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    सूरए हज, आयतें 26-29, (कार्यक्रम 596)

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    आइये पहले सूरए हज की छब्बीसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    وَإِذْ بَوَّأْنَا لِإِبْرَاهِيمَ مَكَانَ الْبَيْتِ أَنْ لَا تُشْرِكْ بِي شَيْئًا وَطَهِّرْ بَيْتِيَ لِلطَّائِفِينَ وَالْقَائِمِينَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ (26)
    और (हे पैग़म्बर!) याद कीजिए उस समय को जब हमने इब्राहीम के लिए (ईश्वर के) घर का स्थान उपलब्ध कराया (और उन्हें आदेश दिया) कि किसी भी चीज़ को मेरा समकक्ष न ठहराओ और मेरे घर को तवाफ़ (अर्थात परिक्रमा) करने वालों और (नमाज़ के लिए) खड़े होने, रुकू करने और सजदा करने वालों के लिए साफ़ व पवित्र बनाओ। (22:26)
    इससे पहले मुसलमानों के निकट मस्जिदुल हराम के स्थान और मुसलमानों को ईश्वर के घर के दर्शन से रोकने के काफ़िरों के षड्यंत्रों की ओर संकेत किया गया। यह आयत इस मस्जिद और काबे के, जो मस्जिद के बीच में स्थित है, संक्षिप्त इतिहास का वर्णन करते हुए कहती है कि इस घर का पुनर्निर्माण ईश्वर के आदेश पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के हाथों हुआ है।
    इस्लामी इतिहास के अनुसार काबे का निर्माण पहली बार हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के हाथों हुआ था किंतु समय बीतने के साथ साथ यह घर जर्जर हो गया और फिर ईश्वर ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आदेश दिया कि वे मक्के जा कर एक बार फिर इस घर का, जिसके स्तंभ बाक़ी बचे हुए थे, अपने पुत्र इस्माईल के साथ पुनर्निर्माण करें और इसी प्रकार उसके आस-पास के क्षेत्र को साफ़ कर दें और उन लोगों के लिए तैयार कर दें जो इस घर के तवाफ़ अर्थात परिक्रमा के लिए आते हैं या वहां आ कर नमाज़ पढ़ना करना चाहते हैं।
    इस आयत से हमने सीखा कि उपासना स्थलों में उपस्थिति के लिए हमें अपने भीतर से हर प्रकार के अनेकेश्वरवाद की गंदगी को साफ़ करना चाहिए और पवित्र एवं निष्ठावान मन के साथ वहां प्रविष्ट होना चाहिए।
    मस्जिद की सेवा और उसकी सफ़ाई-सुथराई, हज़रत इब्राहीम जैसे महान ईश्वरीय पैग़म्बर की परंपरा है।
    आइये अब सूरए हज की सत्ताईसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    أَذِّنْ فِي النَّاسِ بِالْحَجِّ يَأْتُوكَ رِجَالًا وَعَلَى كُلِّ ضَامِرٍ يَأْتِينَ مِنْ كُلِّ فَجٍّ عَمِيقٍ (27)
    लोगों को हज के लिए बुलाओ कि वे तुम्हारे पास पैदल और दुबली ऊँटनियों पर सवार हो कर आएँगे जो हर दूर मार्ग से आई होंगी। (22:27)
    काबे की इमारत के निर्माण और उसके आस-पास के क्षेत्र को तवाफ़ व उपासना के लिए तैयार किए जाने के बाद ईश्वर ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आदेश दिया कि वे लोगों को काबे के दर्शन और हज का निमंत्रण दें और यह निमंत्रण केवल मक्के के लोगों के लिए न हो बल्कि निकट व दूर के क्षेत्रों के सभी एकेश्वरवादियों को भी इस नगर में बुलाया जाए ताकि वे एकेश्वरवाद के प्रतीक इस विशाल समारोह अर्थात हज में भाग लें।
    इतिहास साक्षी है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के काल से ले कर अब तक ईश्वर का घर काबा, विभिन्न धर्मों यहां तक कि अनेकेश्वरवादियों के ध्यान का केंद्र रहा है। यहां तक कि इस्लाम के उदय के समय अनेकेश्वरवादी भी काबे का तवाफ़ किया करते थे और हज के संस्कार अदा करते थे। अलबत्ता उनके तवाफ़ और उपासनाओं में कुछ ग़लत बातें भी शामिल थीं।
    इस आयत से हमने सीखा कि हज की यात्रा पर जाना, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की पुकार का उत्तर देने के समान है। उनकी पुकार हज़ारों वर्षों से मक्के के पर्वतों से सुनाई दे रही है।
    ईश्वरीय दायित्वों के पालन में ढिलाई नहीं करनी चाहिए। पैदल या सवारी के साथ, जिस प्रकार से भी संभव हो, दायित्व के पालन के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
    आइये अब सूरए हज की अठ्ठाईसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    وَ لِيَشْهَدُوا مَنَافِعَ لَهُمْ وَيَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ فِي أَيَّامٍ مَعْلُومَاتٍ عَلَى مَا رَزَقَهُمْ مِنْ بَهِيمَةِ الْأَنْعَامِ فَكُلُوا مِنْهَا وَأَطْعِمُوا الْبَائِسَ الْفَقِيرَ (28)
