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    सूरए हज, आयतें 30-34, (कार्यक्रम 597)

    सूरए हज, आयतें 30-34, (कार्यक्रम 597)
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    आइये पहले सूरए हज की तीसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    ذَلِكَ وَمَنْ يُعَظِّمْ حُرُمَاتِ اللَّهِ فَهُوَ خَيْرٌ لَهُ عِنْدَ رَبِّهِ وَأُحِلَّتْ لَكُمُ الْأَنْعَامُ إِلَّا مَا يُتْلَى عَلَيْكُمْ فَاجْتَنِبُوا الرِّجْسَ مِنَ الْأَوْثَانِ وَاجْتَنِبُوا قَوْلَ الزُّورِ (30)
    (हज के) इन (संस्कारों) का ध्यान रखो और जो कोई ईश्वर द्वारा निर्धारित वर्जनाओं को बड़ा समझे तो यह उसके पालनहार के निकट उसी के लिए बेहतर है। और तुम्हारे लिए सभी चौपायों को (खाना) हलाल किया गया है सिवाय उनके जिनके (वर्जित होने) बारे में तुम्हें बताया जाता है। तो मूर्तियों की अपवित्रता से बचो और बुरी बातों से (भी) दूर रहो। (22:30)
    इससे पहले हज के संस्कारों और आदेशों के एक भाग का वर्णन किया गया। यह आयत कहती है कि ये संस्कार ईश्वर की ओर से अनिवार्य किए गए हैं और इनका सम्मान करना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त मक्का नगर, मस्जिदुल हराम और काबे का भी जिनका विशेष सम्मान है और उस सम्मान का पालन किया जाना चाहिए और उनके संबंध में हर प्रकार के अनादर से दूर रहना चाहिए।
    आगे चल कर आयत ईश्वर की ओर से हलाल अर्थात वैध और हराम अर्थात वर्जित की गई कुछ वस्तुओं का उल्लेख करते हुए गंदगियों से बचने की सिफ़ारिश करती है। आयत खाने पीने की वर्जित वस्तुओं जैसी भौतिक अपवित्रताओं और अनेकेश्वरवाद, मूर्ति पूजा तथा ग़लत बात जैसी आध्यात्मिक अपवित्रताओं से दूर रहने को कहती है।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के आदेशों को, ईश्वरीय सीमा समझना चाहिए और उनके सटीक पालन द्वारा उनका सम्मान करना चाहिए।
    हर वह बात और कथन जो बुद्धि व ईश्वरीय संदेश वहि के अनुकूल न हो, ग़लत व अनुचित है और ईमान वाले व्यक्ति को उससे दूर रहना चाहिए। चाहे वह झूठ व पीठ पीछे की जाने वाली बुराई हो, झूठी गवाही हो या गाना बजाना हो।
    आइये अब सूरए हज की इकतीसवीं और बत्तीसवीं आयतों की तिलावत सुनें।
    حُنَفَاءَ لِلَّهِ غَيْرَ مُشْرِكِينَ بِهِ وَمَنْ يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَكَأَنَّمَا خَرَّ مِنَ السَّمَاءِ فَتَخْطَفُهُ الطَّيْرُ أَوْ تَهْوِي بِهِ الرِّيحُ فِي مَكَانٍ سَحِيقٍ (31) ذَلِكَ وَمَنْ يُعَظِّمْ شَعَائِرَ اللَّهِ فَإِنَّهَا مِنْ تَقْوَى الْقُلُوبِ (32)
    (हज के संस्कार को) इस प्रकार (अदा करो) कि ईश्वर ही के लिए रहे और किसी को उसका समकक्ष न ठहराओ कि जो कोई किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराता है तो मानो वह आकाश से गिर पड़ा हो तो उसे पक्षी उचक ले जाएँ या वायु उसे किसी दूरवर्ती स्थान पर फेंक दे। (22:31) तो इन बातों का ध्यान रहे और जो कोई ईश्वर की निशानियों का सम्मान करे तो निसंदेह यह बात हृदयों (में ईश्वर) के भय (के चिन्हों) में से है। (22:32)
    ये आयतें एक बार फिर हज के एकेश्वरवादी संस्कारों में हर प्रकार के अनेकेश्वरवादी कार्य से बचने पर बल देते हुए कहती हैं कि अपने कर्मों को पूरी निष्ठा के साथ केवल ईश्वर के लिए करो कि यह वही ईश्वरीय प्रवृत्ति है जो सभी मनुष्यों में रखी गई है। आयतें कहती हैं कि मनुष्य को हर उस कार्य से बचना चाहिए जो ईश्वरीय न हो।
    आगे चल कर आयतें एक अत्यंत स्पष्ट उपमा देते हुए कहती हैं कि जिस व्यक्ति का कार्य ईश्वर के लिए पूर्ण निष्ठा के साथ नहीं होता वह उस व्यक्ति की भांति है जो आकाश से गिर रहा हो। वह या तो गिद्धों का भोजन बन जाता है और यदि उनसे बच जाता है तो तेज़ हवा उसे जहां चाहती है, गिरा देती है।
    जी हां, एकेश्वरवाद, ईश्वर की ओर बढ़ने और ऊपर उठने के समान है जबकि अनेकेश्वरवाद, ईश्वरीय दया के आकाश से अज्ञानता, फूट और पथभ्रष्टता की कड़ी धरती पर गिरने जैसा है। जो ईश्वर की शरण में जाता है और उससे डरता रहता है वह हर प्रकार की पथभ्रष्टता से सुरक्षित रहता है और जो ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य पर भरोसा करता है वह सदैव ही पतन के ख़तरे में ग्रस्त रहता है।
