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    सूरए हज, आयतें 17-21, (कार्यक्रम 594)

    सूरए हज, आयतें 17-21, (कार्यक्रम 594)
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    आइये पहले सूरए हज की सत्रहवीं आयत की तिलावत सुनें।
    إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا وَالَّذِينَ هَادُوا وَالصَّابِئِينَ وَالنَّصَارَى وَالْمَجُوسَ وَالَّذِينَ أَشْرَكُوا إِنَّ اللَّهَ يَفْصِلُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ (17)
    निश्चित रूप से जो लोग ईमान लाए उनके और जो यहूदी हुए और साबेई और ईसाई तथा मजूस अर्थात पारसी और जिन लोगों ने किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराया, ईश्वर प्रलय के दिन उन सबके बीच फ़ैसला कर देगा कि निश्चय ही ईश्वर हर चीज़ का साक्षी है। (22:17)
    प्रलय के दिन का एक नाम, यौमुल फ़स्ल अर्थात सत्य और असत्य के बीच अंतर तथा विभिन्न धर्मों व मतों के अनुयाइयों के मतभेदों की समाप्ति का दिन है। इस आयत में ईश्वरीय किताब रखने वाले चार गुटों की ओर संकेत किया गया है। यहूदी, ईसाई, साबेई और पारसी। पहले दो गुट जाने पहचाने हैं किंतु अगले दो गुटों के लोग कौन हैं। साबेई, जिनका नाम इससे पहले सूरए बक़रह की बासठवीं आयत में भी आ चुका है, हज़रत यहया अलैहिस्सलाम के मानने वाले हैं। उनकी आस्थाएं ईसाइयों और यहूदियों की आस्थाओं का मिश्रण हैं। वे बड़ी बड़ी नदियों के किनारे जीवन बिताते हैं और बहते पानी को बहुत अधिक महत्व देते हैं।
    मजूस या ज़रतुश्ती या पारसी, जिनका नाम केवल एक ही बार क़ुरआने मजीद में आया है, ज़रतुश्त के अनुयाइयों को कहा जाता है। ज़रतुश्त का संबंध हज़रत ईसा मसीह से कई शताब्दियों पूर्व से है और उनकी किताब का नाम अविस्ता है जिसके कुछ ही अंश इस समय मौजूद हैं। पारसी, यज़दान व अहरीमन के नाम से भलाई व बुराई के दो स्रोतों पर विश्वास रखते हैं और चार तत्वों विशेष रूप से अग्नि का बहुत अधिक सम्मान करते हैं। उनके उपासना स्थलों में हमेशा आग जलती रहती है।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वालों का मामला, आसमानी किताब रखने वालों और अनेकेश्वरवादियों से अलग है और प्रलय में इनमें से प्रत्येक गुट का अलग-अलग हिसाब किया जाएगा।
    जब तक संसार बाक़ी है तब तक धार्मिक मतभेद बाक़ी रहेंगे। हमारा कर्तव्य यह है कि अन्य लोगों को इस्लाम का निमंत्रण दें किंतु इस बात की आशा न रखें कि सभी लोग इस्लाम को स्वीकार कर लेंगे।
    आइये अब सूरए हज की अट्ठारहवीं आयत की तिलावत सुनें।
    أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ يَسْجُدُ لَهُ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ وَالشَّمْسُ وَالْقَمَرُ وَالنُّجُومُ وَالْجِبَالُ وَالشَّجَرُ وَالدَّوَابُّ وَكَثِيرٌ مِنَ النَّاسِ وَكَثِيرٌ حَقَّ عَلَيْهِ الْعَذَابُ وَمَنْ يُهِنِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِنْ مُكْرِمٍ إِنَّ اللَّهَ يَفْعَلُ مَا يَشَاءُ (18)
    क्या तुमने नहीं देखा कि जो कोई आकाशों में है और जो कोई धरती में है, ईश्वर ही के समक्ष नतमस्तक है और सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पर्वत, वृक्ष, धरती पर चलने वाले जानवर और बहुत से मनुष्य (भी ईश्वर को सजदा करते हैं)? और बहुत से (लोग) ऐसे हैं जिनका दंड का पात्र बनना सिद्ध हो चुका है और जिसे ईश्वर अपमानित करे उसे सम्मानित करने वाला कोई नहीं। निश्चय ही ईश्वर जो चाहता है, करता है (22:18)
