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    सूरए रअद, आयतें 23-26, (कार्यक्रम 412)

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    आइये पहले सूरए रअद की आयत नंबर २३ और २४ की तिलावत सुनें।جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا وَمَنْ صَلَحَ مِنْ آَبَائِهِمْ وَأَزْوَاجِهِمْ وَذُرِّيَّاتِهِمْ وَالْمَلَائِكَةُ يَدْخُلُونَ عَلَيْهِمْ مِنْ كُلِّ بَابٍ (23) سَلَامٌ عَلَيْكُمْ بِمَا صَبَرْتُمْ فَنِعْمَ عُقْبَى الدَّارِ (24)(स्वर्ग में) सदैव रहने वाले बाग़ होंगे जिनमें वे, उनके पूर्वजों, उनकी पत्नियों तथा उनके अग्रजों में से जो भले होंगे, वे प्रवेश करेंगे और फ़रिश्ते हर द्वार से (बधाई देने उनके पास) आएंगे (13:23) (और कहेंगे) तुमने जो धैर्य किया है उसके फलस्वरूप तुम पर सलाम हो, तो प्रलय का घर क्या ही अच्छा है। (13:24)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि वास्तविक ईमान वाले हर स्थिति में धैर्य व संयम से काम लेते हैं, चाहे वह ईश्वर की उपासना हो, वंचितों की सहायता करना हो, या फिर सामाजिक मामले हों। वे विभिन्न कठिनाइयों के समक्ष डट जाते हैं और उनसे मुंह नहीं मोड़ते।ये आयतें कहती हैं कि प्रलय के दिन ऐसे लोग सत्य के मार्ग पर अपनी कटिबद्धता के कारण स्वर्ग में प्रविष्ट होंगे जहां फ़रिश्ते उनका आदर सत्कार करेंगे। स्वाभाविक है कि इस प्रकार के लोगों का प्रशिक्षण पवित्र एवं अच्छे परिवार में हुआ होगा तथा उनकी संतानें भी उन्हीं की भांति पवित्र होंगी। विवाह के संबंध में भी उन्होंने विशेष मानदण्डों को दृष्टिगत रखा होगा तथा उनका जोड़ा भी ईमान वाला एवं पवित्र होगा।इस आधार पर स्वाभाविक रूप से प्रलय के दिन वे अपने माता, पिता, पत्नी एवं संतान के साथ स्वर्ग में जाएंगे। अलबत्ता उनके परिजनों में से ऐसे लोग स्वर्ग में नहीं जा सकेंगे जो भले व पवित्र नहीं होंगे।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनों में आया है कि उचित एवं योग्य नेता के नेतृत्व को स्वीकार करना, इस प्रकार के उच्च स्थान की शर्तों में से एक है। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा है कि अली अलैहिस्सलाम एवं उनके उत्तराधिकारियों का अनुसरण, स्वर्ग में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करता है। इसी प्रकार ईश्वरीय फ़रिश्ते भी इस संसार में ईमान वालों के लिए प्रार्थना करते हैं तथा प्रलय में उनका स्वागत करते हैं और उनकी सेवा में रहते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि स्वर्ग का परिवार ऐसा परिवार है जिसके सभी सदस्य ईश्वर के आदेशों के पालन में एक दूसरे से निष्ठापूर्ण सहयोग करते हैं।सभी परिपूर्णताओं का स्रोत, धैर्य व संयम है। पापों के मुक़ाबले में संयम, ईश्वर के आदेशों के पालन में संयम और कठिनाइयों पर संयम।घर या सभा में प्रविष्ट होते समय सलाम करना, फ़रिश्तों की शैली है।आइये अब सूरए रअद की आयत नंबर २५ की तिलावत सुनें।