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    सूरए हज, आयतें 1-6, (कार्यक्रम 591)

    सूरए हज, आयतें 1-6, (कार्यक्रम 591)
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    आइये पहले सूरए हज की पहली और दूसरी आयतों की तिलावत सुनें।
    بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ يَا أَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمْ إِنَّ زَلْزَلَةَ السَّاعَةِ شَيْءٌ عَظِيمٌ (1) يَوْمَ تَرَوْنَهَا تَذْهَلُ كُلُّ مُرْضِعَةٍ عَمَّا أَرْضَعَتْ وَتَضَعُ كُلُّ ذَاتِ حَمْلٍ حَمْلَهَا وَتَرَى النَّاسَ سُكَارَى وَمَا هُمْ بِسُكَارَى وَلَكِنَّ عَذَابَ اللَّهِ شَدِيدٌ (2)
    अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। हे लोगो! अपने पालनहार का डर रखो! कि निश्चय ही प्रलय का भूकम्प बड़ी भयानक चीज़ है (22:1) जिस दिन तुम उसे देखोगे, (स्थिति यह होगी कि) दूध पिलाने वाली प्रत्येक महिला अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाएगी और प्रत्येक गर्भवती अपना गर्भभार रख देगी। और तुम, लोगों को नशे में (मस्त) देखोगे जबकि वे नशे में नहीं होंगे बल्कि ईश्वर का दंड अत्यंत कठोर होगा। (22:2)
    यह सूरा लोगों को प्रलय के संबंध में चेतावनी देते हुए माया मोह और भौतिकवाद से दूरी की सिफ़ारिश करता है और कहता है कि प्रलय एक बड़े भूकंप के साथ आरंभ होगा। यह ऐसा भूकंप होगा जिसके आते ही लोगों में भय व आतंक व्याप्त हो जाएगा और वे इस प्रकार घबराए व चकराए हुए होंगे कि उनका व्यवहार साधारण लोगों जैसा नहीं होगा बल्कि वे नशे में धुत लोगों की भांति इधर-उधर हो रहे होंगे जबकि ऐसी कोई बात नहीं होगी बल्कि ईश्वरीय दंड के चिन्ह देख कर वे आतंकित हो गए होंगे।
    ये आयतें इस संसार के अंत से भी संबंधित हो सकती हैं कि एक भयंकर भूकंप के साथ संसार की व्यवस्था का ताना-बाना बिखर जाएगा। इस स्थिति में दूध पीते बच्चे और गर्भवती महिला से तात्पर्य उनका वास्तविक अर्थ होगा। इसी प्रकार ये आयतें प्रलय से भी संबंधित हो सकती हैं कि जो एक बड़े भूकंप के साथ आरंभ होगा जैसा कि सूरए ज़िलज़ाल में कहा गया है। इस स्थिति में दूध पीते बच्चे और गर्भवती महिला का उल्लेख सांकेतिक अर्थ में होगा अर्थात प्रलय का दृश्य इतना भयानक है कि यदि उस अवसर पर कोई दूध पीता बच्चा और गर्भवती महिला हो तो ऐसा-ऐसा होगा।
    इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में मुक्ति व मोक्ष का एकमात्र मार्ग इस संसार में बुराइयों व पापों से दूरी है।
    केवल प्रलय पर ईमान पर्याप्त नहीं है बल्कि सदैव प्रलय के दिन और उसकी कड़ाइयों को याद रखना चाहिए ताकि हम माया मोह में ग्रस्त न हों।
    प्रलय की कठिनाइयां, मनुष्यों के सबसे मज़बूत रिश्ते अर्थात माता व संतान के प्रेम को भी समाप्त कर देंगी और उस दिन की कड़ी घटनाएं मनुष्य की बुद्धि को मंद कर देंगी।
    आइये अब सूरए हज की तीसरी और चौथी आयतों की तिलावत सुनें।
    وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يُجَادِلُ فِي اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَيَتَّبِعُ كُلَّ شَيْطَانٍ مَرِيدٍ (3) كُتِبَ عَلَيْهِ أَنَّهُ مَنْ تَوَلَّاهُ فَأَنَّهُ يُضِلُّهُ وَيَهْدِيهِ إِلَى عَذَابِ السَّعِيرِ (4)
