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    सूरए रअद, आयतें 4-6, (कार्यक्रम 406)

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    आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या चार की तिलावत सुनते हैं।وَفِي الْأَرْضِ قِطَعٌ مُتَجَاوِرَاتٌ وَجَنَّاتٌ مِنْ أَعْنَابٍ وَزَرْعٌ وَنَخِيلٌ صِنْوَانٌ وَغَيْرُ صِنْوَانٍ يُسْقَى بِمَاءٍ وَاحِدٍ وَنُفَضِّلُ بَعْضَهَا عَلَى بَعْضٍ فِي الْأُكُلِ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَاتٍ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ (4)और धरती के विभिन्न भूभाग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और अंगूरों के बाग़, खेतियां और खजूर के पेड़ (भी) हैं जो इकहरे भी हैं और दोहरे भी। (सभी) एक ही पानी से सींचे जाते हैं और हम फलों की दृष्टि से इनमें से कुछ को कुछ अन्य पर प्राथमिकता देते हैं। निश्चित रूप से इसमें उन लोगों के लिए जो चिंतन करते हैं, निशानियां (निहित) हैं। (13:4)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि क़ुरआने मजीद ने आकाशों और धरती की सृष्टि तथा पर्वतों एवं समुद्रों के अस्तित्व के संबंध में ईश्वर की शक्ति की ओर संकेत किया है। यह आयत विभिन्न फलों व कृषि उत्पादों की ओर संकेत करती है जो धरती मनुष्यों को भेंट देती है। आयत कहती है कि ये फल और कृषि उत्पाद बहुत विविध हैं किन्तु ईश्वर उनकी सिंचाई एक ही पानी से करता है। कभी कभी एक ही बाग़ में दसियों प्रकार के पेड़े होते हैं जो एक ही मिट्टी और पानी के प्रयोग से अस्तित्व में आते हैं किन्तु उन सबके फल अलग अलग प्रकार के और विभिन्न रंगों व स्वाद के होते हैं, क्या यह सब पालनहार की शक्ति की निशानी के अतिरिक्त कुछ और हैं?इस आयत से हमने सीखा कि पड़ोस, एक समान होने का आधार नहीं है। श्रेष्ठता का आधार अधिक लाभ पहुंचाना है। केवल धर्मगुरूओं और विद्वानों के साथ बैठने से परिपूर्णता प्राप्त नहीं होती जिस प्रकार से कि पेड़ों का एक दूसरे के पड़ोस में स्थित होना उनकी श्रेष्ठता का कारण नहीं बनता।जो विभिन्न प्रकार की नेमतों से लाभ उठाने और खाने पीने में तो बहुत आगे रहता है किन्तु उन नेमतों के स्रोत के बारे में चिंतन नहीं करता वह मानवता से बहुत दूर है।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 5 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ تَعْجَبْ فَعَجَبٌ قَوْلُهُمْ أَئِذَا كُنَّا تُرَابًا أَئِنَّا لَفِي خَلْقٍ جَدِيدٍ أُولَئِكَ الَّذِينَ كَفَرُوا بِرَبِّهِمْ وَأُولَئِكَ الْأَغْلَالُ فِي أَعْنَاقِهِمْ وَأُولَئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (5)और (हे पैग़म्बर!) यदि आपको (अनेकेश्वरवादियों की ओर से अपनी पैग़म्बरी के इन्कार पर) आश्चर्य है तो आश्चर्यजनक तो उनकी बात है जो वे कहते हैं कि क्या जब हम मिट्टी हो जाएंगे तो हमें नए सिरे से सृष्टि प्राप्त होगी। यह ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने पालनहार का इन्कार किया, यही वे लोग हैं जिनकी गर्दनों में ज़ंजीरें डाली जाएंगी और यही लोग नरक वाले हैं जहां वे सदैव रहेंगे। (13:5)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को सांत्वना देते हुए कहती है कि यदि यह लोग आपकी पैग़म्बरी को स्वीकार नहीं करते तो आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि यह आपके ईश्वर की शक्ति का इन्कार करते हुए कहते हैं कि किस प्रकार ईश्वर मिट्टी में मिल जाने वाले मनुष्य की पुनः सृष्टि करके उसे जीवन प्रदान करेगा।