    यह आयत ईश्वर के समक्ष सृष्टि की सभी वस्तुओं के नतमस्तक होने का उल्लेख करती है। इस बात को क़ुरआने मजीद में कई बार वस्तुओं द्वारा ईश्वर के गुणगान के रूप में भी बयान किया जा चुका है। निश्चित रूप से सृष्टि की सभी रचनाएं ज्ञानी व सक्षम ईश्वर द्वारा बनाए गए सृष्टि के नियमों और व्यवस्था के क़ानूनों के प्रति समर्पित व नतमस्तक रहती हैं। प्रकृति का यही वह सजदा है जिसमें सभी रचनाएं शामिल हैं चाहे वे सजीव हों या निर्जीव, बुद्धि की स्वामी हों या बुद्धि रहित हों। इस दृष्टि से सभी मनुष्य चाहे वे काफ़िर ही क्यों न हों, अन्य रचनाओं के समान हैं और ईश्वर की सृष्टि की व्यवस्था के समक्ष नतमस्तक हैं।
    दूसरी ओर जिन रचनाओं के पास बौद्धिक शक्ति होती है, जैसे फ़रिश्ते और मनुष्य तो उनके लिए प्राकृतिक सजदे के अतिरिक्त दायित्व के रूप में अनिवार्य सजदा भी रखा गया है। अलबत्ता ईश्वर ने मनुष्य को चयन का जो अधिकार दिया है उसके अंतर्गत वे चाहें तो इस अनिवार्य दायित्व के विरुद्ध भी काम कर सकते हैं किंतु इस स्थिति में उन्हें स्वाभाविक रूप से अपने कर्मों का दंड भुगतना होगा। यह वह दंड होगा जो लोक-परलोक में उनके अपमान का कारण बनेगा।
    इस आयत से हमने सीखा कि संपूर्ण सृष्टि, ब्रह्मांड के रचयिता के समक्ष नतमस्तक है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि कहीं हम इस महान समूह के विपरीत काम न कर बैठें।
    सम्मान व अपमान ईश्वर के हाथ में है और उसकी इच्छा के मार्ग में किसी भी प्रकार की कोई रुकावट नहीं है।
    आइये अब सूरए हज की आयत क्रमांक 19, 20 और 21 की तिलावत सुनें।
    هَذَانِ خَصْمَانِ اخْتَصَمُوا فِي رَبِّهِمْ فَالَّذِينَ كَفَرُوا قُطِّعَتْ لَهُمْ ثِيَابٌ مِنْ نَارٍ يُصَبُّ مِنْ فَوْقِ رُءُوسِهِمُ الْحَمِيمُ (19) يُصْهَرُ بِهِ مَا فِي بُطُونِهِمْ وَالْجُلُودُ (20) وَلَهُمْ مَقَامِعُ مِنْ حَدِيدٍ (21)
    ये दो विरोधी (गुट) हैं जिन्होंने अपने पालनहार के विषय में आपस में शत्रुता की है। तो जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया उनके लिए आग से बने वस्त्र काटे जा चुके है (और) उनके सिरों पर खौलता हुआ पानी डाला जाएगा। (22:19) (जिससे) जो कुछ उनके पेटों में है वह और उनकी खालें पिघल जाएंगी। (22:20) और उनके (दंड के लिए) लोहे के गुर्ज़ या गदाएं होंगी। (22:21)
    इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि बद्र नामक युद्ध में इस्लामी सेना के तीन प्रतिष्ठित लोगों ने, काफ़िरों की सेना के तीन बड़े योद्धाओं को परस्पर मुक़ाबले में मार गिराया। उसके बाद ईश्वर की ओर से यह आयत आई जिसमें उन लोगों के अंजाम की सूचना दी गई है जो इस्लाम से लड़ने के लिए रणक्षेत्र में आए थे।
    ये आयतें उन काफ़िरों को मिलने वाले कड़े दंड की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि मानो वह वस्त्र जो उन्होंने पहन कर रणक्षेत्र में क़दम रखा है, आग के वस्त्र में परिवर्तित हो जाएगा और उनकी त्वचा और उनके शरीर के भीतर मौजूद हर चीज़ को जला देगा। उन्होंने मुसलमानों को मारने के लिए जो तलवार व शस्त्र हाथ में ले रखे हैं वे भारी गदाओं में परिवर्तित हो जाएंगे जो स्वयं उन्हीं के सिरों पर गिरेंगे तथा उनका अंत कर देंगे। उस दहकते नरक में शीतल पानी के बजाए खौलता हुआ पानी उनके सिरों पर डाला जाएगा ताकि उनका दंड दोगुना हो जाए।
    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर तथा धार्मिक आदेशों के बारे में ईमान वाले कभी भी काफ़िरों से समझौता नहीं करते और यह टकराव सदैव जारी रहता है।
    नरक का दंड, अत्यंत कड़ा है और किसी भी व्यक्ति में उसे सहन करने की शक्ति नहीं है।
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