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    सूरए हज, आयतें 35-38, (कार्यक्रम 598)

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    आइये पहले सूरए हज की पैंतीसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    الَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَالصَّابِرِينَ عَلَى مَا أَصَابَهُمْ وَالْمُقِيمِي الصَّلَاةِ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَ (35)
    ये वे लोग है कि जब ईश्वर को याद किया जाता है तो उनके दिल दहल जाते है और जो मुसीबत उन पर आती है उस पर धैर्य से काम लेते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से दान करते है (22:35)
    इससे पहले हमने कहा था कि ईश्वर ने अपने पैग़म्बर को दायित्व सौंपा था कि वे उन लोगों को शुभ सूचना दे दें जो ईश्वरीय आदेशों के सामने विनम्र रहते हैं। यह आयत इन लोगों की आत्मिक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहती है कि वे सदैव धार्मिक दायित्वों के पालन में कमी की ओर से चिंतित एवं भयभीत रहते हैं और ईश्वर के नाम की महानता और उसके आदेश उनके अस्तित्व पर इस प्रकार छा जाते हैं कि उनके दिल दहल जाते हैं और वे कांपने लगते हैं।
    स्वाभाविक है कि ये लोग अपनी सबसे महत्वपूर्ण उपासना अर्थात नमाज़ के संबंध में किसी प्रकार की कोई ढिलाई नहीं करते और सदैव नमाज़ क़ायम करते हैं। ये लोग अपने सामाजिक जीवन में, जो विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों और समस्याओं से भरा होता है, अत्यधिक धैर्य व संयम से काम लेते हैं। जितनी भी बड़ी समस्या और कड़ी कठिनाई हो वे शांत व संतुष्ट रहते हैं और ईश्वर के प्रति अकृतज्ञता नहीं जताते। अलबत्ता वे वंचितों व दरिद्रों की समस्याओं व कठिनाइयों के बारे में लापरवाह नहीं रहते बल्कि अपनी क्षमता भर और अपनी संभावनाओं के अनुसार उनकी सहायता करते हैं।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर का भय, सभी मानवीय परिपूर्णताओं का मार्ग प्रशस्त करता है और मनुष्य के भीतर धैर्य व प्रतिरोध की भावना को सुदृढ़ करता है।
    ईश्वर से संपर्क, लोगों तथा वंचितों से संपर्क से अलग नहीं है। ईमान वाला व्यक्ति समाज से कटा हुआ नहीं होता बल्कि वह समाज में रह कर अपने हिस्से के दायित्वों का निर्वाह करता है।
    आइये अब सूरए हज की छत्तीसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    وَالْبُدْنَ جَعَلْنَاهَا لَكُمْ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ لَكُمْ فِيهَا خَيْرٌ فَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَيْهَا صَوَافَّ فَإِذَا وَجَبَتْ جُنُوبُهَا فَكُلُوا مِنْهَا وَأَطْعِمُوا الْقَانِعَ وَالْمُعْتَرَّ كَذَلِكَ سَخَّرْنَاهَا لَكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ (36)
    और हमने (क़ुरबानी के लिए) हट्टे-कट्टे ऊँटों को तुम्हारे लिए ईश्वर की निशानियों में से बनाया है जिनमें तुम्हारे लिए भलाई (और बरकत) है। तो (क़ुरबानी के समय) उन पर ऐसी स्थिति में ईश्वर का नाम लो कि जब वे खड़े हों फिर जब उनके पहलू ज़मीन से आ लगें (और उनकी जान निकल जाए) तो उनमें से स्वयं भी खाओ और ईश्वर के दिए पर संतोष करने वालों तथा माँगने वालों को भी खिलाओ। हाँ, हमने उन (जानवरों) को तुम्हारे लिए इस प्रकार वशीभूत कर दिया है ताकि शायद तुम कृतज्ञ रहो। (22:36)
    यह आयत एक बार फिर हज के संस्कारों और क़ुरबानी के विषय की ओर संकेत करते हुए कहती है कि क़ुरबानी के लिए चुने जाने वाले हट्टे-कट्टे ऊंट, एक ओर तो ईश्वर के आदेश के समक्ष मनुष्य के नतमस्तक होने का चिन्ह हैं और दूसरी ओर इनसे समाज के दरिद्र व वंचित लोगों की भी सहायता होती है। अलबत्ता दरिद्र दो प्रकार के होते हैं। एक वे होते हैं जो ज़बान से अपनी आवश्यकता बयान कर देते हैं जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो आत्म सम्मान के कारण मौन धारण किए रहते हैं और कुछ मांगते नहीं हैं। ईमान वाले, इन दोनों गुटों के संबंध में उत्तरदायी हैं।
    आगे चल कर आयत ऊंट जैसे बड़े जानवरों के मनुष्य के अधीन रहने की ओर संकेत करते हुए इसे ईश्वर की अनुकंपाओं और कृपाओं में से एक बताती है और कहती है कि इसके लिए मनुष्य को अपने पालनहार का कृतज्ञ रहना चाहिए।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय चिन्हों के सम्मान के लिए दिल खोल कर ख़र्च करना चाहिए। यद्यपि क़ुरबानी के लिए भेड़ बकरी इत्यादि जैसे जानवरों को ज़िबह करना भी पर्याप्त है किंतु क़ुरआने मजीद ऊंटों की क़ुरबानी पर भी बल देता है और वह भी हट्टे-कट्टे ऊंट।
