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    सूरए रअद, आयतें 29-31, (कार्यक्रम 414)

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    आइये पहले सूरए रअद की आयत नंबर २९ की तिलावत सुनें।الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ طُوبَى لَهُمْ وَحُسْنُ مَآَبٍ (29)धन्य हैं वे लोग जो ईमान लाए और भले कर्म करते रहे और उन (ही) के लिए भला अंत है। (13:29)पिछले कार्यक्रम में हमने ईश्वर की याद और उसके स्मरण के परिणामों के बारे में बात की थी और बताया था कि ईमान वालों के हृदय ईश्वर की याद से ही संतुष्ट होते हैं और उन्हें शांति व संतोष प्राप्त होता है। यह आयत कहती है कि ईमान वाले, भले कर्म करते हैं और इसी लिए लोक-परलोक में वे ईश्वरीय दया व कृपा का पात्र बनते हैं तथा उनका अंत भी भला होता है।क़ुरआने मजीद की अधिकांश आयतों में ईमान के साथ भले कर्मों का उल्लेख किया गया है जिससे यह पता चलता है कि भला कर्म ईमान से अलग नहीं है। ईमान वाले लोग, व्यभिचारियों तथा मिथ्याचारियों से अलग होते हैं। संभव है कि व्यभिचारियों के हृदय में ईमान हो किंतु कर्म के मामले में पाप एवं उद्दण्डता में ग्रस्त हैं। मिथ्याचारियों के हृदय में ईमान नहीं होता किंतु उनके कर्म विदित रूप से अच्छे प्रतीत होते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि बुरे लोगों का सांसारिक जीवन भी सुखी नहीं होता। सुखी सांसारिक जीवन, ईमान और भले कर्मों से ही प्राप्त होता है।मायामोह में ग्रस्त लोगों की सफलताएं स्थाई नहीं होतीं और प्रयल में उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होता। इसके विपरीत ईमान वाले लोक-परलोक दोनों में सफल रहते हैं।आइये अब सूरए रअद की आयत नंबर ३० की तिलावत सुनें।كَذَلِكَ أَرْسَلْنَاكَ فِي أُمَّةٍ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهَا أُمَمٌ لِتَتْلُوَ عَلَيْهِمُ الَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ وَهُمْ يَكْفُرُونَ بِالرَّحْمَنِ قُلْ هُوَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ مَتَابِ (30)(हे पैग़म्बर!) इस प्रकार हमने आपको उस समुदाय के भीतर पैग़म्बर बना कर भेजा कि जिससे पूर्व भी अनेक समुदाय (आए और) चले गए ताकि जो कुछ हम अपने विशेष संदेश वहि के माध्यम से आपके पास भेजते हैं, उन्हें पढ़ कर सुना दें, यद्यपि वे कृपाशील ईश्वर का इन्कार करते हैं। कह दीजिए कि वही मेरा पालनहार है, उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है। मैंने केवल उसी पर भरोसा किया है और उसी की ओर मेरी वापसी है। (13:30)यह आयत पिछली जातियों एवं समुदायों में पैग़म्बरी का क्रम जारी रहने की ओर संकेत करती है तथा मक्का नगर के अनेकेश्वरवादियों के बारे में जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की बातों को सुनने को तैयार नहीं थे, कहती है कि ऐसा नहीं है कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम पहले पैग़म्बर हों कि तुम उनकी पैग़म्बरी के बारे में संदेह कर रहे हो। तुम से पहले वाले समुदायों एवं जातियों में भी अनेक पैग़म्बर आ चुके हैं। पैग़म्बरे इस्लाम अपनी ओर से कुछ नहीं कहते बल्कि वे भी तुम्हें वही बताते हैं जो ईश्वर अपने विशेष संदेश वहि द्वारा उनके पास भेजता है।