    और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ज्ञान के बिना ही ईश्वर के विषय में झगड़ते हैं और हर उद्दंडी शैतान का अनुसरण करते हैं। (22:3) जबकि शैतान के लिए लिख दिया गया है कि जो उसकी अभिभावकता को स्वीकार करेगा वह उसे पथभ्रष्ट करके रहेगा और उसे दहकती आग के दंड की ओर ले जाएगा। (22:4)
    पिछली आयतों में प्रलय के बारे में चेतावनी देने के बाद इन आयतों में कहा गया है कि अज्ञान के चलते अस्तित्व में आने वाले हठधर्म एवं अंधे अनुसरण के कारण बहुत से लोग, सत्य से लड़ने के लिए उठ खड़े होते हैं और बिना किसी तर्क के कभी ईश्वर का और कभी प्रलय का इन्कार कर देते हैं जबकि इस इन्कार का कारण बुद्धि व ज्ञान का अनुसरण नहीं बल्कि अपनी आंतरिक इच्छाओं और शैतानी विचारों का पालन है।
    निश्चित रूप से जो भी शैतान के मार्ग पर चलेगा उसे कभी भी मुक्ति व कल्याण की राह नहीं मिलेगी बल्कि वह सत्य एवं वास्तविकता के मार्ग से विचलित हो जाएगा और उसका अंतिम ठिकाना नरक के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा।
    इन आयतों से हमने सीखा कि वार्ता और वाद-विवाद यदि तर्क व ठोस कारण पर आधारित हो तो स्वीकार्य होता है किंतु यदि वह हठधर्म एवं अहंकार के कारण हो तो उसका कोई परिणाम नहीं निकल सकता।
    तथ्यों के इन्कार का कारण अधिक तर अज्ञान होता है जो हठधर्म और अंधे अनुसरण का कारण बनता है और सत्य को स्वीकार करने के मार्ग में बाधा बनता है।
    शैतान सभी लोगों को नहीं अपितु जो लोग उसकी मित्रता व अभिभावकता को स्वीकार करते हैं उन्हीं को पथभ्रष्ट करता है।
    आइये अब सूरए हज की पांचवीं और छठी आयतों की तिलावत सुनें।
    يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنْ كُنْتُمْ فِي رَيْبٍ مِنَ الْبَعْثِ فَإِنَّا خَلَقْنَاكُمْ مِنْ تُرَابٍ ثُمَّ مِنْ نُطْفَةٍ ثُمَّ مِنْ عَلَقَةٍ ثُمَّ مِنْ مُضْغَةٍ مُخَلَّقَةٍ وَغَيْرِ مُخَلَّقَةٍ لِنُبَيِّنَ لَكُمْ وَنُقِرُّ فِي الْأَرْحَامِ مَا نَشَاءُ إِلَى أَجَلٍ مُسَمًّى ثُمَّ نُخْرِجُكُمْ طِفْلًا ثُمَّ لِتَبْلُغُوا أَشُدَّكُمْ وَمِنْكُمْ مَنْ يُتَوَفَّى وَمِنْكُمْ مَنْ يُرَدُّ إِلَى أَرْذَلِ الْعُمُرِ لِكَيْلَا يَعْلَمَ مِنْ بَعْدِ عِلْمٍ شَيْئًا وَتَرَى الْأَرْضَ هَامِدَةً فَإِذَا أَنْزَلْنَا عَلَيْهَا الْمَاءَ اهْتَزَّتْ وَرَبَتْ وَأَنْبَتَتْ مِنْ كُلِّ زَوْجٍ بَهِيجٍ (5) ذَلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْحَقُّ وَأَنَّهُ يُحْيِي الْمَوْتَى وَأَنَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (6)
    हे लोगो! यदि तुम्हें (प्रलय के दिन) पुनः (जीवित करके) उठाए जाने के बारे में कोई सन्देह हो तो (देखो कि) निश्चित रूप से हमने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर निषेचित अंडाणु से, फिर लोथड़े से, फिर माँस के टुकड़े से जिसमें से कुछ रचना की पूर्ण दशा में होते हैं और कुछ अपूर्ण दशा में ताकि हम तुम पर (अपनी शक्ति को) स्पष्ट कर दें और हम जिसे चाहते है एक नियत समय तक गर्भाशयों में ठहराए रखते है। फिर तुम्हें एक बच्चे के रूप में निकाल लाते है। फिर (तुम्हारा पालन-पोषण होता है) ताकि तुम अपनी युवावस्था को पहुंच जाओ और तुममें से कोई तो पहले मर जाता है और कोई बुढ़ापे की जीर्ण अवस्था की ओर फेर दिया जाता है इस प्रकार से कि उसे ज्ञान के बाद किसी वस्तु का ज्ञान नहीं रह जाता। और तुम भूमि को देखते हो कि सूखी पड़ी है। फिर जैसे ही हम उस पर पानी बरसाते हैं तो उसमें गति आ जाती है, वह समृद्ध हो जाती और उसमें हर प्रकार की शोभनीय वस्तुएं उगने लगती हैं। (22:5) यह इस लिए है कि (तुम जान लो कि) ईश्वर ही सत्य है और वह मुर्दों को जीवित करता है और उसे हर चीज़ पर प्रभुत्व प्राप्त है। (22:6)
