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    सूरए रअद, आयतें 11-13, (कार्यक्रम 408)

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    आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 11 की तिलावत सुनते हैं।لَهُ مُعَقِّبَاتٌ مِنْ بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِ يَحْفَظُونَهُ مِنْ أَمْرِ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّى يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْ وَإِذَا أَرَادَ اللَّهُ بِقَوْمٍ سُوءًا فَلَا مَرَدَّ لَهُ وَمَا لَهُمْ مِنْ دُونِهِ مِنْ وَالٍ (11)हर एक (मनुष्य) के लिए उसके आगे और पीछे निरीक्षक (फ़रिश्ते) होते हैं जो ईश्वर के आदेश से (दुर्घटनाओं से) उसकी रक्षा करते हैं। निश्चित रूप से ईश्वर किसी जाति की दशा तब तक नहीं बदलता जब तक वह स्वयं अपने आपको नहीं बदलती और जब ईश्वर किसी जाति को क्षति पहुंचाने का निर्णय कर लेता है तो वह टल नहीं सकती और न उसके अतिरिक्त ऐसे लोगों का कोई सहायक ही नहीं हो सकता। (13:11)पिछली आयत में कहा गया था कि ईश्वर हर गुप्त व प्रकट बात से अवगत है और कोई भी बात उससे छिपी नहीं रह सकती, यह आयत कहती है कि ईश्वर ने तुम में से प्रत्येक मनुष्य के लिए ऐसे फ़रिश्तों को निर्धारित किया है जो सदैव तुम्हारा ध्यान रखते हैं और ख़तरों तथा प्राकृतिक आपदाओं से तुम्हारी रक्षा करते हैं। अलबत्ता प्रकृति भी ईश्वर की सृष्टि है अतः जो कुछ प्रकृति में घटता है वह ईश्वर की इच्छा से ही होता है।क़ुरआने मजीद ने प्राकृतिक आपदाओं को ईश्वरीय आदेश का नाम दिया है, इस आधार पर फ़रिश्ते हमें दुर्घटनाओं से बचाते हैं और यह बात हमारी इच्छा और अधिकार से बाहर है। आगे चलकर आयत कहती है कि जो कुछ कहा गया है वह प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित है कि जो तुम्हारे अधिकार में नहीं हैं किन्तु तुम्हारा भविष्य चाहे वह व्यक्तिगत रूप से हो अथवा सामूहिक रूप में स्वयं तुम्हारे अधिकार और नियंत्रण में है और तुम्हें यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि ईश्वर उसके लिए भी फ़रिश्तों को निर्धारित करेगा।यदि मानव समाज में कोई परिवर्तन आना हो और उसे बुराई से भलाई और अत्याचार से न्याय की ओर जाना हो तो ईश्वरीय चमत्कार की प्रतीक्षा में नहीं रहना चाहिए बल्कि अपने प्रयासों द्वारा वर्तमान स्थिति को परिवर्तित करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।आगे चलकर आयत एक अन्य ईश्वरीय परंपरा की ओर संकेत करते हुए कहती है कि यदि लोग अपनी और सामाज की स्थिति में सुधार लाने का प्रयास नहीं करेंगे तो वे अनेक कठिनाइयों और संकटों में ग्रस्त हो जाएंगे और उन्हें ईश्वरीय कोप का पात्र भी बनना पड़ेगा और ऐसी स्थिति में कोई भी उनकी सहायता नहीं कर सकेगा और न ही वे उससे बच सकेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि फ़रिश्तों का एक गुट प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्य की रक्षा के लिए नियुक्त है किन्तु केवल उन अवसरों पर जहां मृत्यु निश्चित नहीं होती।