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    सूरए हज, आयतें 12-16, (कार्यक्रम 593)

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    आइये पहले सूरए हज की बारहवीं और तेरहवीं आयतों की तिलावत सुनें।
    يَدْعُو مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُ وَمَا لَا يَنْفَعُهُ ذَلِكَ هُوَ الضَّلَالُ الْبَعِيدُ (12) يَدْعُو لَمَنْ ضَرُّهُ أَقْرَبُ مِنْ نَفْعِهِ لَبِئْسَ الْمَوْلَى وَلَبِئْسَ الْعَشِيرُ (13)
    वह ईश्वर को छोड़ कर उस (वस्तु) को पुकारता है जो न तो उसे हानि पहुँचा सकती और न ही लाभ (और) यही बहुत दूर (तक फैली हुई) पथभ्रषटता है। (22:12) (बल्कि) वह उसे पुकारता है जिसकी हानि उसके (अपेक्षित) लाभ की तुलना में अधिक निकट है। वह कितना बुरा संरक्षक और कितना बुरा साथी है। (22:13)
    इससे पहले हमने कहा कि कमज़ोर ईमान वाले लोग जब कठिनाइयों और संकटों में ग्रस्त होते हैं तो कुफ़्र बकने लगते हैं। ये आयतें कहती हैं कि धीरे-धीरे सत्य के मार्ग से वे अधिक भटकते जाते हैं और ईश्वर के स्थान पर अंधविश्वास उनके मन में बस जाता है। वे सोचते हैं कि कुछ सितारे या निर्जीव पत्थर, उनके सौभाग्य या दुर्भाग्य में भूमिका निभाते हैं। अतः वे विभिन्न शैलियों से उनसे अपनी समस्याओं के निदान की प्रार्थना करते हैं और इन निर्जीव वस्तुओं के समक्ष ऐसा व्यवहार अपनाते हैं मानो वे उनकी उपासना करते हों।
    खेद के साथ कहना पड़ता है कि आज के तथाकथित सभ्य संसार में भी कुछ लोग घोड़े की नाल, सांप की काल्पनिक मणि और नींबू व हरी मिर्च जैसी वस्तुओं को संपन्नता की प्राप्ति और समस्याओं के निवारण के लिए प्रभावी समझते हैं। कुछ अन्य लोग अपनी कठिनाइयों व दुखों की समाप्ति और सांसारिक प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए ईश्वर के बजाए अपने ही समान लोगों का आंख बंद करके आज्ञापालन करते हैं जबकि इस प्रकार के लोगों की ओर से पहुंचने वाली हानि उनके द्वारा होने वाले लाभ से अधिक निकट होती है और वे ख़तरे के समय, मनुष्य के अच्छे साथी सिद्ध नहीं हो सकते। फ़िरऔन के अनुयाई, हज़रत मूसा के ईश्वर के बजाए फ़िरऔन की उपासना करते थे किंतु जब वे नील नदी में डूबने लगे तो उन्हें फ़िरऔन की ओर से कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई और वे भी उसकी भांति नील में डूब गए।
    इन आयतों से हमने सीखा कि यह आस्था अनेकेश्वरवादी एवं भ्रष्ट है कि ईश्वर के अतिरिक्त भी कोई मनुष्य के जीवन में प्रभावी है।
    उन लोगों से मेल-जोल रखने से बचना चाहिए जो हमें ईश्वर के मार्ग से दूर करके अन्य मार्गों की ओर ले जाते हैं क्योंकि इस प्रकार के लोग, ख़तरे के समय हमें कोई लाभ नहीं पहुंचाते।
    आइये अब सूरए हज की चौदहवीं आयत की तिलावत सुनें।
    إِنَّ اللَّهَ يُدْخِلُ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ إِنَّ اللَّهَ يَفْعَلُ مَا يُرِيدُ (14)
    निश्चय ही ईश्वर उन लोगों को, जो ईमान लाए और जिन्होंने अच्छे कर्म किए, ऐसे बाग़ों में प्रविष्ट करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। निसंदेह ईश्वर जो चाहता है कर देता है। (22:14)
    कमज़ोर ईमान वाले लोगों के भविष्य का वर्णन करने के पश्चात कि जो संसार में पथभ्रष्टता और प्रलय में कड़े दंड में ग्रस्त होते हैं, यह आयत ईमान वालों के भविष्य की ओर संकेत करती है। आयत का संदेश है कि जो लोग अपनी आयु के अंत तक ईमान के साथ जीवन बिताते हैं, ईमान के साथ इस संसार से जाते हैं और जीवन में भलाई व पवित्रता की नीति अपनाते हैं, वे परलोक में ईश्वर के महान पारितोषिक का पात्र बनते हैं।