    अलबत्ता ईश्वर से भय के विभिन्न चरण हैं जिनमें से एक हार्दिक भय है कि जो ईश्वर के अतिरिक्त जो कुछ भी है उसे दिल से बाहर निकाल देता है और मनुष्य को ब्रह्मांड के रचयिता ईश्वर के समक्ष पूरी निष्ठा के साथ नतमस्तक कर देता है, इस प्रकार से कि वह हर उस वस्तु का सम्मान करता है जो ईश्वर से संबंधित हो।
    इन आयतों से हमने सीखा कि हम ईश्वर के अतिरिक्त जिस शक्ति का भी सहारा लें उसका अंजाम पतन है चाहे वह बड़ी शक्ति ही क्यों न हो।
    काम का छोटा या बड़ा होना महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि नीयत में निष्ठा का होना महत्वपूर्ण है। यदि ईश्वर के घर की परिक्रमा भी निष्ठा के साथ न की जाए तो वह न केवल यह कि प्रगति का कारण नहीं है बल्कि पतन का कारक बन जाती है।
    एकेश्वरवाद एवं निष्ठा की रस्सी को मज़बूती से थामे रहने से मनुष्य आंतरिक इच्छाओं के तूफ़ान और बाहरी घटनाओं से सुरक्षित रहता है और उसे शांति व सुरक्षा प्राप्त होती है जबकि अनेकेश्वरवाद आंतरिक बेचैनी और बाहरी असुरक्षा का कारण है।
    आइये अब सूरए हज की तैंतीसवीं और चौंतीसवीं आयतों की तिलावत सुनें।
    لَكُمْ فِيهَا مَنَافِعُ إِلَى أَجَلٍ مُسَمًّى ثُمَّ مَحِلُّهَا إِلَى الْبَيْتِ الْعَتِيقِ (33) وَلِكُلِّ أُمَّةٍ جَعَلْنَا مَنْسَكًا لِيَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَى مَا رَزَقَهُمْ مِنْ بَهِيمَةِ الْأَنْعَامِ فَإِلَهُكُمْ إِلَهٌ وَاحِدٌ فَلَهُ أَسْلِمُوا وَبَشِّرِ الْمُخْبِتِينَ (34)
    उन (क़ुरबानी के जानवरों) में तुम्हारे लिए (ज़िबह के) नियत समय तक फ़ायदे है। फिर उन (को ज़िबह करने) का स्थान उस प्राचीन घर (काबे) के पास है। (22:33) और हमने प्रत्येक समुदाय के लिए क़ुरबानी की एक विधि रखी है ताकि वे उन जानवरों पर ईश्वर का नाम लें जो उसने उन्हें प्रदान किए हैं। तो (जान लो कि) तुम्हारा पूज्य अनन्य ईश्वर ही है अतः उसी का आज्ञापालन करो और (हे पैग़म्बर!) विनम्रता अपनाने वालों को शुभ सूचना दे दीजिए। (22:34)
    क़ुरआने मजीद की व्याख्याओं में वर्णित है कि मुसलमानों का एक गुट, क़ुरबानी के लिए लाए गए जानवरों के दूध के प्रयोग या उन पर सवारी को वैध नहीं समझता था जबकि ईश्वर ने इस संबंध में कोई आदेश नहीं दिया है। वे अपनी इच्छा से यह काम करते थे और उसे धर्म से संबंधित करने का प्रयास करते थे।
    आयत क्रमांक तैंतीस इस अंधविशवास का विरोध करते हुए कहती है कि ज़िबह करने का समय आने तक क़ुरबानी की चीज़ों से लाभान्वित होना वैध है। दूसरे शब्दों में जिस जानवर को क़ुरबान किया जा रहा है वह ज़िबह से पहले तक अन्य चौपायों की भांति अपने मालिक के अधिकार में रहता है।
    अगली आयत एक मूल सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहती है कि एक उपासना के रूप में क़ुरबानी की परंपरा सभी धर्मों में प्रचलित रही है किंतु अनेकेश्वरवादियों ने इस कार्य को अंधविश्वास से जोड़ दिया था और वे जानवर की क़ुरबानी करते समय मूर्तियों का नाम लेते थे जबकि क़ुरबानी, ईश्वर के मार्ग में मनुष्य के क़ुरबान होने का प्रतीक है अलबत्ता इसके परिणाम स्वरूप दरिद्रों और वंचितों की भी सहायता हो जाती है।
    आगे चल कर आयत ईश्वरीय आदेशों के समक्ष निष्ठा के साथ नतमस्तक रहने पर बल देती है और पैग़म्बरे इसलाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से कहती है कि वे ईश्वर के लिए निष्ठा के साथ कर्म करने वालों को शुभ सूचना दे दें।
    इन आयतों से हमने सीखा कि धार्मिक आदेशों के पालन में अपनी व्यक्तिगत रुचियों को प्रविष्ट नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे धर्म में अंधविश्वास फैलने का मार्ग प्रशस्त होता है।
    ईमान वाले व्यक्ति के सभी कर्म न केवल यह कि ईश्वर के नाम से और केवल उसी के लिए होते हैं बल्कि उसके शरीर का आहार भी ऐसा मांस होना चाहिए जिस पर ईश्वर का नाम लिया गया हो।
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