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    सूरए हज, आयतें 22-25, (कार्यक्रम 595)

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    आइये पहले सूरए हज की बाईसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    كُلَّمَا أَرَادُوا أَنْ يَخْرُجُوا مِنْهَا مِنْ غَمٍّ أُعِيدُوا فِيهَا وَذُوقُوا عَذَابَ الْحَرِيقِ (22)
    जब कभी वे घबराकर और दुख के कारण नरक से निकलना चाहेंगे तो उसी में लौटा दिए जाएँगे और (उनसे कहा जाएगा) दहकती हुई आग के दंड (का स्वाद) चखो। (22:22)
    इससे पहले ईमान वालों से युद्ध करने हेतु खड़े होने वाले लोगों के कड़े दंड का उल्लेख किया गया था। यह आयत कहती है कि नरक, पश्चाताप व दुख का स्थान है। संसार में किए गए अपने कर्मों पर पछतावे और दुख का स्थान कि जिसका न तो कोई लाभ होगा, न दंड में कोई कमी आएगी और न ही उसे क्षमा किया जाएगा क्योंकि कर्म का ठिकाना, संसार है और प्रलय बदला व प्रतिफल दिए जाने का स्थान है।
    इस आयत से हमने सीखा कि नरक में शारीरिक दंड से भी अधिक कड़ा, मानसिक दंड होगा जिससे बचना किसी भी प्रकार संभव नहीं होगा।
    जो लोग धर्म से संघर्ष को अपना लक्ष्य बनाते हैं और आयु के अंत तक इस कार्य को जारी रखते हैं, नरक का दंड उनके लिए अनंत होगा।
    आइये अब सूरए हज की तेईसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    إِنَّ اللَّهَ يُدْخِلُ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ يُحَلَّوْنَ فِيهَا مِنْ أَسَاوِرَ مِنْ ذَهَبٍ وَلُؤْلُؤًا وَلِبَاسُهُمْ فِيهَا حَرِيرٌ (23)
    निश्चित रूप से जो लोग ईमान लाए और अच्छे कर्म करते रहे, ईश्वर उन्हें ऐसे बाग़ों में प्रविष्ट करेगा जिनके (पेड़ों के) नीचें (से) नहरें बह रही होंगी। वहाँ वे सोने के कंगनों व मोतियों से आभूषित किए जाएँगे और वहाँ उनका परिधान रेशम (का) होगा (22:23)
    कुफ़्र व ईश्वर के इन्कार तथा ईमान वालों से युद्ध के कारण ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होने वाले नरक वासियों के अंजाम का उल्लेख करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में स्वर्ग में भले कर्म करने वाले मोमिनों के स्थान की ओर संकेत करते हुए कहता है कि काफ़िर जिन चीज़ों के लिए इस संसार में प्रयासरत रहते हैं उन्हें ईश्वर प्रलय में ईमान वालों को प्रदान करेगा। उत्तम बाग़, सर्वोत्तम वस्त्र और सबसे अच्छे आभूषण, जो संसार से प्रेम करने वालों की सबसे बड़ी इच्छाओं में शामिल हैं, भले कर्म करने वालों को स्वर्ग में मिलने वाले साधारण से पारितोषिक में शामिल हैं।
    इस कारण कि ईमान वाले पुरुष घमंड और निश्चेतना में ग्रस्त न हों, उन्हें इस संसार में रेशम के वस्त्र पहनने और सोने के आभूषण प्रयोग करने से रोका गया है किंतु प्रलय में ईश्वर इस वर्जना की भरपाई कर देगा और उन्हें संसार के सबसे अच्छे वस्त्र और सर्वोत्तम आभूषण प्रदान करेगा।
    अलबत्ता शायद सांसारिक जीवन में कुछ लोग ऐसे हों जिन्हें हर वह चीज़ प्राप्त हो जाए जिसकी उन्हें इच्छा हो किंतु संसार प्रेम में ग्रस्त अधिकांश लोग अपनी इच्छाओं तक नहीं पहुंच पाते और लोक-परलोक दोनों में घाटा उठाते हैं।
    इस आयत से हमने सीखा कि हरियाली और प्राकृतिक सौंदर्य से लाभ उठाना, सर्वोच्च शारीरिक और मानसिक आनंदों में से एक है जिसे ईश्वर ने भले कर्म करने वालों को मिलने वाले सबसे पहले पारितोषिक के रूप में बयान किया है।