    क़ुरआने मजीद में जहां कहीं भी कुलू अर्थात खाओ कह कर खाने का आदेश दिया गया है उसी के साथ सदैव ही एक अन्य आदेश भी दिया गया है, जैसे खाओ किंतु अपव्यय न करो, खाओ और दूसरों को भी खिलाओ, खाओ और भले कर्म करो, खाओ और कृतज्ञ रहो।
    आइये अब सूरए हज की सैंतीसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    لَنْ يَنَالَ اللَّهَ لُحُومُهَا وَلَا دِمَاؤُهَا وَلَكِنْ يَنَالُهُ التَّقْوَى مِنْكُمْ كَذَلِكَ سَخَّرَهَا لَكُمْ لِتُكَبِّرُوا اللَّهَ عَلَى مَا هَدَاكُمْ وَبَشِّرِ الْمُحْسِنِينَ (37)
    (क़ुरबानी के) उन (जानवरों) का न तो माँस ईश्वर को पहुँचता है और न उनका रक्त। बल्कि जो बात उस तक पहुंचती है वह तुम्हारा ईश्वरीय भय है। इस प्रकार उसने उन (जानवरों) को तुम्हारे वशीभूत कर दिया है ताकि तुम उसके मार्गदर्शन पर कृतज्ञता स्वरूप ईश्वर की बड़ाई बयान करो और (हे पैग़म्बर!) भले कर्म करने वालों को शुभ सूचना दे दीजिए (22:37)
    यह आयत क़ुरबानी के मूल उद्देश्य की ओर संकेत करते हुए कहती है कि यद्यपि वंचित व दरिद्र लोग, क़ुरबानी के मांस से लाभान्वित होते हैं किंतु इसका मूल लक्ष्य पेट भरना नहीं बल्कि मायामोह को त्यागना और ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होना है क्योंकि क़ुरबानी, ईश्वर के मार्ग में त्याग और बलिदान व शहादत के लिए तैयारी का प्रतीक है।
    चूंकि प्राचीन काल से यह परंपरा थी कि क़ुरबानी के ख़ून को मूर्तियों के पैरों में डाला जाता था अतः यह आयत कहती है कि ईश्वर को न तो क़ुरबानी के मांस की आवश्यकता है और न ही उसके ख़ून की बल्कि लक्ष्य, लोगों में ईश्वर की उपासना और उससे भय की भावना को सुदृढ़ करना है।
    आयत के अंत में क़ुरबानी करने को एक प्रकार की भलाई बताते हुए पैग़म्बर को दायित्व सौंपा गया है कि वे भले कर्म करने वालों को शुभ सूचना दे दें।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर को हमारी उपासनाओं की कोई आवश्यकता नहीं है बल्कि उसकी ओर से दिया जाने वाला हर आदेश, मनुष्य की प्रगति व परिपूर्णता तथा ईश्वर से सामिप्य प्राप्त करने का एक माध्यम है।
    मार्गदर्शन की अनुकंपा, उन अनुकंपाओं में से है जिसके लिए सदैव ही ईश्वर का कृतज्ञ रहना चाहिए और उसके कारण सदैव ईश्वर की बड़ाई करनी चाहिए।
    आइये अब सूरए हज की अड़तीसवीं आयत की तिलावत सुनें।
    إِنَّ اللَّهَ يُدَافِعُ عَنِ الَّذِينَ آَمَنُوا إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ خَوَّانٍ كَفُورٍ (38)
    निश्चित रूप से ईश्वर उन लोगों की प्रतिरक्षा करता है जो ईमान लाए हैं। निसंदेह ईश्वर किसी विश्वासघाती अकृतज्ञ को पसन्द नहीं करता। (22:38)
    हज के कुछ आदेशों व संस्कारों के वर्णन और लोगों में ईश्वर के भय और उसके समक्ष नतमस्तक रहने की भावना को सुदृढ़ बनाने पर बल देने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि ईश्वर के मार्ग पर डटे रहने और पथभ्रष्टताओं एवं अंधविश्वासों से मुक़ाबला करने से स्वाभाविक रूप से काफ़िर क्रोधित होंगे और वे अपनी ज़बान और व्यवहार से मुसलमानों का मुक़ाबला करने के लिए उठ खड़े होंगे किंतु ईमान वालों को ईश्वर की सहायता प्राप्त है और वह शत्रुओं के मुक़ाबले में उनकी रक्षा करेगा।
    आयत के अंत में कहा गया है कि ईश्वर विश्वासघात करने वालों और उसके द्वारा प्रदान की गई अनुकंपाओं पर कृतज्ञता न जताने वाले काफ़िरों को पसंद नहीं करता।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वाले, चाहे उनकी संख्या कम ही क्यों न हो और चाहे उनके पास कोई शरण न भी हो तब भी वे बिना रक्षक के नहीं हैं। ईश्वर ने वचन दिया है कि वह उनकी सहायता करेगा।
    ईश्वर, ईमान वालों को पसंद करता है जबकि काफ़िर उसके कोप का पात्र बनते हैं। स्वाभाविक सी बात है कि ईश्वर अपने मित्रों को नहीं भूलता।
    ईश्वर का इन्कार, उसके द्वारा प्रदान की गई अनुकंपाओं के प्रति एक प्रकार की अकृतज्ञता और उसके तथा उसके पैग़म्बर के साथ विश्वासघात है।
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