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    सूरए रअद, आयतें 14-16, (कार्यक्रम 409)

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    आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 14 की तिलावत सुनते हैं।لَهُ دَعْوَةُ الْحَقِّ وَالَّذِينَ يَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ لَا يَسْتَجِيبُونَ لَهُمْ بِشَيْءٍ إِلَّا كَبَاسِطِ كَفَّيْهِ إِلَى الْمَاءِ لِيَبْلُغَ فَاهُ وَمَا هُوَ بِبَالِغِهِ وَمَا دُعَاءُ الْكَافِرِينَ إِلَّا فِي ضَلَالٍ (14)सत्य का निमंत्रण ईश्वर ही के लिए है और (अनेकेश्वरवाद) ईश्वर को छोड़कर जिन्हें पुकारते हैं वे उनका कोई उत्तर नहीं देते। वे उस व्यक्ति की भांति हैं जिसने अपने दोनों हाथों को पानी की ओर फैला रखा है ताकि उसे अपने मुंह तक पहुंचा सके जबकि वह कदापि पानी को अपने मुंह तक नहीं पहुंचा पाएगा। और (ईश्वर के अतिरिक्त अन्य लोगों व वस्तुओं से) काफ़िरों की प्रार्थना, पथभ्रष्टता के अतिरिक्त कुछ नहीं है। (13:14)पिछली आयतों में धरती व आकाशों की सृष्टि में ईश्वर की शक्ति तथा संसार की सभी वस्तुओं द्वारा ईश्वर के गुणगान के वर्णन के पश्चात यह आयत काफ़िरों की पथभ्रष्टता की ओर संकेत करते हुए कहती है कि वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऐसी वस्तुओं और ऐसे लोगों को पुकारते हैं जो स्वयं उन्हीं की भांति दूसरों पर निर्भर एवं समस्याओं में ग्रस्त हैं तथा उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकते। ऐसे लोग उस व्यक्ति की भांति हैं जो पानी की खोज में रहता है किन्तु उस तक नहीं पहुंच पाता और प्यासा ही रह जाता है।सभी मनुष्य चाहे काफ़िर हों या ईमान वाले, सत्य के प्यासे और वास्तविकता के खोजी होते हैं किन्तु कुछ लोग सत्य तक पहुंचने का मार्ग खो बैठते हैं और ईश्वर पर ईमान लाने के स्थान पर भौतिक वस्तुओं और अपने ही समान मनुष्यों या झूठे देवताओं की शरण में चले जाते हैं, दूसरे शब्दों में वे पानी के स्थान पर मृग तृष्णा की ओर बढ़ते हैं और कभी तृप्त नहीं हो पाते।इस आयत से हमने सीखा कि अन्य लोगों से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति चाहने के स्थान पर ईश्वर से पूरी निष्ठा के साथ की जाने वाली प्रार्थाना अवश्य पूरी होती है।कुफ़्र एवं एकेश्वरवाद का मूल कारण, निराधार विचार और ग़लत कल्पनाएं हैं कि जो मनुष्य को वास्तविकता तक पहुंचने से रोक देती हैं।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 15 की तिलावत सुनते हैं।وَلِلَّهِ يَسْجُدُ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ طَوْعًا وَكَرْهًا وَظِلَالُهُمْ بِالْغُدُوِّ وَالْآَصَالِ (15)जो कुछ आकाशों और धरती में है वह चाहे या ना चाहे, अपनी छाया के साथ भोर समय और शाम को ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होता है। (13:15)सूरए नह्ल की 49वीं आयत की भांति यह आयत भी ईश्वर के समक्ष सभी वस्तुओं और जीवों के सज्दे की बात करती है। इस आयत में बड़ी ही रोचक बात यह कही गई है कि वस्तुओं की छायाएं भी ईश्वर के समक्ष शीश नवाती हैं। शायद इसका तात्पर्य छाया का धरती पर पड़ना हो। मानो क़ुरआने मजीद कह रहा है कि यदि काफ़िर ईश्वर के समक्ष नतमस्तक नहीं होते तो कोई बात नहीं क्योंकि पूरी सृष्टि अपनी समस्त विशालता के साथ ईश्वर के समक्ष नतमस्तक है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहने के दो रूप है। कुछ लोग प्रेम और ज्ञान के आधार पर उसके समक्ष शीश नवाते हैं जबकि कुछ अन्य संकटों और कटु घटनाओं के कारण ईश्वर के समक्ष सिर झुकाने पर विवश हो जाते हैं।