    ताकि वे उन लाभों को देख सकें जो (हज के संस्कार में) उनके लिए रखे गए हैं। और कुछ निश्चित दिनों में (विशेष कर क़ुरबानी के अवसर पर) उन चौपायों पर ईश्वर का नाम लें जो उसने उन्हें प्रदान किए हैं। फिर उसके (मांस) में से स्वयं भी खाओ और वंचित दरिद्र को भी खिलाओ। (22:28)
    पिछली आयत में लोगों को हज के संस्कारों में भाग लेने का निमंत्रण देने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि ईश्वर के घर के निकट मुसलमानों के एकत्रित होने के बहुत से लाभ हैं जिन्हें यहां उपस्थित होने वाले हाजी देख सकते हैं। ये भौतिक लाभ भी होते हैं और आध्यात्मिक अनुकंपाएं भी होती हैं।
    संसार के विभिन्न क्षेत्रों के मुसलमानों के बीच एकता व समरसता उत्पन्न करना, एक दूसरे की संभावनाओं व कमियों के बारे में जानना, समस्याओं के समाधान के लिए परस्पर सहयोग में विस्तार और इसी प्रकार संसार में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास, हज के संसार के सामाजिक लाभों में शामिल हैं।
    मनुष्य की आत्मा को घमंड व अहंकार तथा मायामोह से पवित्र करना और प्रलय एवं अध्यात्म की ओर ध्यान आकर्षित करना भी व्यक्तिगत आयाम से हज की मूल्यवान अनुकंपाओं में से है।
    इस्लामी देशों के बीच आर्थिक संबंधों और व्यापारिक लेन-देन में वृद्धि, हज के आर्थिक आयामों में शामिल है किंतु खेद की बात है कि इस ओर कम ही ध्यान दिया जाता है। यह ऐसी स्थिति में है कि जब हज का आर्थिक आयाम न केवल यह कि इस उपासना से विरोधाभास नहीं रखता बल्कि इस्लामी शिक्षाओं में इसे हज के लाभों में से एक बताया गया है।
    आगे चल कर आयत मिना के क्षेत्र में जानवर की क़ुरबानी के संस्कार की ओर संकेत करती है। चूंकि अनेकेश्वरवादी जानवर को ज़िबह करते समय, मूर्तियों का नाम लेते थे अतः यह आयत मुसलमानों को आदेश देती है कि वे ज़िबह करते समय ईश्वर का नाम लें ताकि यह संस्कार हर प्रकार के अनेकेश्वरवादी व्यवहार से पवित्र हो जाए। आयत लोगों से कहती है कि वे क़ुरबानी के जानवर के मांस का कुछ भाग दरिद्रों को दें क्योंकि अपने धन व दौलत की ओर से आंखें मूंदना और अन्य लोगों विशेष कर दरिद्रों पर ध्यान देना हज की महत्वपूर्ण शिक्षाओं में से एक है।
    इस आयत से हमने सीखा कि हज, उपासना का एक व्यक्तिगत संस्कार नहीं है बल्कि यह एक महान जमावड़ा है जो पूरे विश्व के मुसलमानों की उपस्थिति से सामने आता है और इस्लाम की रक्षा तथा मुसलमानों की सुदृढ़ता में इसके अनेक लाभ हैं।
    ईश्वर की याद और अपने मन से उसके अतिरिक्त हर किसी या हर वस्तु को निकाल देना हज तथा अन्य इस्लामी उपासनाओं का मुख्य पाठ है।
    काबे के निकट मुसलमानों के विशाल सम्मेलन में इस्लामी देशों की दरिद्रता को समाप्त करने के लिए विशेष कार्यक्रम होने चाहिए।
    आइये अब सूरए हज की उनतीसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    ثُمَّ لْيَقْضُوا تَفَثَهُمْ وَلْيُوفُوا نُذُورَهُمْ وَلْيَطَّوَّفُوا بِالْبَيْتِ الْعَتِيقِ (29)
    फिर (हाजियों को मिना में क़ुरबानी के संस्कार के बाद) चाहिए कि अपनी अपवित्रताओं को दूर करें और अपनी मन्नतों को पूरा करें और इस प्राचीन घर का तवाफ़ अर्थात परिक्रमा करें। (22:29)
    जैसा कि हज के संस्कारों में कहा गया है, हाजियों को जानवर की क़ुरबानी के पश्चात अपने बालों को मुंडवाना चाहिए या नाख़ून काटने चाहिए ताकि शारीरिक गंदगी से पवित्र हो जाएं। इसके बाद उन्हें हज का विशेष वस्त्र एहराम उतार कर मक्के की ओर रवाना हो जाना चाहिए ताकि काबे का पुनः तवाफ़ करने के लिए तैयार हो जाएं।
    चूंकि बहुत से लोग यह मन्नत मानते हैं कि यदि वे हज के संस्कार पूरे कर लेंगे तो जानवर की क़ुरबानी करेंगे या दान करेंगे तो यह आयत उस मन्नत को पूरा किए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहती है कि अब जब तुम हज के संस्कार पूरे करने में सफल हो गए हो तो अपनी मन्नत को मत भूलो और यथाशीघ्र उसे पूरा करो।
    इस आयत से हमने सीखा कि शरीर से गंदगी को पवित्र करना, हज के संस्कार का एक भाग है जैसा कि नमाज़ आरंभ करने की शर्त यह है कि शरीर गंदगी से पवित्र हो। इससे पता चलता है कि इस्लाम शरीर की पवित्रता और स्वास्थ्य पर कितना ध्यान देता है।
    ईश्वर का घर, एक अत्यंत प्राचीन घर है जो किसी के भी स्वामित्व में नहीं है और वह मनुष्य के स्वामित्व से परे है।
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