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    सूरए रअद, आयतें 27-28, (कार्यक्रम 413)

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    आइये पहले सूरए रअद की आयत संख्या 27 की तिलावत सुनते हैं।وَيَقُولُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْلَا أُنْزِلَ عَلَيْهِ آَيَةٌ مِنْ رَبِّهِ قُلْ إِنَّ اللَّهَ يُضِلُّ مَنْ يَشَاءُ وَيَهْدِي إِلَيْهِ مَنْ أَنَابَ (27)काफ़िर कहते हैं कि उनके अर्थात पैग़म्बर के पालनहार की ओर से उनके पास कोई चमत्कार क्यों नहीं आया है। कह दीजिए कि निश्चित रूप से ईश्वर जिसे चाहता है पथभ्रष्ट कर देता है और अपनी ओर लौटने तथा तौबा करने वाले का अपनी ओर मार्ग दर्शन करता है। (13:27)स्पष्ट है कि जो कोई पैग़म्बरी का दावा करता है उसे अपने दावे को सिद्ध करने के लिए कोई चमत्कार दिखाना चाहिए ताकि यह बात प्रमाणित हो जाए कि उसका ईश्वर से संपर्क है और जो कुछ वह कह रहा है वह ईश्वर की ओर से है किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि पैग़म्बरों का यह दायित्व है कि जो कोई उनसे जिस बात की इच्छा प्रकट करे वे उसे पूरा ही करें। ऐसी स्थिति में संभव है कि लोग पैग़म्बरों पर ईमान लाने के लिए उनकी ओर से असाधारण कार्य के किए जाने की शर्त रखने लगें। यह बात जीवन की स्वाभाविक व्यवस्था को क्षति पहुंचाएगी। बुद्धिमान तथा वास्तविकता प्रेमी मनुष्य पैग़म्बरों के चमत्कारों को देखकर संतुष्ट हो जाता है और ईमान ले आता है किन्तु हठधर्मी और बहाने बनाने वाले लोग यदि दसियों चमत्कार देख लें तब भी एक अन्य चमत्कार देखने की मांग करते हैं और फिर भी ईमान नहीं लाते।क़ुरआने मजीद ईश्वर का अमर चमत्कार है और उसकी उच्च शिक्षाएं उसके ईश्वरीय होने का सबसे सशक्त प्रमाण हैं किन्तु कुछ लोग इसका इन्कार करते हैं इससे उनकी पथभ्रष्टता में वृद्धि होती है और अंततः वे इस ईश्वरीय किताब की वास्तविकताओं को समझने में असमर्थ रहते हैं। ईश्वरीय आयतों के इन्कार पर उनका आग्रह इस बात का कारण बनता है कि ईश्वर उन्हें उनकी स्थिति पर छोड़ दे कि यह अपने आप में सबसे बड़ी पथभ्रष्टता है।जी हां, जो लोग बुद्धि से काम नहीं लेते हैं और मानसिक रोगों में ग्रस्त हैं, वे ईश्वरीय आयतों को सुनकर अप्रसन्न हो जाते हैं। उस मरे हुए प्राणी की भांति कि जिसकी दुर्गंध वर्षा होने पर अधिक फैल जाती है और लोगों को कष्ट पहुंचाती है किन्तु यही वर्षा जब उपजाऊ धरती पर बरसती है तो उसकी फ़सल को और अधिक लहलहा देती है।ईश्वरीय किताबें और ईश्वरीय पैग़म्बरों की शिक्षाएं उस वर्षा की भांति हैं जो बंजर धरती पर बरसती है तो घांस फूस के अतिरिक्त कुछ नहीं उगता किन्तु जब वही वर्षा बाग़ पर बरसती है तो वहां फूल खिलते हैं।इस आधार पर इस आयत में जो यह कहा गया है कि ईश्वर जिसे चाहता है पथभ्रष्ट कर देता है, उसका यह अर्थ नहीं है कि ईश्वर कुछ लोगों को पथभ्रष्ट करना चाहता है बल्कि उनकी पथभ्रष्टता का कारण यह है कि कुछ लोग ईश्वरीय आदेशों को स्वीकार नहीं करते अतः ईश्वरीय मार्गदर्शन से वंचित हो जाते हैं। इस आयत में इस प्रकार के लोग ऐसे गुट के मुक़ाबले में हैं जो तौबा और प्रायश्चित द्वारा ईश्वर की ओर उन्मुख होते हैं और फिर ईश्वरीय दया और कृपा का पात्र बन जाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों में मार्गदर्शन अथवा पथभ्रष्टता के संबंध में महत्त्वपूर्ण बिन्दु, ईश्वरीय चमत्कारों की संख्या और उनका स्वरूप नहीं बल्कि यह है कि वे सत्य को स्वीकार करते हैं या हठधर्मी से काम लेते हैं।ईश्वर की परंपरा सभी लोगों के मार्गदर्शन की है किन्तु जो लोग ग़लत मार्ग का चयन करते हैं उनका दंड पथभ्रष्टता और ईश्वरीय मार्गदर्शन से दूर होना है।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 28 की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ آَمَنُوا وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُمْ بِذِكْرِ اللَّهِ أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ (28)

