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    सूरए रअद, आयतें 32-35, (कार्यक्रम 415)

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    आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 32 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِنْ قَبْلِكَ فَأَمْلَيْتُ لِلَّذِينَ كَفَرُوا ثُمَّ أَخَذْتُهُمْ فَكَيْفَ كَانَ عِقَابِ (32)(हे पैग़म्बर) निश्चित रूप से आपसे पहले वाले पैग़म्बरों का भी परिहास किया गया था तो मैंने कुफ़्र अपनाने वालों को मोहलत दी, फिर उसके बाद उन्हें (अपने दंड) में पकड़ लिया तो (देखिए कि मेरा) दंड कैसा था? (13:32)पिछले कार्यक्रम में सत्य और वास्तविकता के संबंध में काफ़िरों की हठधर्मी तथा द्वेष की ओर संकेत किया गया था। यह आयत सत्य के संबंध में विरोधियों की एक शैली का वर्णन करते हुए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से कहती है। यह मत सोचिए कि इन अनेकेश्वरवादियों ने केवल आपकी बातों का ही परिहास किया है, ये इससे पूर्व भी अनेक पैग़म्बरों का परिहास कर चुके हैं। यद्यपि उन्हें समय दिया गया था कि शायद वे सही मार्ग पर आ जाएं किंतु वे ईमान नहीं लाए और अंततः कड़े दण्ड में ग्रस्त हुए।इस आयत से हमने सीखा कि पिछले पैग़म्बरों के इतिहास तथा उनके द्वारा सहन की गई कठिनाइयों की पहचान से, ईमान वालों को समस्याओं का सामना करने में धैर्य एवं संयम से काम लेने में सहायता मिलती है।तौबा के लिए ईश्वर की ओर से दी जाने वाली मोहलत पर घमण्ड नहीं करना चाहिए क्योंकि ईश्वरीय दण्ड सहसा ही आता है।आइये अब सूरए रअद की आयत नंबर ३३ और ३४ की तिलावत सुनें।أَفَمَنْ هُوَ قَائِمٌ عَلَى كُلِّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ وَجَعَلُوا لِلَّهِ شُرَكَاءَ قُلْ سَمُّوهُمْ أَمْ تُنَبِّئُونَهُ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي الْأَرْضِ أَمْ بِظَاهِرٍ مِنَ الْقَوْلِ بَلْ زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا مَكْرُهُمْ وَصُدُّوا عَنِ السَّبِيلِ وَمَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِنْ هَادٍ (33) لَهُمْ عَذَابٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَلَعَذَابُ الْآَخِرَةِ أَشَقُّ وَمَا لَهُمْ مِنَ اللَّهِ مِنْ وَاقٍ (34)वह ईश्वर जो हर व्यक्ति तथा उसके द्वारा किए गए हर कर्म को देखने वाला है, (क्या उसे समकक्ष की आवश्यकता है?) और इन लोगों ने ईश्वर के लिए समकक्ष ठहराया है, कह दीजिए कि उन समकक्षों का नाम लो। या तुम लोग ईश्वर को धरती की ऐसी बात की सूचना देते हो जिससे वह अवगत नहीं है? या फिर तुम लोग दिखावे की बात करते हो? (ऐसी कोई बात नहीं है) बल्कि काफ़िरों के हथकण्डों को उनके समक्ष सजा कर प्रस्तुत किया गया है तथा सत्य के मार्ग से उन्हें रोक दिया गया है और जिसे ईश्वर पथभ्रष्ट कर दे, उसका कोई भी मार्गदर्शक नहीं हो सकता। (13:33) ऐसे लोगों के लिए सांसारिक जीवन में दण्ड है और प्रलय में तो निश्चित रूप से अधिक कड़ा दण्ड होगा तथा उन्हें ईश्वर (के दण्ड) से बचाने वाला कोई नहीं होगा। (13:34)संसार के संचालन में मूर्तियों को ईश्वर का समकक्ष समझने तथा सूखे एवं वर्षा के संबंध में उनकी भूमिका को स्वीकार करने वाले अनेकेशवरवादियों की निराधार एवं ग़लत आस्थाओं के मुक़ाबले में यह आयत विभिन्न शब्दों में उनका उत्तर देती है और कहती है कि वह ईश्वर जो तुम मनुष्यों तथा तुम्हारे कर्मों सहित संपूर्ण सृष्टि पर पूरा प्रभुत्व रखता है, उसे पत्थर एवं लकड़ी के इन कथित देवताओं की क्या आवश्यकता हो सकती है कि तुम उनकी शरण में जाते हो तथा उनका सम्मान करते हो।