وَالَّذِينَ يَنْقُضُونَ عَهْدَ اللَّهِ مِنْ بَعْدِ مِيثَاقِهِ وَيَقْطَعُونَ مَا أَمَرَ اللَّهُ بِهِ أَنْ يُوصَلَ وَيُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ أُولَئِكَ لَهُمُ اللَّعْنَةُ وَلَهُمْ سُوءُ الدَّارِ (25)और उन लोगों पर ईश्वर की धिक्कार है जो ईश्वरीय प्रतिज्ञा को दृढ़ करने के पश्चात उसे तोड़ देते हैं, जिन (नातों) को जोड़े रखने का ईश्वर ने आदेश दिया है, उन्हें तोड़ देते हैं तथा धरती में बिगाड़ पैदा करते हैं। ऐसे लोगों के लिए (प्रलय में) अत्यंत बुरा घर है। (13:25)पिछली आयतों में बुद्धिमान, ईमान वाले, धर्मावलम्बी, वचन का पालन करने वाले तथा जीवन में धैर्य व संयम से काम लेने वाले लोगों की ओर संकेत किया गया था। यह आयत ऐसे लोगों की ओर संकेत करती है जो ईश्वरीय प्रतिज्ञाओं को तोड़ते हैं और पवित्र एवं भले लोगों से नाता तोड़ कर भ्रष्ठ लोगों से नाता जोड़ लेते हैं। स्वाभाविक है कि ईश्वर एवं मानवता से विमुख इस प्रकार के लोग, ऐसे कर्म करते हैं जो धरती में रहने वालों के बीच बुराइयां व्याप्त होने का कारण बनते हैं। इस प्रकार वे लोक परलोक में ईश्वरीय दया से दूर हो जाते हैं।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनों में आया है कि ईश्वर ने जिन बातों की अत्यधिक सिफ़ारिश की है, उनमें से एक अपने परिजनों तथा नातेदारों से मेल जोल रखना तथा उनकी समस्याओं का निवारण करना है। प्रायः जो लोग ईश्वरीय धर्म पर कटिबद्ध नहीं होते वे अपने परिवार का भी अधिक ध्यान नहीं रखते।इस आयत से हमने सीखा कि संसार में ईमान वालों तथा अवज्ञाकारियों के अंत की तुलना करने से सत्य और असत्य के मार्ग की पहचान सरल हो जाती है।मनुष्य की सभी बुराइयों और पथभ्रष्टता का आरंभ, ईश्वर तथा आसमानी धर्मों से दूर रहने से होता है।आइये अब सूरए रअद की आयत नंबर २६ की तिलावत सुनें।اللَّهُ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَاءُ وَيَقْدِرُ وَفَرِحُوا بِالْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَمَا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا فِي الْآَخِرَةِ إِلَّا مَتَاعٌ (26)ईश्वर जिसे चाहता है कि उसकी आजीविका अर्थात रोज़ी में वृद्धि कर देता है या उसमें कमी कर देता है और काफ़िर सांसारिक जीवन पर प्रसन्न हो रहे हैं जबकि प्रलय के जीवन की तुलना में संसार का जीवन एक तुच्छ वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं है। (13:26)पिछली आयतों में अच्छे और बुरे लोगों के अंत का वर्णन करने के पश्चात यह आयत कहती है कि लोक परलोक में इन दो गुटों को मिलने वाला बदला, बिना हिसाब किताब के नहीं है और ईश्वर सत्य व असत्य की व्यवस्था के आधार पर रोज़ी देता है या उसमें कमी करता है। अलबत्ता काफ़िरों को इस संसार में जो कुछ मिलता है वह प्रलय में ईमान वालों को मिलने वाले पारितोषिक की तुलना में बहुत ही तुच्छ है, अतः इन दोनों गुटों की सांसारिक स्थिति की कभी भी तुलना नहीं करनी चाहिए तथा सांसारिक संपत्ति पर बहुत अधिक प्रसन्न नहीं होना चाहिए कि यह सब नश्वर और बहुत जल्दी समाप्त होने वाला है।महत्वपूर्ण बात यह है कि जब हमारी रोज़ी में वृद्धि हो तो हम उद्दण्डता न करें और ईश्वरीय सीमा से आगे न बढ़ें। इसी प्रकार जब रोज़ी में कमी हो तो हम निराश न हों। हमें यह जानना और मानना चाहिए कि ईश्वरीय व्यवस्था तत्वदर्शिता पर आधारित है और संसार परीक्षा स्थल है जबकि परलोक पारितोषिक देने का स्थान है।इस आयत से हमने सीखा कि रोज़ी धूर्तता, वचन तोड़ने, कंजूसी और लोभ से प्राप्त नहीं होती बल्कि वह ईश्वर के हाथ में है।हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि संसार नश्वर एवं जल्दी समाप्त होने वाला है किंतु उसका विदित रूप लोगों को मोह कर उन्हें धोखा देता है।