    वे ऐसे लोग हैं जो ईमान लाए तथा उनके हृदय ईश्वर की याद व स्मरण से शांत व संतुष्ट हैं। जान लो कि ईश्वर की याद और उसके स्मरण से ही हृदयों को शांति व संतुष्टि प्राप्त होती है। (13:28)पिछली आयत में कहा गया था कि ईश्वर सत्य की खोज में रहने वालों का मार्गदर्शन करता है। ये आयत कहती है कि जो लोग ईश्वरीय मार्गदर्शन का पात्र बनते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो ईश्वर पर ईमान लाने के पश्चात शांति व संतोष प्राप्त कर चुके हैं क्योंकि मन में ईश्वर की याद तथा ज़बान पर उसका स्मरण, मनुष्य की आत्मा की शांति का कारण बनता है, यह ऐसी शांति होती है जिसका कोई विकल्प नहीं है और किसी भी वस्तु के माध्यम से इस प्रकार की शांति प्राप्त नहीं की जा सकती।स्पष्ट है कि ईश्वर की याद व स्मरण का अर्थ यह है कि नमाज़ एवं प्रार्थना के दौरान उसके शाब्दिक स्मरण के साथ ही हर समय विशेषकर कठिनाइयों में ग्रस्त होने या फिर पाप का अवसर सामने होने पर भी उसे याद रखा जाए। ईश्वर की अनुकंपाओं की याद उसके प्रति कृतज्ञता का कारण बनती है। इसी प्रकार ईश्वर की शक्ति तथा उसकी कृपाओं व क्षमा को याद करने से मनुष्य में आशा की किरणें फूटती हैं और उससे समस्याओं का सामना करने का साहस मिलता है।अलबत्ता जिन लोगों को इस प्रकार की शांति प्राप्त होती है ईश्वर का नाम सुनते ही उनके पूरे अस्तित्व में उसके प्रति प्रेम और भय की भावना प्रवाहित हो जाती है क्योंकि वे सृष्टि में उसकी महानता को पूर्ण रूप से समझते हैं तथा उसकी महानता के समक्ष हर वस्तु को तुच्छ मानते हैं। जैसा कि सूरए अन्फ़ाल की दूसरी आयत में कहा गया है कि वास्तविक ईमान वाले वही हैं कि जिनके सामने जब ईश्वर का स्मरण किया जाता है तो उनके हृदय कांप जाते हैं।इस प्रकार के लोग उस भलि संतान की भांति हैं जो अपने माता पिता पर भरोसा करके संतोष व शांति का आभास करती है तथा संकटों में अपने आपको अकेला नहीं समझती। वह अपने माता पिता पर बहुत अधिक भरोसा करने के साथ ही इस बात की ओर से भी बहुत भयभीत रहती है कि उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम न कर बैठे। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम पवित्र रमज़ान महीने की एक दुआ में ईश्वर की याद को शांति व संतोष का कारण बताते हुए प्रार्थना करते हैं कि प्रभुवर जब भी मैं तेरी दया और कृपा को याद करता हूं तो मैं आशावान हो जाता हूं और मुझे शांति प्राप्त होती है।आज के संसार में हम देखते हैं कि लोग अवसाद और हतोत्साह में अधिक ग्रस्त हैं। इसका कारण यह है कि वे ईश्वर की याद से दूर हो गये हैं। जिन समाजों में लोग ईश्वर पर ईमान रखते हैं उनमें इस प्रकार के मानसिक रोग कम ही दिखाई पड़ते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की याद केवल ज़बान से करना पर्याप्त नहीं है। सुदृढ़ ईमान के लिए हृदय का संतोष आवश्यक है।धन और सत्ता जो आज के युग में सब कुछ समझे जाते हैं मनुष्य को शांति व संतोष प्रदान नहीं कर सके हैं। केवल अनन्य एवं प्रभुत्वशाली ईश्वर की याद ही मनुष्य को शांति प्रदान करती है।