केवल धरती के लोग ही नहीं बल्कि सभी आसमानी फ़रिश्ते भी ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहते हैं।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 16 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ مَنْ رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ قُلِ اللَّهُ قُلْ أَفَاتَّخَذْتُمْ مِنْ دُونِهِ أَوْلِيَاءَ لَا يَمْلِكُونَ لِأَنْفُسِهِمْ نَفْعًا وَلَا ضَرًّا قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الْأَعْمَى وَالْبَصِيرُ أَمْ هَلْ تَسْتَوِي الظُّلُمَاتُ وَالنُّورُ أَمْ جَعَلُوا لِلَّهِ شُرَكَاءَ خَلَقُوا كَخَلْقِهِ فَتَشَابَهَ الْخَلْقُ عَلَيْهِمْ قُلِ اللَّهُ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ (16)(हे पैग़म्बर!) उनसे कह दीजिए कि आकाशों और धरती का पालनहार कौन है? कह दीजिए कि (वह) ईश्वर है। कह दीजिए कि क्या तुम लोगों ने उसके अतिरिक्त दूसरों को अपना संरक्षक बना रखा है जिन्हें अपने लिए किसी लाभ या हानि का अधिकार प्राप्त नहीं है? कह दीजिए कि क्या अंधा और आंखों वाला एक समान है? या फिर अंधकार और प्रकाश एक जैसे हैं? क्या इन्होंने ईश्वर के लिए जिन्हें समकक्ष ठहरा रखा है उन्होंने भी ईश्वर की भांति कुछ वस्तुओं की रचना की है जिसके कारण सृष्टि का मामला इनके लिए गड्ड मड्ड हो गया है। कह दीजिए कि ईश्वर हर वस्तु का रचयिता है और अनन्य एवं प्रभुत्वशाली है। (13:16)महत्त्वपूर्ण विषयों के वर्णन हेतु क़ुरआने मजीद की एक शैली प्रश्न व उत्तर के रूप में विषय को प्रस्तुत करना है, चाहे वह विरोधी की ज़बान से हो, समर्थक की ज़बान से हो अथवा पैग़म्बर की ज़बान से। इस आयत में ईश्वर अनेकेश्वरवादियों से बहस व शास्त्रार्थ की शैली का वर्णन करता है कि इसे कहां से आरंभ करना चाहिए और कहा पर समाप्त करना चाहिए।चूंकि अनेकेश्वरवादियों ने ईश्वर को सृष्टि के रचयिता के रूप में स्वीकार कर लिया था अतः पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने उनसे कहा कि यद्यपि तुम इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए तैयार नहीं हो किन्तु जान लो कि सृष्टि का रचयिता वही अनन्य ईश्वर है और पूरी सृष्टि का अधिकार उसी के हाथ में है। उचित नहीं है कि हम यह कहें कि ईश्वर रचयिता तो है किन्तु उसने सृष्टि का प्रबंधन लोगों अथवा पत्थर व लकड़ी से बने देवताओं के हाथ में दे दिया है और तुमने उन्हें अपना ईश्वर मान लिया है। तुम लोग क्यों ऐसों की शरण में जाते हो जो स्वयं तुम्हारी भांति अपने लाभ और हानि के स्वामी नहीं हैं और प्रकृति के नियमों के अधीन हैं?इसके पश्चात ईश्वर ईमान वाले और काफ़िर की स्थिति को, देखने वाले तथा अंधे और प्रकाश तथा अंधकार से उपमा देते हुए कहता है कि जो सत्य को देखता है किन्तु स्वीकार नहीं करता उसमें और अंधे में कोई अंतर नहीं है। जो सत्य के प्रकाश को देखता है किन्तु अपनी आंखें बंद कर लेता है वह अपने आपको अधंकार में डाल देता है और प्रकाश से वंचित हो जाता है।आगे चलकर आयत कहती है कि वे अनेकेश्वरवादी जो ईश्वर के अनन्य होने में आस्था रखते थे, क्या उन्हें संदेह में किसी अन्य को अपना ईश्वर मान लिया है? यह ऐसी स्थिति में है कि जब ईश्वर रचयिता भी है अत्यधिक शक्तिशाली भी कि सभी वस्तुएं जिसके अधीन हैं।इस आयत से हमने सीखा कि हठधर्म और द्वेष, मनुष्य के हृदय को अंधा बना देता है और वह अंधों की भांति प्रकाश से वंचित हो जाता है।किसी में भी अपनी क्षति को रोकने की क्षमता नहीं है अतः वह पूज्य बनने के भी योग्य नहीं है।