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    सूरए रअद, आयतें 42-43, (कार्यक्रम 418)

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    आइये पहले सूरए रअद की आयत नंबर ४२ की तिलावत सुनें।وَقَدْ مَكَرَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَلِلَّهِ الْمَكْرُ جَمِيعًا يَعْلَمُ مَا تَكْسِبُ كُلُّ نَفْسٍ وَسَيَعْلَمُ الْكُفَّارُ لِمَنْ عُقْبَى الدَّارِ (42)निश्चित रूप से जो लोग उनसे पहले थे, उन्होंने चालें चलीं, किंतु समस्त युक्तियां तो ईश्वर के लिए ही हैं। वह जानता है कि कौन क्या कर रहा है। और शीघ्र ही काफ़िरों को पता चल जाएगा कि प्रलय का ठिकाना किस के लिए है। (13:42)पिछली आयतों में ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को सान्तवना दी थी कि यदि मक्के के अनेकेश्वरवादी आपका विरोध करते हैं तो आप चिंतित न हों क्योंकि पिछले पैग़म्बरों के भी बड़ी संख्या में विरोधी रहे हैं किंतु ईश्वर लोक-परलोक में उन्हें उनके कर्मों का दण्ड देता है।उसी क्रम को जारी रखते हुए इस आयत में कहा गया है कि काफ़िर ईश्वरीय दण्ड से बचने के लिए मार्ग खोजते हैं और अपने विचार में ईश्वर को धोखा देने का प्रयास करते हैं जबकि हर बात और हर वस्तु का अधिकार ईश्वर के हाथ में है। यदि वे धोखा देना तथा चाल चलना चाहें तो ईश्वर अपने असीम ज्ञान द्वारा उनके विचार में आने वाली हर बात को जानता है तथा कोई भी बात उससे छिपी हुई नहीं है।ईश्वर काफ़िरों को अवसर देता है ताकि वे अपने बुरे कर्मों को छोड़ कर तौबा व प्रायश्चित करें और जो लोग चाहें अपने कुफ़्र के मार्ग पर बढ़ते रहें।रोचक बात यह है कि मनुष्य अपनी अक्षमता को समझने के बावजूद ईश्वर के समक्ष डटना चाहता है जबकि शक्ति व सम्मान पूर्ण रूप से ईश्वर के ही हाथ में है तथा उसके और उसके धर्म के संबंध में षड्यंत्र, मनुष्य को दंड में ग्रस्त करता है।इस आयत से हमने सीखा कि कुछ लोग ईश्वर को धोखा देने के प्रयास में रहते हैं जबकि छल-कपट और धूर्तता के उस स्थान पर काम लिया जाता है जब विरोधी पक्ष निश्चेत होता है किन्तु ईश्वर तो हर क्षण और हर स्थिति में हर बात से अवगत व सचेत है।भोले लोगों की भांति काफ़िरों की वर्तमान स्थिति को नहीं देखना चाहिए बल्कि भविष्य पर दृष्टि रखते हुए यह देखना चाहिए कि उनका अंत कैसा होता है।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 43 की तिलावत सुनते हैं।وَيَقُولُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَسْتَ مُرْسَلًا قُلْ كَفَى بِاللَّهِ شَهِيدًا بَيْنِي وَبَيْنَكُمْ وَمَنْ عِنْدَهُ عِلْمُ الْكِتَابِ (43)

    (हे पैग़म्बर!) काफ़िर कहते हैं कि आप ईश्वर के पैग़म्बर नहीं हैं, कह दीजिए कि मेरे और तुम्हारे बीच गवाही के लिए ईश्वर और वह पर्याप्त है जिसके पास (ईश्वरीय) किताब का ज्ञान है। (13:43)यह आयत कि जो सूरए रअद की अंतिम आयत है, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के विरोधियों के द्वेष एवं हठधर्म का वर्णन करते हुए कहती है कि वे खुलकर उनकी पैग़म्बरी का इन्कार करते तथा उनकी बातों को स्वीकार नहीं करते थे। इस सूरे के आरंभ में भी ईश्वर ने अपने पैग़म्बर तथा ईमान वालों को संदेश दिया था कि यद्यपि जो कुछ ईश्वर की ओर से पैग़म्बर के पास आया है, सत्य है किन्तु बहुत से लोग ईमान नहीं लाते अतः लोगों के कुफ़्र के कारण उन्हें ईमान में संदेह नहीं करना चाहिए।इस आयत में ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि काफ़िरों एवं विरोधियों के इन्कार पर आप उनसे यह कह दीजिए कि मुझे तुम्हारी पुष्टि की अपेक्षा व प्रतीक्षा नहीं थी कि मैं तुम्हारे इन्कार के कारण अपनी पैग़म्बरी का दायित्व निभाना छोड़ दूं। जिस ईश्वर ने मुझे पैग़म्बर बना कर भेजा है वही मेरे लिए पर्याप्त है और जो लोग ईश्वरीय किताब का ज्ञान रखते हैं वे मेरे निमंत्रण को स्वीकार करेंगे और यही मेरे लिए काफ़ी है।क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों का कहना है कि इस आयत में उस व्यक्ति से तात्पर्य, जिसके पास ईश्वरीय किताब का ज्ञान है, हज़रत अली अलैहिस्सलाम हैं कि जो सबसे पहले पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम पर ईमान लाए और अपनी आयु के अंतिम दिन तक ईमान पर डटे रहे।स्पष्ट है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम जैसे व्यक्ति का ईमान हज़ारों अनेकेश्वरवादियों के कुफ़्र से बहुत अच्छा है और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी के संबंध में उनकी गवाही, विरोधियों के हर प्रकार के इन्कार और संदेह को समाप्त कर देती है क्योंकि उनका ईमान, ज्ञान व चेतना के आधार पर था न कि पारिवारिक व जातीय प्रेम व शत्रुता के आधार पर।इस आयत से हमने सीखा कि जिसे ईमान वालों के प्रति ईश्वर के समर्थन पर ईमान होता है वह कभी भी विरोधियों की ओर से झुठलाने और अपमानित किए जाने से हतोत्साहित नहीं होता।संख्या सदैव, मानदंड नहीं होती, कभी एक ज्ञानी की गवाही का महत्त्व, हज़ारों अनपढ़ लोगों के इन्कार से अधिक होता है।