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    सूरए रअद, आयतें 20-22, (कार्यक्रम 411)

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    आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 20 और 21 की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ يُوفُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَلَا يَنْقُضُونَ الْمِيثَاقَ (20) وَالَّذِينَ يَصِلُونَ مَا أَمَرَ اللَّهُ بِهِ أَنْ يُوصَلَ وَيَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ وَيَخَافُونَ سُوءَ الْحِسَابِ (21)(वास्तविक बुद्धिजीवी) वे लोग हैं जो ईश्वरीय प्रतिज्ञा पर कटिबद्ध रहते हैं और वचनों को नहीं तोड़ते। (13:20) और वे ऐसे हैं कि ईश्वर ने जिन संबंधों को जोड़ने का आदेश दिया है वे उन्हें जोड़ते हैं, अपने पालनहार से डरते हैं और बुरे हिसाब का उन्हें भय लगा रहता है। (13:21)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि क़ुरआने मजीद ने ईमान वालों और काफ़िरों को देखने वालों तथा नेत्रहीनों की संज्ञा देते हुए ईमान वाले को बुद्धिमान तथा चितन करने वाला बताया था। यह आयतें बुद्धिमानों की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहती हैं कि वचनों विशेषकर ईश्वरीय प्रतिज्ञा का पालन उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है। वे कभी भी ईश्वरीय प्रतिज्ञा का उल्लंघन नहीं करते, चाहे वे सत्य प्रेम और न्याय प्रेम जैसी सैद्धांतिक प्रतिज्ञाएं हों, ईश्वर तथा प्रलय पर आस्था जैसी बौद्धिक प्रतिज्ञाएं हों अथवा ईश्वर द्वारा वर्जित की गई वस्तुओं से दूर रहने की धार्मिक प्रतिज्ञाएं हों।अलबत्ता सबसे महत्त्वपूर्ण ईश्वरीय प्रतिज्ञा भ्रष्ट शासकों से संघर्ष और पवित्र नेताओं का अनुसरण है। ईश्वर ने कहा है कि इमामत अर्थात ईश्वरीय नेतृत्व केवल पवित्र और न्यायप्रेमी लोगों को ही प्राप्त हो सकेगा और यह पद अत्याचारियों को कभी भी नहीं मिलेगा। पवित्र क़ुरआने मजीद के सूरए बक़रह की आयत संख्या 124 में कहा गया है कि ईश्वर का पद अर्थात इमामत अत्याचारियों को प्राप्त नहीं होगा।बुद्धिमान तथा ईमान वालों की एक अन्य विशेषता धार्मिक व पारिवारिक संबंधों को सुरक्षित रखना है जिसकी ईश्वर ने अत्यधिक सिफ़ारिश की है। जैसे ईमान वालों के साथ संबंधों की रक्षा जिन्हें ईश्वर ने उनका ईमानी भाई बताया है और अपने सगे संबंधियों के साथ संबंधों की रक्षा जो एक प्रकार से उनकी भावनात्मक तथा आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने स्वर्गवास के समय आदेश दिया था कि उनके सभी परिजनों को चाहे उन्होंने उनके साथ अनुचित व्यवहार ही क्यों न किया हो, कोई न कोई भेंट दी जाए।ईमान वालों की अंतिम विशेषता ईश्वर से डरते रहना है। बुद्धिमान लोगों के भीतर ईश्वर की गहन पहचान के बाद उसका भय पैदा होता है जो ईश्वर की महानता के समक्ष उनके नतमस्तक रहने को दर्शाता है।इन आयतों से हमने सीखा कि सामाजिक संधियों और समझौतों का सम्मान, ईमान वाले तथा बुद्धिमान व्यक्ति की विशेषताओं में से एक है।पारिवारिक संबंधों और आवाजाही को जारी व सुरक्षित रखना और परिजनों की समस्याओं का समाधान करने पर धर्म में बहुत अधिक बल दिया गया है।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 22 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ صَبَرُوا ابْتِغَاءَ وَجْهِ رَبِّهِمْ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَأَنْفَقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً وَيَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ أُولَئِكَ لَهُمْ عُقْبَى الدَّارِ (22)और जिन लोगों ने अपने पालनहार की चाह में संयम से काम लिया, नमाज़ क़ाएम की और जो कुछ हमने उन्हें प्रदान किया है, उसमें से छिप कर भी और खुल कर भी दान किया तथा बुराई को भलाई से दूर किया, ऐसे ही लोगों के लिए प्रलय का घर है। (13:22)ईमान तथा बुद्धि वालों की एक अन्य विशेषता कठिनाइयों तथा ईश्वरीय आदेशों के पालन में धैर्य तथा संयम से काम लेना है। जिसे ईश्वर को प्रसन्न करना है, उसे इस मार्ग में संयम से काम लेना चाहिए। यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि ईश्वर के मार्ग में संयम, उपासनाओं विशेषकर नमाज़ के बिना संभव नहीं है। इसी कारण क़ुरआने मजीद एक अन्य स्थान पर कहता है कि संयम और नमाज़ के माध्यम से सहायता चाहो।समय और स्थान की परिस्थितियों के अनुसार वंचितों और दीन दुखियों की सहायता करना, ईमान वालों की एक अन्य विशेषता है और इसमें गुप्त रूप से तथा खुल्लम खुल्ला सहायता करने में कोई अंतर नहीं है और वे सदैव वंचितों की सहायता के विचार में रहते हैं।इन आयतों में ईमान वालों और बुद्धिमानों की जिस अंतिम विशेषता की ओर संकेत किया गया है और जो नैतिक और सामाजिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावी है, बुराई को भलाई से समाप्त करना है। अलबत्ता स्पष्ट है कि यह नियम किसी ईमान वाले के साथ दूसरे ईमान वाले के अनुचित व्यवहार से संबंधित है कि इस स्थिति में अनुचित व्यवहार की अनेदखी करनी चाहिए किन्तु अत्याचारी और बुरे लोगों के अनुचित व्यवहार के मुक़ाबले में गंभीर रवैया अपनाना चाहिए अन्यथा वे अपने बुरे कर्म के संबंध में अधिक दुस्साहसी हो जाएंगे और उस पर आग्रह करने लगेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम एक व्यापक धर्म है और लोगों के विभिन्न व्यक्तिगत, सामाजिक, भावनात्मक एवं राजनैतिक आयामों पर दृष्टि रखता है।अन्य लोगों से संपर्क तथा वंचितों की सहायता के बिना ईश्वर से संपर्क का कोई लाभ नही है।लोक परलोक में कल्याण तथा सौभाग्य बुद्धिमान ईमान वालों के लिए ही है।