    स्पष्ट है कि ईश्वर ने जो भी वचन दिया है उसे वह अवश्य ही पूरा करेगा क्योंकि वह अपने बंदों के सभी मामलों से भी अवगत है और उन्हें पारितोषिक प्रदान करने की क्षमता भी रखता है।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईमान, कर्म के बिना नहीं हो सकता जैसा कि बिना ईमान के किए जाने वाले कर्म का भी कोई मूल्य नहीं है। मनुष्य की मुक्ति व कल्याण की कुंजी, ईमान व कर्म का एक साथ होना है।
    काफ़िर, अपने ही जैसे लोगों से सहायता चाहते हैं जबकि जिन लोगों ने उन्हें संसार में लाभ नहीं पहुंचाया हो वे प्रलय में किस प्रकार उनकी सहायता कर सकते हैं किंतु ईमान वाले केवल ईश्वर से ही सहायता चाहते हैं क्योंकि वह उनकी सहायता करने में भी सक्षम है और प्रलय के दिन का मालिक और फ़ैसला करने वाला भी है।
    आइये अब सूरए हज की पंद्रहवीं और सोलहवीं आयतों की तिलावत सुनें।
    مَنْ كَانَ يَظُنُّ أَنْ لَنْ يَنْصُرَهُ اللَّهُ فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ فَلْيَمْدُدْ بِسَبَبٍ إِلَى السَّمَاءِ ثُمَّ لِيَقْطَعْ فَلْيَنْظُرْ هَلْ يُذْهِبَنَّ كَيْدُهُ مَا يَغِيظُ (15) وَكَذَلِكَ أَنْزَلْنَاهُ آَيَاتٍ بَيِّنَاتٍ وَأَنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَنْ يُرِيدُ (16)
    जो कोई यह समझता है कि ईश्वर लोक परलोक में अपने पैग़म्बर की कोई सहायता नहीं करेगा तो उसे चाहिए कि वह आकाश की ओर एक रस्सी ताने फिर (अपने जीवन की डोर को) काट दे तब देख ले कि क्या उसका उपाय उस बात को दूर कर सकता है जिसने उसे क्रोधित किया है? (22:15) और इसी प्रकार हमने इस (क़ुरआन) को स्पष्ट आयतों के साथ भेजा है और बात यह है कि ईश्वर जिसे चाहता है (सही) मार्ग दिखाता है। (22:16)
    ये आयतें इस्लाम की प्रगति पर मक्के के अनेकेश्वरवादियों के क्रोध की ओर संकेत करती हैं क्योंकि उन्हें आशा नहीं थी कि ईश्वर अपने पैग़म्बर की सहायता करेगा और इस्लाम धर्म तीव्रता से फैलने लगेगा। यही कारण है कि वे विभिन्न रूपों में अपने क्रोध व अप्रसन्नता को प्रकट करते थे। ईश्वर उनके उत्तर में कहता है कि यदि तुम बहुत क्रोधित हो तो अपने आपको एक रस्सी पर टांग लो कि शायद इस प्रकार तुम्हारा क्रोध शांत हो जाए।
    मूल रूप से ईर्ष्यालु लोग, जो दूसरों की प्रगति एवं विकास को नहीं देख सकते, अपने लिए मृत्यु की कामना करते हैं और कहते हैं कि काश हम होते ही नहीं कि अमुक व्यक्ति की यह स्थिति हमें देखने को मिलती। ईश्वर विरोधियों की इसी हालत की ओर संकेत करता है और उनसे कहता है कि यदि तुम पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की विजय को नहीं देख सकते तो अपने आप को मार लो ताकि तुम्हें शांति मिल जाए क्योंकि जो कुछ पैग़म्बर ने लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया है वह ईश्वर की स्पष्ट आयतें हैं और जो कोई सत्य को समझना और स्वीकार करना चाहेगा वह इन की सत्यता पर ईमान ले आएगा किंतु बहुत से लोग इन आयतों को अपनी ग़लत इच्छाओं के विपरीत समझते हैं और इन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते। स्वाभाविक रूप से इस प्रकार के लोगों को मार्गदर्शन प्राप्त नहीं होता।
    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की इच्छा व इरादे पर दुख या क्रोध जताने के बजाए हमें उसकी दया व कृपा के प्रति आशावान रहना चाहिए क्योंकि यही हमारी मुक्ति व कल्याण का साधन है।
    मार्गदर्शन, ईश्वर का काम है और क़ुरआने मजीद मनुष्य के मार्गदर्शन का साधन है। क़ुरआन के मार्गदर्शन से वही व्यक्ति लाभान्वित हो सकता है जिसके भीतर ईश्वरीय प्रकाश हो और जो सृष्टि के रचयिता पर ईमान रखता हो।
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