    क़ुरआने मजीद की प्रशैक्षणिक व्यवस्था में भय व आशा तथा चेतावनी व शुभ सूचना के बीच संतुलन है अतः हमें भी अपने बच्चों के प्रशिक्षण में इसी प्रकार के संतुलन का पालन करना चाहिए।
    आइये अब सूरए हज की चौबीसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    وَهُدُوا إِلَى الطَّيِّبِ مِنَ الْقَوْلِ وَهُدُوا إِلَى صِرَاطِ الْحَمِيدِ (24)
    और उन्हें अच्छी व पवित्र बातों की ओर मार्गदर्शित किया जाता है और प्रशंसित ईश्वर का मार्ग दिखाया जाता है। (22:24)
    पिछली आयत में भौतिक एवं शारीरिक अनुकंपाओं की ओर संकेत करने के बाद क़ुरआने मजीद इस आयत में स्वर्ग की आध्यात्मिक अनुकंपाओं के बारे में कहता है कि स्वर्ग वालों की मनोरम बात-चीत उनके उत्तम आनंदों में से एक है। संसार के रचयिता की प्रसन्नता, लोक-परलोक में ईमान वालों का सबसे बड़ा लक्ष्य है जो ईश्वर के मार्ग पर चल कर प्राप्त किया जाता है और मनुष्य के आध्यात्मिक सामिप्य एवं उच्च मानवीय परिपूर्णताओं की प्राप्ति का कारण बनता है।
    इस आयत से हमने सीखा कि स्वर्ग केवल शारीरिक आनंदों तक सीमित नहीं है और ईश्वर ने वहां आध्यात्मिक आनंद के साधन भी उपलब्ध करा रखे हैं।
    भला अंत उन लोगों से विशेष है जो संसार में ईश्वर के मार्ग पर चलते रहे और ईश्वर के लिए प्रयास करते रहे।
    आइये अब सूरए हज की पचीसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا وَيَصُدُّونَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ وَالْمَسْجِدِ الْحَرَامِ الَّذِي جَعَلْنَاهُ لِلنَّاسِ سَوَاءً الْعَاكِفُ فِيهِ وَالْبَادِ وَمَنْ يُرِدْ فِيهِ بِإِلْحَادٍ بِظُلْمٍ نُذِقْهُ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ (25)
    निःसंदेह जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया और वे (ईमान वालों को) ईश्वर के मार्ग और मस्जिदुल हराम से रोकते हैं, जिसे हमने सब लोगों के लिए, चाहे वह मक्के का रहने वाला हो या बाहर से आया हो, एक समान बनाया है (तो ऐसे लोग हमारे कोप में ग्रस्त होंगे)। और जो कोई इस स्थान पर सत्य के मार्ग से विचलित हो और अत्याचार करे तो हमउसे पीड़ादायक यातना का स्वाद चखाएँगे। (22:25)
    पिछली आयतों में ईमान वालों से शत्रुता के कारण युद्ध करने वालों की स्थिति का वर्णन करने के पश्चात यह आयत उन लोगों के अंजाम की ओर संकेत करती है जो लोगों को हज करने तथा मस्जिदुल हराम में जाने से रोकते हैं और विभिन्न रूपों से उनके मार्ग में रोड़े अटकाते हैं।
    चूंकि मक्के की धरती और विशेष कर मस्जिदुल हराम, जिसमें काबा स्थित है, सभी मुसलमानों से संबंधित है इस लिए कोई भी व्यक्ति किसी भी रूप में अपने लिए विशेषाधिकार नहीं बना सकता, यहां तक कि इस नगर में रहने वाले भी कि मक्का जिनका देश समझा जाता है, लोगों को इस नगर की यात्रा से नहीं रोक सकते और न ही उनके मार्ग में रुकावटें डाल सकते हैं।
    इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक केंद्रों और उपासना स्थलों के सम्मान की रक्षा होनी चाहिए और उपासना करने वालों से हर प्रकार के अनुचित व अभद्र व्यवहार को रोका जाना चाहिए।
    मक्का, ईश्वर का सुरक्षित नगर है और किसी भी व्यक्ति या गुट से संबंधित नहीं है। ईश्वर का घर किसी भी व्यक्ति, सरकार या देश के स्वामित्व में नहीं है। इस पवित्र स्थान को किसी भी विशेष मत की विचारधारा से दूर रखा जाना चाहिए।
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