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    सूरए रअद, आयतें 36-38, (कार्यक्रम 416)

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    आइये पहले सूरए रअद की आयत नंबर ३६ की तिलावत सुनें।وَالَّذِينَ آَتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَفْرَحُونَ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْكَ وَمِنَ الْأَحْزَابِ مَنْ يُنْكِرُ بَعْضَهُ قُلْ إِنَّمَا أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ وَلَا أُشْرِكَ بِهِ إِلَيْهِ أَدْعُو وَإِلَيْهِ مَآَبِ (36)और जिन लोगों को हमने (आसमानी) किताब दी है, वे उस (किताब) से प्रसन्न हैं किंतु कुछ गुट ऐसे भी हैं जो उसकी कुछ बातों का इन्कार करते हैं। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि निश्चित रूप से मुझे तो केवल इस बात का आदेश दिया गया है कि मैं ईश्वर की उपासना करूं तथा किसी को उसका समकक्ष न ठहराऊं। मैं (लोगों को) उसकी ओर बुलाता हूं और उसी की ओर मेरी वापसी है। (13:36)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि उन्हें इस बात की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए कि सभी लोग उनके निमंत्रण को स्वीकार कर लेंगे और आसमानी किताब की शिक्षाओं के सामने शीश नवाएंगे बल्कि कुछ लोग ईमान लाएंगे जबकि कुछ अन्य इन्कार करेंगे। अतः पैग़म्बर को लोगों के इन्कार से निराश होने तथा अपने दायित्वपालन में ढिलाई की आवश्यकता नहीं है।यदि सभी लोग काफ़िर भी हो जाएं तब भी पैग़म्बर को अपना मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए बल्कि स्पष्ट रूप से घोषणा करनी चाहिए कि मैं केवल ईश्वर की ही उपासना करता हूं और उसी का दास हूं क्योंकि मुझे उसी की ओर वापस जाना है। मैं तुम्हें अपनी ओर नहीं बुला रहा हूं कि तुम यह सोचो कि मैं तुम पर राज करना चाहता हूं, ऐसा नहीं है बल्कि मैं तो तुम्हें अनन्य ईश्वर की ओर बुला रहा हूं तथा इसमें मेरा कोई व्यक्तिगत हित नहीं है।स्वाभाविक है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के इस प्रकार के कथनों को सुनकर पिछले आसमानी धर्मों के अनुयाई उन पर ईमान ले आते थे किंतु उनमें से कुछ ऐसे भी थे जो क़ुरआन के स्वीकार करने पर तैयार नहीं होते थे और अपने पिछले धर्म पर ही आग्रह करते थे।इस आयत से हमने सीखा कि इस बात की ओर से सावधान रहना चाहिए कि गुटबंदी, सत्यवाद का स्थान न ले ले। हमारे लिए मूल बात सत्य है न कि दल व गुट।धर्म के समस्त आदेशों पर ईमान रखना आवश्यक है, धर्म के कुछ आदेशों का इन्कार उसके समस्त आदेशों के इन्कार के समान है।आइए अब सूरए रअद की आयत नंबर ३७ की तिलावत सुनें।وَكَذَلِكَ أَنْزَلْنَاهُ حُكْمًا عَرَبِيًّا وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُمْ بَعْدَمَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ مَا لَكَ مِنَ اللَّهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا وَاقٍ (37)और इस प्रकार हमने क़ुरआने (मजीद) को अरबी भाषा में स्पष्ट आदेश के रूप में उतारा और (हे पैग़म्बर!) यदि आप उस ज्ञान के बाद भी, जो आप तक पहुंच चुका है, उनकी इच्छाओं का पालन करें तो ईश्वर के कोप से आपको बचाने वाला कोई सहायक नहीं होगा और न ही कोई रक्षक होगा। (13:37)पिछली आयत में क़ुरआने मजीद के संबंध में काफ़िरों के व्यवहार का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा अन्य ईमान वालों को संबोधित करते हुए कहा गया है कि विरोधियों की ओर से कुफ़्र व इन्कार, क़ुरआने मजीद की सत्यता में संदेह का कारण नहीं बनना चाहिए क्योंकि इस किताब ने बड़ी ही स्पष्ट भाषा में सत्य को असत्य से अलग कर दिया है तथा ईश्वर के आदेशों एवं तत्वदर्शिताओं का वर्णन किया है।