हर समाज का भविष्य उसके लोग ही निर्धारित करते हैं, भला समाज ईश्वर की विभूतियों का पात्र बनता है जबकि पथभ्रष्ट समाज ईश्वरीय कोप का निशाना बनता है।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या बारह और तेरह की तिलावत सुनते हैं।هُوَ الَّذِي يُرِيكُمُ الْبَرْقَ خَوْفًا وَطَمَعًا وَيُنْشِئُ السَّحَابَ الثِّقَالَ (12) وَيُسَبِّحُ الرَّعْدُ بِحَمْدِهِ وَالْمَلَائِكَةُ مِنْ خِيفَتِهِ وَيُرْسِلُ الصَّوَاعِقَ فَيُصِيبُ بِهَا مَنْ يَشَاءُ وَهُمْ يُجَادِلُونَ فِي اللَّهِ وَهُوَ شَدِيدُ الْمِحَالِ (13)वही है जो तुम्हें (बिजली की) चमक दिखाता है जो भय और आशा का कारण है, वही है जो (पानी से) लदे हुए बादलों को उठाता है (13:12) और (बादलों की) गरज और फ़रिश्ते उसके भय के कारण उसकी प्रशंसा के साथ गुणगान करते हैं। वही कड़कड़ाती हुई बिजलियों को भेजता है और उन्हें जिस पर चाहता है गिरा देता है जबकि लोग ईश्वर के बारे में झगड़ते हैं और वह अत्यंत कड़ा दंड देने वाला है। (13:13)बिजली और उसकी चमक व कड़क ऐसी प्राकृतिक बातें हैं जो आकाश में दिखाई देती हैं और ईश्वरीय शक्ति की निशानी समझी जाती हैं। एक ओर तो यह भय का कारण बनती हैं और दूसरी ओर इन्हीं के कारण धरती पर वर्षा होती है।बिजली की कड़क जो एक प्राकृतिक घटना है, क़ुरआने मजीद की दृष्टि में एक प्रकार से ईश्वर का गुणगान है कि जो उसे हर प्रकार की बुराई व समकक्ष से विरक्त समझते हुए उसके अनन्य होने की प्रशंसा करती है। फ़रिश्ते भी जो बादलों और वर्षा की देख रेख के लिए नियुक्त हैं, ईश्वर के आदेशों की उद्दंडता का भय रखते और उसका गुणगान करते हैं।कोई भी बात ईश्वर की इच्छा के बिना नहीं होती और बिजली भी उसकी इच्छा के बिना किसी को क्षति नहीं पहुंचाती तो फिर किस प्रकार काफ़िर और अनेकेश्वरवादी ईश्वर के अस्तित्व के बारे में संदेह करते हैं और इस बारे में झगड़ते हैं? क्या सृष्टि और धरती के लोगों के जीवन में उनकी कोई भूमिका है या वे किसी को ईश्वर का समकक्ष समझते हैं?उल्लेखनीय है कि बिजली की चमक और कड़क, एक प्राकृतिक बात है किन्तु कभी कभी उसे ईश्वरीय दंड के रूप में वर्णित किया गया है। जैसा कि क़ुरआने मजीद समूद जाति के बारे में कहता है कि ईश्वर ने उन्हें बिजली के माध्यम से दंड में ग्रस्त किया। इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम बिजली की कड़क सुनते तो अपनी बात रोक देते और प्रार्थना करने लगते थे।सभी वस्तुओं की ओर से ईश्वर का गुणगान उन बातों में से है जिनका क़ुरआने मजीद में विभिन्न रूपों में वर्णन हुआ है जिससे पता चलता है कि संसार की हर वस्तु में समझ बूझ पाई जाती है किन्तु मनुष्य इस बात को समझ नहीं पाता।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रकृति तथा सृष्टि में प्रकृति की भूमिका की पहचान से ईश्वर पर हमारे ईमान में वृद्धि होनी चाहिए क्योंकि प्रकृति और उसके क़ानून सब के सब ईश्वर की रचना और उसकी शक्ति के अधीन हैं।समस्त प्रकृति ईश्वर का गुणगान करती है, यह बात उचित नहीं है कि मनुष्य सृष्टि का भाग होते हुए भी ईश्वर से विमुख रहे।हर वस्तु ईश्वर के अधिकार में है। बिजली की चमक और कड़क ईश्वर की दया का चिन्ह है किन्तु यह दंड का रूप भी हो सकती है।