    पिछली आयतों में प्रलय आने के बारे में विरोधियों के संदेह का उल्लेख करने के पश्चात इन आयतों में क़ुरआने मजीद प्रलय की संभावना के बारे में दो स्पष्ट तर्क प्रस्तुत करता है। प्रथम गर्भावस्था के दौरान होने वाले परिवर्तन और दूसरा पौधों के उगने के समय धरती में आने वाले परिवर्तन। ये ऐसे परिवर्तन हैं जिनसे लोगों का स्वाभाविक रूप से सामना रहता है और अपनी आयु में वे बारंबार इन्हें देखते हैं। पहली आयत में गर्भ में मनुष्य की रचना के आरंभ से लेकर अंतिम चरण तक की ओर संकेत किया गया है और इसे क़ुरआने मजीद के वैज्ञानिक चमत्कारों में से एक समझा जाता है क्योंकि जिस समय ईश्वर की ओर से क़ुरआन भेजा गया उस समय गर्भ धारण के नौ महीनों के दौरान इन चरणों को देखने का कोई साधन नहीं था और जो कुछ इस ईश्वरीय किताब ने बयान किया वह अपने काल में पहली बार बयान हुआ था।
    रोचक बात यह है कि क़ुरआने मजीद के आने के बाद चौदह शताब्दियां बीत जाने और विज्ञान व तकनीक में महान प्रगतियां होने के बावजूद, क़ुरआन ने गर्भ के चरणों के बारे में जो कुछ बयान किया है वह अब भी वैज्ञानिक खोजों से तनिक भी विरोधाभास नहीं रखता और इस विषय के विशेषज्ञ इसे इस आसमानी किताब की विचित्र बातों में से एक मानते हैं। आगे चल कर आयत, जन्म के बाद शिशु के बड़े होने की प्रक्रिया की ओर संकेत करते हुए कहती है कि बड़े होने की यह प्रक्रिया रुकती नहीं है बल्कि शिशु का युवाकाल और अधेड़ आयु तक विकास होता रहता है और वह अपनी क्षमताओं व योग्यताओं के चरम तक पहुंच जाता है। इसके बाद मनुष्य के जीवन के पतन की प्रक्रिया आरंभ होती है और वह वृद्धावस्था को पहुंच जाता है कि जो उसकी कमज़ोरी व दुर्बलता का चरम बिंदु होता है। वृद्धावस्था में मनुष्य, बच्चों जैसी स्थिति में होता है।
    आरंभ से लेकर अंत तक इस मार्ग की समीक्षा से एक ओर तो ईश्वर की असीम शक्ति और मृत लोगों को जीवित करने सहित हर चीज़ पर उसके संपूर्ण प्रभुत्व का पता चलता है और दूसरी ओर यह भी ज्ञात होता है कि मनुष्य अपनी सृष्टि के आरंभ बिंदु की ओर वापस लौट जाएगा। एक अन्य बात जिसकी ओर इन आयतों में संकेत किया गया है, वह शीत ऋतु में मरने के बाद वसंत ऋतु में धरती का पुनः जीवित होना है। मृत धरती, वर्षा के कारण जीवित हो कर प्रफुल्ल हो जाती है और उसमें विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां और पेड़-पौधे उगते हैं। यह संसार की प्रकृति में प्रलय का एक उदाहरण है। यह सब इस कारण है कि ईश्वर सत्य व स्थायी है और उसने हर वस्तु को सत्य के आधार पर सुदृढ़ बनाया है। उन्हीं में से एक लोगों को मरने के बाद जीवित करना है और यह ईश्वर की असीम शक्ति के समक्ष कुछ भी नहीं है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय का इन्कार करने वालों के पास कोई ठोस तर्क नहीं है बल्कि उनका इन्कार संदेह व शंका पर आधारित है और ईश्वर की असीम शक्ति के दृष्टिगत यह संदेह दूर हो जाता है।
    प्रलय के चिन्ह इसी संसार में आंखों से देखे जा सकते हैं, अलबत्ता उन्हें वही लोग देख सकते हैं जो प्रलय की ओर से निश्चेत न हों और सत्य को समझना चाहते हों।
    मनुष्य की आयु का सबसे तुच्छ चरण, अज्ञान व भूल जाने का चरण है, तो उसकी आयु का सबसे अच्छा काल, चेतना व ज्ञान का काल है।
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