इसके बाद ईश्वर इस प्रकार के इन्कार के स्रोत की ओर संकेत करते हुए कहता है कि सत्य के साथ द्वेष व हठधर्म इस बात का कारण बनी है कि वे ईश्वर को भी स्वीकार नहीं करते और स्वाभाविक रूप से जो एकेश्वरवाद पर विश्वास नहीं रखेगा वह पैग़म्बरी और प्रलय का भी इन्कार करेगा।इस आयत से हमने सीखा कि जो ईश्वर का इन्कार करता है वह अपनी आंतरिक इच्छाओं के पालन के संकट में ग्रस्त हो जाता है और यह बात प्रलय में उनकी गर्दनों पर ज़ंजीर की भांति रखी होगी। जो प्रलय का इन्कार करता है वह चाहे जो भी भला कर्म करे, उसका लक्ष्य संसार ही रहेगा तथा ईश्वर इस संसार में उसे उसका प्रतिफल देगा किन्तु प्रलय में वह ख़ाली हाथ ही पहुंचेगा अतः उसका ठिकाना नरक ही होगा।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 6 की तिलावत सुनते हैं।وَيَسْتَعْجِلُونَكَ بِالسَّيِّئَةِ قَبْلَ الْحَسَنَةِ وَقَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِمُ الْمَثُلَاتُ وَإِنَّ رَبَّكَ لَذُو مَغْفِرَةٍ لِلنَّاسِ عَلَى ظُلْمِهِمْ وَإِنَّ رَبَّكَ لَشَدِيدُ الْعِقَابِ (6)और (ईश्वर का इन्कार करने वाले काफ़िर) ईश्वर की दया और भलाई से पूर्व उसकी ओर से दंड आने के लिए जल्दी करते हैं, यद्यपि उनसे पूर्व ऐसी जातियां बीत चुकी हैं जिन्होंने दंड का स्वाद चखा है। और निश्चि रूप से तुम्हारा पालनहार लोगों के संबंध में, उनके समस्त अत्याचारों के बावजूद दयावान है। और (इसी के साथ) तुम्हारा पालनहार अत्यधिक कड़ा दंड देने वाला है। (13:6)पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम लोगों से कहते थे कि यदि उन्होंने ईश्वर के आदेशों की अवहेलना की तो न केवल प्रलय में बल्कि इसी संसार में भी वे दंड में ग्रस्त होंगे किन्तु हठधर्मी काफ़िर कहते थे कि हमें आपका स्वर्ग नहीं चाहिए और यदि आप सच कहते हैं तो अपने ईश्वर से कहिए कि वह हमें तुरंत दंडित करे। इसीलिए यह आयत कहती है कि वे ईश्वर की ओर से दंड आने में जल्दी कर रहे थे।ईश्वर उनके उत्तर में कहता है कि अपने से पहले वाली जातियों के बारे में सोचो कि कितने कड़े दंड के साथ इसी संसार में उनका सर्वनाश हो गया। उनसे पाठ सीखो और अपने बारे में ईश्वरीय दंड की कामना मत करो। इसके अतिरिक्त ईश्वर अत्यंत कृपाशील और दयावान है। अपने अतीत को छोड़ दो और ईमान ले आओ ताकि ईश्वरीय दया के पात्र बन सको और ईश्वरीय दंड के स्थान पर तुम्हें ईश्वरीय दया व कृपा प्राप्त हो।इस आयत से हमने सीखा कि हमें अतीत के लोगों के इतिहास के संबंध में ईश्वरीय कोप को दृष्टिगत रखना और उससे पाठ सीखना चाहिए।पापियों को समय देना ईश्वर की परंपरा है, वह तौबा व प्रायश्चित का मार्ग सदैव खुला रखता है।ईश्वर की दया व कृपा उसके दंड व कोप से आगे रहती है।