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    सूरए रअद, आयतें 39-41, ( कार्यक्रम 417)

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    आइये पहले सूरए रअद की आयत नंबर ३९ की तिलावत सुनें।يَمْحُوا اللَّهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ وَعِنْدَهُ أُمُّ الْكِتَابِ (39)ईश्वर जिस वस्तु को चाहे मिटा देता है अथवा उपस्थित कर देता है और केवल उसी के पास मूल किताब है। (13:39)कुछ लोग यह सोचते हैं कि ईश्वर ने उनकी रचना करके उन्हें उनकी स्थिति पर छोड़ दिया है। उनका विचार है कि सृष्टि एक निर्धारित व्यवस्था के आधार पर आगे बढ़ रही है तथा ईश्वर सहित किसी की भी उसके मामलों में कोई भूमिका नहीं है जबकि ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है और उसके लिए एक निर्धारित व्यवस्था रखी है।किंतु सृष्टि में एक निर्धारित व्यवस्था होने का अर्थ यह नहीं है कि प्रकृति ईश्वर के नियंत्रण से बाहर है और अब उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन संभव नहीं है। यह आयत अपनी रचनाओं से, चाहे वह निर्जीव प्रकृति हो, मनुष्य हों अथवा पशु-पक्षी हों, ईश्वर के संबंध का वर्णन करते हुए कहती है कि हर स्थिति में हर वस्तु ईश्वर के अधीन तथा उसके नियंत्रण में है क्योंकि हर वस्तु व सृष्टि का मूल आधार उसके पास सुरक्षित है।संभव है कि किसी वस्तु के बारे में हम यह सोचते हों कि वह अटल तथा अपरिवर्तनीय है किंतु समय बीतने के साथ यह स्पष्ट हो जाए कि उसमें परिवर्तन संभव है। जैसा कि क़ुरआने मजीद की एक अन्य आयत में कहा गया है कि हर दिन ईश्वर का काम उसी दिन के अनुसार होता है। इसके उदाहरण में कुछ बातें प्रस्तुत की जा सकती हैं। मुसलमानों का पहला क़िबला बैतुल मुक़द्दस था जिसे बाद में परिवर्तित करके काबे को क़िबला बना दिया गया। इसी प्रकार हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को आसमानी किताब तौरैत लेने के लिए तूर पर्वत पर तीस दिन के लिए बुलाया गया था किंतु बाद में इस समयावधि को परिवर्तित करके चालीस दिन कर दिया गया। ईश्वरीय दण्ड के परिवर्तन के संबंध में इसका उदाहरण हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम की जाति है, जिसे इसी संसार में दण्डित करने का निर्णय किया गया था किंतु उसके ईमान ले आने के कारण, ईश्वरीय दण्ड टल गया।इस आयत से हमने सीखा कि सृष्टि में हर प्रकार के परिवर्तन हेतु ईश्वर के हाथ खुले हुए हैं और वही संपूर्ण क्षमाशील एवं शक्तिमान है।सृष्टि की हर बात ईश्वर के नियंत्रण में है और उसके आदेश से सृष्टि के सभी मामलों को विशेष किताब में लिखा जाता है।आइये अब सूरए रअद की आयत नंबर ४० की तिलावत सुनें।وَإِنْ مَا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ الَّذِي نَعِدُهُمْ أَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلَاغُ وَعَلَيْنَا الْحِسَابُ (40)और (हे पैग़म्बर!) काफ़िरों से हमने जिस दण्ड का वादा किया है यदि उसका कुछ भाग हम आपको दिखा दें या (इस दण्ड के आने से पूर्व ही) आपको संसार से उठा लें तो (जान लीजिए कि) हमारा वचन पूरा हो कर रहेगा। तो आपका दायित्व केवल (हमारा संदेश) पहुंचाना है और (उनका) हिसाब-किताब हमारे ज़िम्मे है। (13:40)पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के साथ उनके विरोधियों के व्यवहार के बारे में पिछली आयतों में वर्णित बातों को जारी रखते हुए यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम को सांत्वना देती है कि आप निश्चिंत रहें कि उनका कुफ़्र निरुत्तर नहीं रहेगा और आपके जीवनकाल में या आपकी मृत्यु के पश्चात उन्हें उनके दुष्कर्मों का फल अवश्य मिलेगा।इसके अतिरिक्त यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के दायित्व को निर्धारित करते हुए कहती है कि आपका दायित्व केवल ईश्वरीय कथन को लोगों तक पहुंचाना है, आप अपने दायित्व का निर्वाह कीजिए और अन्य बातों को हम पर छोड़ दीजिए ताकि हम स्वयं उनके कर्मों का हिसाब-किताब करें।इस आयत से हमने सीखा कि हमारा दायित्व लोगों के अंत के बारे में फ़ैसला करना नहीं बल्कि उन्हें धर्म का निमंत्रण देना है। लोगों के भविष्य के बारे में फ़ैसला करना मनुष्य का नहीं बल्कि ईश्वर का काम है।काफ़िरों को मिलने वाले दण्ड में विलंब का अर्थ उसका समाप्त होना नहीं है। ईश्वरीय दण्ड अपने निर्धारित समय पर आता है।आइये अब सूरए रअद की आयत नंबर ४१ की तिलावत सुनें।أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا نَأْتِي الْأَرْضَ نَنْقُصُهَا مِنْ أَطْرَافِهَا وَاللَّهُ يَحْكُمُ لَا مُعَقِّبَ لِحُكْمِهِ وَهُوَ سَرِيعُ الْحِسَابِ (41)क्या उन्होंने नहीं देखा है कि हम धरती की ओर आकर उसे उसके किनारों से घटाते चले आ रहे हैं? और ईश्वर निर्णय करता है तथा कोई ऐसा नहीं है जो उसके फ़ैसले को टाल सके तथा ईश्वर बहुत जल्दी हिसाब करने वाला है। (13:41)पिछली आयत में इस बात का वर्णन करने के बाद कि ईश्वरीय दण्ड अपने समय पर ही आता है, इस आयत में ईश्वर कहता है कि लोग, इतिहास से पाठ क्यों नहीं सीखते? क्या वे नहीं देखते कि ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होकर विभिन्न जातियां समाप्त हो चुकी हैं? क्या ईश्वरीय दण्ड के मुक़ाबले में प्रतिरोध की क्षमता रखने वाली कोई शक्ति ऐसी है कि जो तुम इस प्रकार उसके आदेशों की अवमानना कर रहे हो और उसके दण्ड से नहीं डरते हो?हर वस्तु के संबंध में उसी का फ़ैसला लागू होता है और बड़ी तीव्रता से व्यवहारिक होता है। कोई भी भौतिक या ग़ैर भौतिक शक्ति उसके फ़ैसले को लागू होने से नहीं रोक सकती।इस आयत से हमने सीखा कि कुछ प्राकृतिक आपदाएं व दुर्घटनाएं, ईश्वरीय दण्ड हैं जो पापियों तथा पाप के सम्मुख मौन धारण करने वालों को अपनी चपेट में लेती हैं।स्वाभाविक मृत्यु भी मनुष्य के संबंध में ईश्वर का अटल फ़ैसला है जिसे कोई टाल नहीं सकता अतः सभी मनुष्य, जातियां तथा सरकारें नष्ट हो जाती हैं किंतु ईश्वरीय शक्ति स्थायी व अटल है।