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    सूरए रअद, आयतें 17-19, (कार्यक्रम 410)

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    आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 17 की तिलावत सुनते हैं।أَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَسَالَتْ أَوْدِيَةٌ بِقَدَرِهَا فَاحْتَمَلَ السَّيْلُ زَبَدًا رَابِيًا وَمِمَّا يُوقِدُونَ عَلَيْهِ فِي النَّارِ ابْتِغَاءَ حِلْيَةٍ أَوْ مَتَاعٍ زَبَدٌ مِثْلُهُ كَذَلِكَ يَضْرِبُ اللَّهُ الْحَقَّ وَالْبَاطِلَ فَأَمَّا الزَّبَدُ فَيَذْهَبُ جُفَاءً وَأَمَّا مَا يَنْفَعُ النَّاسَ فَيَمْكُثُ فِي الْأَرْضِ كَذَلِكَ يَضْرِبُ اللَّهُ الْأَمْثَالَ (17)ईश्वर ने आकाशों से पानी बरसाया तो नदी नाले अपनी क्षमता के अनुसार बह निकले, फिर बहता हुआ पानी झाग को उठा लाया और उन चीज़ों में भी जिन्हें लोग गहने या अन्य वस्तुएं बनाने के लिए आग में तपाते हैं, ऐसा ही झाग (और मैल) होता है, ईश्वर इस प्रकार सत्य और असत्य की उपमा देता है। फिर जो झाग है वह सूख कर नष्ट हो जाता है और जो वस्तु लोगों को लाभ पहुंचाने वाली होती है, वह धरती में बाक़ी रह जाती है। ईश्वर इस प्रकार (लोगों के लिए) उपमाएं देता है। (13:17)जैसा कि क़ुरआने मजीद इस आयत के अंत में कहता है, ईश्वर सत्य और असत्य की पहचान के लिए लोगों के समक्ष ऐसी बातों की उपमा प्रस्तुत करता है जिन्हें वे देखते और समझते हैं। इस आयत में सत्य को पानी और असत्य को पानी के ऊपर मौजूद झाग की उपमा दी गई है। आकाश से धरती पर आने वाला पानी जीवन का मुख्य स्रोत है और लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है किन्तु जब पानी बरसता है या नदियों तथा नालों से बहता है तो उसमें झाग आ जाता है।यह झाग अस्थाई होता है और बहुत जल्द समाप्त हो जाता है, जो वस्तु बाक़ी रहती है वह पानी है। जैसा कि भट्टियों में जब धातु को पिघलाया जाता है तो उनके ऊपर भी झाग आ जाता है जो बहुत जल्दी समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध धातु बाक़ी बचती है। असत्य भी झाग की भांति होता है जो बहुत थोड़े से समय के लिए अस्तित्व में आता है किन्तु उसका कोई मूल्य नहीं होता। वस्तुओं के ऊपर आने वाला झाग बहुत तेज़ी से सामने आता है किन्तु परिस्थितियों के सामान्य होते ही उसका अंत हो जाता है।कटु व मधुर घटनाओं के दौरान ही सत्य और असत्य का पता चलता है।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 18 की तिलावत सुनते हैं।لِلَّذِينَ اسْتَجَابُوا لِرَبِّهِمُ الْحُسْنَى وَالَّذِينَ لَمْ يَسْتَجِيبُوا لَهُ لَوْ أَنَّ لَهُمْ مَا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا وَمِثْلَهُ مَعَهُ لَافْتَدَوْا بِهِ أُولَئِكَ لَهُمْ سُوءُ الْحِسَابِ وَمَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ وَبِئْسَ الْمِهَادُ (18)जिन लोगों ने अपने पालनहार के निमंत्रण को स्वीकार किया उनके लिए बहुत अच्छा अंत है किन्तु जिन लोगों ने उसके निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया यदि उनके पास जो कुछ धरती में और उसके समान है सब मौजूद हो और वे उसे दंड से बचने के लिए दे दें तब भी उनकी स्थिति अत्यंत बुरी है और उनका ठिकाना नरक है कि जो बहुत की बुरा ठिकाना है। (13:18)यह आयत ईमान वालों और काफ़िरों के अंत की तुलना करते हुए कहती है कि जिन लोगों ने ईश्वर के निमंत्रण को स्वीकार किया उनके लिए बहुत भला और लाभदायक परिणाम है किन्तु जिन लोगों ने इस निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया उनका अंत इतना दयनीय है कि यदि संपूर्ण धरती और उसमें मौजूद सब कुछ उनके अधिकार में हो तो वे उसे ईश्वरीय दंड से बचने के लिए देने पर तैयार हो जाएंगे किन्तु यह बात स्वीकार नहीं की जाएगी और इस संपत्ति द्वारा वे दंड से मुक्ति प्राप्त नहीं कर पाएंगे।अंत में आयत प्रलय के दिन, ईमान न रखने वालों के कड़े हिसाब किताब की ओर संकेत करती है। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनों में आया है कि जो लोग इस संसार में लोगों के साथ कड़ाई करते थे, प्रलय में उनका हिसाब किताब अत्यंत कड़ाई से होगा किन्तु जो लोग क्षमा व दया से काम लेते थे, ईश्वर प्रलय में उनके साथ कड़ाई नहीं करेगा।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 19 की तिलावत सुनते हैं।أَفَمَنْ يَعْلَمُ أَنَّمَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ مِنْ رَبِّكَ الْحَقُّ كَمَنْ هُوَ أَعْمَى إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُولُو الْأَلْبَابِ (19)वह व्यक्ति जो यह जानता है कि जो कुछ आपके पालनहार की ओर से आया है, सत्य है, क्या वह उस व्यक्ति की भांति हो सकता है जो अंधा है। निश्चित रूप से केवल चिंतन करने वाले ही शिक्षा लेते हैं। (13:19)पिछली आयत में ईमान वालों और काफ़िरों की तुलना करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि वे लोग जिनके हृदयों में सत्य ने अपना स्थान बनाया है वे वास्तविक बुद्धिमान और चिंतन करने वाले हैं। इसी कारण वे वास्तविकताओं को देखते और समझते हैं।किन्तु जिन लोगों ने सत्य को स्वीकार नहीं किया है यद्यपि विदित रूप से उनकी आंखें हैं किन्तु उनमें और अंधों में कोई अंतर नहीं है। मानव बुद्धि और प्रवृत्ति की आंखें होती हैं किन्तु अंधविश्वास और ग़लत आस्थाएं उन्हें अंधा बना देती हैं और मनुष्य को वास्तविकताओं को देखने की अनुमति नहीं देतीं। क़ुरआने मजीद में बुद्धिमानों और चिंतन करने वालों के लिए सोलह बार उलुल अलबाब शब्द का प्रयोग किया गया है। यह ऐसे लोग होते हैं जो विदित रुकावटों को पार करके वास्तविकता की जड़ तक पहुंच जाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि हो सकता है कि कोई विदित रूप से नेत्रहीन हो किन्तु अपने प्रकाशमयी हृदय से वास्तविकताओं को देखता हो और इसी प्रकार संभव है कि कोई विदित रूप से तो वस्तुओं को देखता हो किन्तु उसका हृदय अंधा हो और वह वास्तविकताओं को देखने की क्षमता न रखता हो।वह बुद्धि वास्तविक बुद्धि नहीं है जो मनुष्य को ईश्वरीय किताब की सत्यता तक न पहुंचा सके।सदैव सचेत करते रहना आवश्यक है ताकि निश्चेतना उत्पन्न करने वाले तत्व, मनुष्य को वास्तविकताओं से दूर न कर दें।