पैग़म्बरे इस्लाम की एक ही बात है और वह यह कि केवल ईश्वर ही उपासना के योग्य है क्योंकि उसके अतिरिक्त कोई सहारा नहीं है और सभी को उसी की ओर लौट कर जाना है।इस आयत से हमने सीखा कि पिछली जातियों के इतिहास का अध्ययन, ईश्वरीय धर्मों की वास्तविकताओं एवं शिक्षाओं को पहचानने तथा उन्हें स्वीकार करने में प्रभावी है।ईश्वर पर भरोसा करके काफ़िरों की शत्रुताओं एवं विरोधियों का मुक़ाबला किया जा सकता है।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 31 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ أَنَّ قُرْآَنًا سُيِّرَتْ بِهِ الْجِبَالُ أَوْ قُطِّعَتْ بِهِ الْأَرْضُ أَوْ كُلِّمَ بِهِ الْمَوْتَى بَلْ لِلَّهِ الْأَمْرُ جَمِيعًا أَفَلَمْ يَيْئَسِ الَّذِينَ آَمَنُوا أَنْ لَوْ يَشَاءُ اللَّهُ لَهَدَى النَّاسَ جَمِيعًا وَلَا يَزَالُ الَّذِينَ كَفَرُوا تُصِيبُهُمْ بِمَا صَنَعُوا قَارِعَةٌ أَوْ تَحُلُّ قَرِيبًا مِنْ دَارِهِمْ حَتَّى يَأْتِيَ وَعْدُ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ لَا يُخْلِفُ الْمِيعَادَ (31)यदि क़ुरआन के माध्यम से पर्वत भी चलने लगें या उसके द्वारा धरती के टुकड़े टुकड़े हो जाए या मरे हुए लोग बोलने लगें (तब भी ये ईमान नहीं लाएंगे) बल्कि ( बात यह है कि) सभी मामले ईश्वर के हाथ में हैं। क्या ईमान वाले (कठोर हृदय वालों के ईमान लाने की ओर से) निराश नहीं हुए हैं और नहीं जानते है कि यदि ईश्वर चाहे तो सभी लोगों का मार्गदर्शन कर सकता है। जिन लोगों ने कुफ़्र (का मार्ग) अपनाया उन तक उनके कर्मों के बदले निरंतर तबाह करने वाला दंड पहुंचता रहेगा या उनके घरों के निकट कहीं उतरेगा ताकि ईश्वरीय वचन पूरा हो जाए। निश्चित रूप से ईश्वर अपने वचन को नहीं तोड़ता। (13:31)पिछली आयत में काफ़िरों द्वारा पैग़म्बरी की शिक्षाओं के विरोध की ओर संकेत करने के बाद यह आयत कहती है कि वे यह न सोचें कि ईश्वर का इन्कार करके वे उसके प्रभुत्व से बाहर निकल जाएंगे और जैसे चाहेंगे जीवन बिताएंगे क्योंकि ईश्वर शत्रु एवं हठधर्मी काफ़िरों को इसी संसार में दंडित करता है तथा प्रलय में भी उन्हें कड़ा दंड देगा।स्पष्ट है कि काफ़िरों के दो गुट हैं। एक गुट उन काफ़िरों का है जो सत्य को देखने और समझने के बाद उस पर ईमान ले आते हैं किन्तु दूसरा गुट सत्य को देखने और समझने के बाद उसे छिपाता है और हठधर्मी के साथ उसके समक्ष डट जाता है। इस आयत में इसी गुट के बारे में बात की गई है। यह गुट इतना हठधर्मी है कि यदि पर्वत अपने स्थान से हट जाएं और मरे हुए लोग जीवित हो जाएं तब भी इसे ईश्वरीय चमत्कार नहीं मानेगा और इसे सामान्य बात बताते हुए ईमान नहीं लाएगा।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने मनुष्य की रचना इस प्रकार की है कि उसके पास अधिकार रहे और वह अपनी इच्छा से ईमान या कुफ़्र के मार्ग का चयन करे, अतः ईमान वालों को इस बात की आशा नहीं रखनी चाहिए कि सभी लोग ईमान ले आएंगे।ईश्वर चाहता है कि लोग उसके मार्गदर्शन को अपने अधिकार और चयन से स्वीकार करें अन्यथा वह सभी लोगों को सत्य स्वीकार करने पर विवश कर सकता है।संकटों और कठिनाइयों का कारण स्वयं लोगों के कर्म हैं।