कि उसकी सत्यता है। संभव है कि अनेक लोग विभिन्न कारणों से किसी सत्य बात का इन्कार कर दें।ईमान वालों को यह जानना और स्वीकार करना चाहिए कि सभी लोग ईमान नहीं लाते और उनके विरोध के लिए तैयार रहना चाहिए।आइये अब सूरए रअद की दूसरी आयत की तिलावत सुनते हैं।اللَّهُ الَّذِي رَفَعَ السَّمَاوَاتِ بِغَيْرِ عَمَدٍ تَرَوْنَهَا ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ كُلٌّ يَجْرِي لِأَجَلٍ مُسَمًّى يُدَبِّرُ الْأَمْرَ يُفَصِّلُ الْآَيَاتِ لَعَلَّكُمْ بِلِقَاءِ رَبِّكُمْ تُوقِنُونَ (2)ईश्वर वही है जिसने आकाशों को बिना स्तंभों के उठाया है जैसा कि तुम देख रहे हो। इसके बाद उसने अर्श पर अपनी सत्ता स्थापित की और सूर्य तथा चंद्रमा को (अपने) अधीन बनाया, हर वस्तु एक नियत समय की ओर आगे बढ़ रही है। वही (सृष्टि के कामों की) युक्ति करता है और अपनी आयतों को विस्तार से बयान करता है ताकि शायद तुम्हें (प्रलय में) अपने पालनहार से भेंट पर विश्वास हो जाए। (13:2)मनुष्य के लिए सबसे बड़े ईश्वरीय उपहार के रूप में क़ुरआने मजीद के आने के वर्णन के बाद यह आयत आकाशों और आसमानी उपग्रहों की सृष्टि में ईश्वर की महानता की ओर संकेत करते हुए दो बातों पर बल देती है।प्रथम यह कि अनंत आकाश में करोड़ों तारे व उपग्रह हैं और सब के सब एक निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं किन्तु आपस में टकराते नहीं, मानो किसी अदृश्य स्तंभ ने उन्हें आकाश में रोक रखा है और एक अज्ञात मार्ग उनके रास्ते को निर्धारित कर रहा है और यह ईश्वर की अनंत शक्ति के बिना संभव नहीं है।दूसरे यह कि सृष्टि सदैव ईश्वर के अधीन और उसकी युक्ति के अंतर्गत है। ऐसा नहीं है कि ईश्वर ने जीवों की सृष्टि की और फिर उन्हें उनकी स्थिति पर छोड़ दिया हो। ईश्वर उस घड़ी बनाने वाले की भांति नहीं है जो एक घड़ी बनाता है, उसमें चाबी भरता है और फिर उसे ग्राहक को बेच देता है। इसके बाद उसे उस घड़ी के बारे में कुछ ज्ञान नहीं होता। ईश्वर सृष्टिकर्ता भी है और युक्तिकर्ता भी। वह सदैव अपनी सृष्टि के बारे में युक्ति करता है।इस आयत से हमने सीखा कि पूरी सृष्टि आगे की ओर बढ़ रही है और उसकी यह प्रक्रिया आरंभ से लेकर अंत तक ईश्वर के हाथ में है।सृष्टि का अस्तित्व अकारण नहीं है बल्कि उसके अस्तित्व में आने का उद्देश्य, प्रलय और परलोक का अस्तित्व है।आइये अब सूरए रअद की तीसरी आयत की तिलावत सुनते हैं।وَهُوَ الَّذِي مَدَّ الْأَرْضَ وَجَعَلَ فِيهَا رَوَاسِيَ وَأَنْهَارًا وَمِنْ كُلِّ الثَّمَرَاتِ جَعَلَ فِيهَا زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ يُغْشِي اللَّيْلَ النَّهَارَ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَاتٍ لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ (3)और (ईश्वर) वही है जिसने धरती को बिछाया और उसमें पर्वत और नहरें रखीं और हर फल में से उसने धरती में दो जोड़े रखे। वही है जो रात्रि से दिन को ढांक देता है। निश्चित रूप से इन में उन लोगों के लिए निशानियां हैं जो चिंतन करते हैं। (13:3)पिछली आयत में आकाशों की सृष्टि का वर्णन करने के बाद इस आयत में धरती की सृष्टि, जल और थल के फैलाव, पर्वतों के अस्तित्व में आने और नहरों के जारी होने के बारे में संकेत किया गया है। ईश्वर कहता है कि उसने दिन और रात को लोगों के लिए बनाया है जो क्रमशः एक के बाद एक आते हैं और लोगों के परिश्रम और आराम का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ये सब वनस्पतियों, पेड़ों और फलों के उगने का साधन हैं जिनसे सभी लोग लाभान्वित होते हैं। अतः इस संबंध में थोड़ा सा भी चिंतन इस बात का कारण बनता है कि मनुष्य अपने रचयिता की शक्ति और महानता को समझ जाए और फिर उसके समक्ष नतमस्तक हो जाए।एक रोचक बिंदु जिसकी ओर इस आयत ने ध्यान दिलाया है, वनस्पतियों का जोड़ा होना है और आज से 14 सौ वर्ष पूर्व केवल कुछ पौधों के जोड़े होने की बात प्रमाणित हुई थी और मनुष्य को इस संबंध में अधिक जानकारी नहीं थी किन्तु आज वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि जिस प्रकार से जीवों में जोड़ा होने का सिद्धांत है उसी प्रकार वनस्पतियों में भी यह सिद्धांत पाया जाता है।इस आयत से हमने सीखा कि पानी और मिट्टी धरती पर मौजूद सभी वस्तुओं के जीवन का स्रोत हैं और ईश्वर ने इन दोनों की सृष्टि की तथा वनस्पतियों, पशु-पक्षियों तथा मनुष्य के फलने फूलने एवं उनकी प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया।सृष्टि, निश्चेतना का घर नहीं बल्कि सीखने की कक्षा है।