आगे चलकर आयत इस ग़लत विचार के स्रोत की ओर संकेत करते हुए कहती है कि इन लोगों के समक्ष असत्य को सुंदर बना कर प्रस्तुत किया गया है, यही कारण है कि वे उसके पीछे चलने लगे और सत्य के मार्ग से पीछे रह गए। स्वाभाविक है कि जो कोई स्वयं को ईश्वरीय मार्गदर्शन से वंचित कर लेता है तो न कोई उसका मार्गदर्शन कर सकता है और न ही कोई उसे मुक्ति दिला सकता है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर प्रश्न करके मनुष्य की बुद्धि एवं प्रवृत्ति को निर्णय का निमंत्रण देता है ताकि वह सत्य एवं असत्य को पहचान कर सत्य को स्वीकार कर सके।ईश्वरीय संकल्प से मुक़ाबले हेतु किसी भी प्रकार की योजना अथवा षड्यंत्र, स्वयं मनुष्य के पतन का कारण बनता है तथा ईश्वर एवं उसके धर्म को कोई क्षति नहीं पहुंचती।आइये अब सूरए रअद की आयत नंबर ३५ की तिलावत सुनें।مَثَلُ الْجَنَّةِ الَّتِي وُعِدَ الْمُتَّقُونَ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ أُكُلُهَا دَائِمٌ وَظِلُّهَا تِلْكَ عُقْبَى الَّذِينَ اتَّقَوْا وَعُقْبَى الْكَافِرِينَ النَّارُ (35)ईश्वर से डरने वालों के लिए जिस स्वर्ग का वादा किया गया है उसकी उपमा (उस बाग़ की) है जिसके पेड़ों के नीचे से नहरें बह रही हैं तथा उसके फल एवं छाया अनंतकालीन है। यह उन लोगों का अंत है जो ईश्वर से डरते रहे जबकि काफ़िरों का अंत नरक है। (13:35)नरक में अनेकेश्वरवादियों की स्थिति का वर्णन करने के बाद इस आयत में प्रलय में ईमान वालों की स्थिति की ओर संकेत किया गया है और कहा गया है कि ईश्वर से डरने वालों को जिस वस्तु का वचन दिया गया है वह हरे भरे तथा विभिन्न प्रकार के फलों वाले बाग़ के समान स्वर्ग है। स्पष्ट है कि संसार तथा परलोक के बाग़ों में बहुत अंतर है, इसी कारण क़ुरआने मजीद ने उपमा शब्द का प्रयोग किया है अर्थात यदि उनका सांसारिक उदाहरण दिया जाए तो वे इस संसार के हरे भरे बाग़ों के समान हैं जिनमें विभिन्न प्रकार के फल होते हैं और वे इतने हरे भरे और घने होते हैं कि सूर्य का प्रकाश उनके भीतर नहीं आ पाता और उनकी छाया अनंत होती है।रोचक बात यह है कि क़ुरआने मजीद ने अनेकेश्वरवादियों के मुक़ाबले में ईश्वर से डरने वालों के शब्द का प्रयोग किया है जबकि उसे ईमान वालों के शब्द का प्रयोग करना चाहिए था। इससे पता चलता है कि ईमान सदैव ईश्वर के भय के साथ ही होता है। पापों व बुराइयों से दूरी और ईश्वरीय भय के बिना ईमान का दावा, निराधार है।इस आयत से हमने सीखा कि संसार में वर्जित वस्तुओं से बचने का फल प्रलय में अनंतकालीन सफलता है।मनुष्य का अंत महत्त्वपूर्ण होता है। यद्यपि ईश्वर का डर रखने वालों को कठिनाइयां सहन करनी पड़ती हैं किन्तु अंत में उन्हें स्थायी मुक्ति प्राप्त होती है किन्तु काफ़िरों को, जो इस संसार में अस्थायी आनंद प्राप्त करने के प्रयास में रहते हैं, कड़े एवं स्थायी दंड में ग्रस्त होना पड़ता है।