आयत कहती है कि यदि तुम लोग उन्हें आकृष्ट करने के लिए अपनी नीति से थोड़ा सा भी पीछे हटोगे तो स्वयं को कड़े ईश्वरीय दण्ड में ग्रस्त होने का पात्र बना लोगे और जिन लोगों को तुम आकृष्ट करना चाहते हो वे तुम्हें ईश्वरीय कोप से नहीं बचा सकेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि अपनी आंतरिक इच्छाओं के पालन से भी बुरी बात, दूसरों की अनुचित इच्छाओं का अनुसरण करना है।संसार में ऐसे बहुत से लोग मौजूद हैं जिनका ज्ञान बहुत व्यापक है किंतु वे अपनी आंतरिक एवं अनुचित इच्छाओं का पालन करते हैं।आइए अब सूरए रअद की आयत नंबर ३८ की तिलावत सुनें।وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلًا مِنْ قَبْلِكَ وَجَعَلْنَا لَهُمْ أَزْوَاجًا وَذُرِّيَّةً وَمَا كَانَ لِرَسُولٍ أَنْ يَأْتِيَ بِآَيَةٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ لِكُلِّ أَجَلٍ كِتَابٌ (38)(हे पैग़म्बर!) हमने आपसे पूर्व भी पैग़म्बर भेजे हैं और उनके लिए पत्नियां और संतानें भी रखी हैं। और किसी भी पैग़म्बर को यह अधिकार नहीं है कि वह ईश्वर के आदेश के बिना कोई चमत्कार प्रस्तुत करे। हर समय और काल के लिए एक (निश्चित) किताब है। (13:38)पैग़म्बर के विरोधियों की अनुचित आशाओं व अपेक्षाओं के उत्तर में, जो यह सोचते थे कि पैग़म्बरों का जीवन सामान्य लोगों से भिन्न होना चाहिए और उनसे जिस चमत्कार की मांग की जाए उसे दिखाने की उनमें क्षमता होनी चाहिए, यह आयत कहती है कि सभी पैग़म्बर साधारण लोगों की भांति मनुष्य ही थे। वे माता-पिता से जन्मे थे और स्वयं उनकी भी पत्नी और संतानें थी। वे चमत्कार के नाम पर जो कुछ भी दिखाते थे वह लोगों की इच्छा से नहीं बल्कि ईश्वरीय आदेश से होता था।लोगों की इच्छाएं तथा अपेक्षाएं अनंत हैं तथा हर किसी की कोई न कोई इच्छा होती है जिसे पूरा करना, स्वाभाविक एवं प्राकृतिक स्थिति के विरुद्ध है। यदि कोई सत्य को स्वीकार करना चाहे तो वह एक चमत्कार देख कर भी ईमान ले आता है किंतु यदि कोई हठधर्मी से काम लेना चाहे तो वह दसियों चमत्कार देख कर भी ईमान नहीं लाता है।आयत के अंत में इस बात की ओर संकेत किया गया है कि ईश्वर ने हर समय और हर काल के लिए एक धार्मिक क़ानून अर्थात शरीयत निर्धारित की है जो अगले पैग़म्बर के आने के बाद समाप्त हो जाती है और नई शरीयत आरंभ हो जाती है और यह सदैव से ईश्वरीय परंपरा रही है।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों के संबंध में कमी और अतिश्योक्ति से काम नहीं लेना चाहिए, न तो काफ़िरों की भांति उन्हें कवि और पागल समझना चाहिए और न ही कुछ लोगों की भांति उन्हें ईश्वर के चरण तक पहुंचा देना चाहिए।पैग़म्बरों के चमत्कार, उनकी शिक्षाओं की ही भांति, उनकी ओर से नहीं हैं कि उनमें उनकी कुछ भूमिका हो। उनकी समस्त बातें ईश्वर से संबंधित हैं और वे केवल साधन और माध्यम की भूमिका निभाते हैं।