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    सूरए रअद, आयतें 7-10, (कार्यक्रम 407)

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    आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 7 की तिलावत सुनते हैं।وَيَقُولُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْلَا أُنْزِلَ عَلَيْهِ آَيَةٌ مِنْ رَبِّهِ إِنَّمَا أَنْتَ مُنْذِرٌ وَلِكُلِّ قَوْمٍ هَادٍ (7)और काफ़िर कहते हैं कि क्यों उनके पास उनके पालनहार की ओर से कोई निशानी और चमत्कार नहीं आया है? (हे पैग़म्बर!) आप तो केवल (ईश्वर से) डराने वाले हैं और हर जाति के लिए एक मार्गदर्शक है। (13:7)जो लोग द्वेष और हठधर्मी के कारण पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी को स्वीकार नहीं करते थे वे विभिन्न प्रकार के बहाने बनाते थे, उदाहरण स्वरूप वे कहते थे कि इस पैग़म्बर के पास ईसा व हज़रत मूसा की भांति कोई चमत्कार क्यों नहीं है? हम जो कुछ कहते हैं ये उसे क्यों नहीं करते?जबकि प्रथम तो किसी भी पैग़म्बर का चमत्कार उसकी जाति की सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुकूल होता है, उदाहरण स्वरूप जिस समय मिस्र में जादू टोने का प्रचलन था तो उस समय हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार जादूगरों के काम के समान थे इसीलिए फ़िरऔन ने उन्हें बड़ा जादूगर कहा। इसी प्रकार हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का चमत्कार असाध्य रोगों में ग्रस्त लोगों का उपचार करना तथा मरे हुए लोगों को जीवित करना था।जिस काल में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने अपनी पैग़म्बरी की घोषणा की उस काल में अरबों के बीच शेर शायरी को सबसे बड़ी कला समझा जाता था। इसी कारण उनका चमत्कार भी इसी प्रकार का था और शब्दालंकार की दृष्टि से बेजोड़ था किन्तु काफ़िर जो सत्य को स्वीकार नहीं करना चाहते थे कुछ अन्य बातों की मांग करते थे। इतिहास के अनुभव से भी पता चलता है कि यदि वे जो कुछ कह रहे थे उसे पूरा भी कर दिया जाता तो वे कोई दूसरा बहाना खोज लेते। जो सोया हुआ है उसे बड़ी सरलता से जगाया जा सकता है किन्तु जो सोता हुआ बन गया है उसे किसी भी प्रकार से जगाना संभव नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का काम लोगों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को पूरा करना नहीं बल्कि उन्हें ईश्वर से डराना है।यद्यपि पैग़म्बरी समाप्त हो चुकी है और अब कोई पैग़म्बर नहीं आएगा किन्तु ईश्वर ने हर जाति व समुदाय में ऐसे नेताओं और धर्मगुरूओं को रखा है जो सत्य के मार्ग की ओर लोगों का मार्गदर्शन करते हैं।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 8 की तिलावत सुनते हैं।اللَّهُ يَعْلَمُ مَا تَحْمِلُ كُلُّ أُنْثَى وَمَا تَغِيضُ الْأَرْحَامُ وَمَا تَزْدَادُ وَكُلُّ شَيْءٍ عِنْدَهُ بِمِقْدَارٍ (8)ईश्वर (भलि भांति) जानता है कि हर मादा के गर्भ में क्या है, गर्भाशयों में क्या कमी और वृद्धि होती है और उसके निकट हर वस्तु की मात्रा निर्धारित है। (13:8)यह आयत और इसके बाद की आयतें प्रत्यक्ष और परोक्ष सभी मामलों में ईश्वर के व्यापक ज्ञान की ओर संकेत करती हैं। इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण माता के गर्भ में भ्रूण का पलना बढ़ना है। ऐसी स्थिति में जब माता को अपने गर्भ में मौजूद शिशु के बारे में कुछ ज्ञान नहीं होता, ईश्वर उसकी सभी आवश्यकताओं से अवगत है। माता के गर्भ में शिशु के आने और नौ महीने तक उसके सभी कर्म ईश्वर के ज्ञान और उसकी शक्ति से होते हैं और माता इन बातों के व्यवहारिक होने का माध्यम होती है।आगे चलकर आयत इस मूल सिद्धांत की ओर संकेत करती है कि ईश्वर ने गर्भकाल और प्रसूति के लिए कुछ नियम निर्धारित किए हैं, यह कोई बिना हिसाब किताब का काम नहीं है। भ्रूण संसार में स्वस्थ आता है या अस्वस्थ, शारीरिक रूप से परिपूर्ण होता है या विकलांग, अकेला जन्म लेता है या जुड़वां यह सब बातें उन अटल नियमों के आधार पर हैं जिन्हें ईश्वर ने इस संसार के लिए निर्धारित किया है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर को संसार की केवल मूल बातों का ज्ञान नहीं है बल्कि वह छोटी से छोटी बात से भी अवगत है, यहां तक कि उसे माता के गर्भ में मौजूद भ्रूण के बारे में भी संपूर्ण ज्ञान है।गर्भावस्था में बच्चे की मनोस्थिति में माता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है अतः इस्लामी शिक्षाओं में महिलाओं से कहा गया है कि वे गर्भावस्था में अपने व्यवहार और मनोदशा पर विशेष ध्यान दें।आइये अब सूरए रअद की आयत संख्या 9 और 10 की तिलावत सुनते हैं।عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ الْكَبِيرُ الْمُتَعَالِ (9) سَوَاءٌ مِنْكُمْ مَنْ أَسَرَّ الْقَوْلَ وَمَنْ جَهَرَ بِهِ وَمَنْ هُوَ مُسْتَخْفٍ بِاللَّيْلِ وَسَارِبٌ بِالنَّهَارِ (10)वह (ईश्वर हर) प्रत्यक्ष और परोक्ष (बात) का जानने वाला है (और वह) अत्यंत उच्च और महान है। (13:9) तुममें से कोई चुपके से बात करे या ऊंचे स्वर में, कोई रात में छिपा हो या दिन को रास्ते में चल रहा हो, उसके लिए सब एक समान है। (13:10)पिछली आयत में माता के गर्भ में भ्रूण के बारे में ईश्वर के ज्ञान की ओर संकेत करने के बाद यह आयत उसके व्यापक ज्ञान के अन्य उदाहरणों की ओर संकेत करते हुए कहती है कि जिन बातों का तुम अपनी इंद्रियों से आभास करते हो या जो बातें तुम्हारी इंद्रियों से आभास के योग्य नहीं हैं, किन्तु अस्तित्व रखती हैं, उन सबके बारे में ईश्वर को पूरा ज्ञान है।वह अतीत और भविष्य की हर बात से अवगत है। उसने पूरे ब्रहमांड और उसमें मौजूद हर वस्तु की रचना की है अतः वह हर वस्तु की छोटी से छोटी बात तक से अवगत है। वास्तविकता यह है कि यदि मनुष्य इस बात पर ईमान और विश्वास रखे कि ईश्वर हर बात, हर वस्तु, हर काम और हर स्थान से चाहे वह गुप्त हो या प्रकट अवगत है, तो वह पाप नहीं करेगा और अपने व्यवहार तथा कथन पर नियंत्रण रखेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर हर परिपूर्णता से उच्च व श्रेष्ठ तथा हर बुराई से दूर व पवित्र है।सभी वस्तुओं और उनके मामलों के बारे में ईश्वर का ज्ञान एक समान है और समय, स्थान व परिस्थतियों से उसके ज्ञान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।