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    सूरए हज, आयतें 39-45, (कार्यक्रम 599)

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    आइये पहले सूरए हज की 39वीं और 40वीं आयतों की तिलावत सुनें।
    أُذِنَ لِلَّذِينَ يُقَاتَلُونَ بِأَنَّهُمْ ظُلِمُوا وَإِنَّ اللَّهَ عَلَى نَصْرِهِمْ لَقَدِيرٌ (39) الَّذِينَ أُخْرِجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ بِغَيْرِ حَقٍّ إِلَّا أَنْ يَقُولُوا رَبُّنَا اللَّهُ وَلَوْلَا دَفْعُ اللَّهِ النَّاسَ بَعْضَهُمْ بِبَعْضٍ لَهُدِّمَتْ صَوَامِعُ وَبِيَعٌ وَصَلَوَاتٌ وَمَسَاجِدُ يُذْكَرُ فِيهَا اسْمُ اللَّهِ كَثِيرًا وَلَيَنْصُرَنَّ اللَّهُ مَنْ يَنْصُرُهُ إِنَّ اللَّهَ لَقَوِيٌّ عَزِيزٌ (40)
    जिन लोगों पर अत्याचारपूर्ण ढंग से आक्रमण किया जाता है उन्हें प्रतिरक्षा की अनुमति दी गई और निश्चय ही ईश्वर उनकी सहायता का पूरा सामर्थ्य रखता है। (22:39) ये वही लोग हैं जिन्हें उनके घरों से (बिना किसी अपराध के) नाहक़ निकाल दिया गया है केवल इसलिए कि वे कहते है कि ईश्वर हमारा पालहनार है। और यदि ईश्वर लोगों (के अत्याचारों) को एक-दूसरे के द्वारा दूर न करता रहता तो गिरजा घर, यहूदियों के उपासना स्थल, मजूसियों के प्रार्थना स्थल और मस्जिदें, जिनमें ईश्वर का बहुत अधिक नाम लिया जाता है, सब ध्वस्त कर दी जातीं। और ईश्वर अवश्य ही उसकी सहायता करेगा, जो उस (के धर्म) की सहायता करेगा कि निश्चय ही ईश्वर अत्यंत शक्तिशाली और अजेय है। (22:40)
    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने तेरह वर्षों तक मक्का नगर के लोगों को मूर्तिपूजा व अनेकेश्वरवाद के स्थान पर अनन्य ईश्वर की उपासना का निमंत्रण दिया। इस दौरान बहुत सी महिलाओं और पुरुषों ने इस्लाम स्वीकार किया किंतु उन लोगों को सदैव ही क़ुरैश के बड़े लोगों की यातनाएं सहन करनी पड़ती थीं तथा उनमें से अनेक लोग तो शहीद हो जाते थे।
    अनेकेश्वरवादियों का यह हिंसक व्यवहार तब तक जारी रहा जब तक पैग़म्बरे इस्लाम और उनके साथी व अनुयाई अपने घरों को छोड़ कर मदीना नगर पलायन पर विवश नहीं हो गए। मदीना नगर में मुसलमानों के पलायन तथा वहां उनकी शक्ति में वृद्धि के पश्चात ईश्वर ने ये आयतें भेज कर उन्हें अनुमति दी कि वे अनेकेश्वरवादियों के हर प्रकार के आक्रमण और कार्यवाही के मुक़ाबले में डट जाएं और अपनी जान व माल की रक्षा करें और इस बात पर भरोसा रखें कि ईश्वर उनकी सहायता करेगा।
    इन आयतों के अनुसार धार्मिक केंद्रों को काफ़िरों के आक्रमण से सुरक्षित रखना सभी आसमानी धर्मों के अनुयाइयों का दायित्व है और यह किसी एक धर्म से विशेष नहीं है। जब मुसलमानों को, काफ़िरों के हमलों से यहूदियों व ईसाइयों के धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए कहा गया है तो निश्चित रूप से उन्हें इस बात का भी अधिकार नहीं है कि वे आसमानी किताब रखने वालों से युद्ध के दौरान उनके धार्मिक स्थलों पर आक्रमण करें या उन्हें क्षति पहुंचाएं।
    इन आयतों से हमने सीखा कि जिस राष्ट्र और जाति पर अत्याचार किया जाता है उसे इस बात का अधिकार प्राप्त है कि वह अपने शत्रु से संघर्ष करके उससे अपना अधिकार ले।
    ईश्वर ने ईमान वालों की सहायता का वचन दिया है किंतु इसकी शर्त यह है कि ईमान वाले भी ईश्वरीय धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहें।
    देश प्रेम, मनुष्य का एक स्वाभाविक अधिकार है और इस अधिकार को छीनना, अत्याचार का स्पष्ट उदाहरण है।
    शत्रु, धार्मिक केंद्रों को तबाह कर देना चाहता है क्योंकि ये केंद्र सदैव लोगों को ईश्वर की याद दिलाते हैं और उन्हें अत्याचार सहन करने से रोकते हैं।
    आइये अब सूरए हज की 41वीं आयत की तिलावत सुनें।
    الَّذِينَ إِنْ مَكَّنَّاهُمْ فِي الْأَرْضِ أَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآَتَوُا الزَّكَاةَ وَأَمَرُوا بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَوْا عَنِ الْمُنْكَرِ وَلِلَّهِ عَاقِبَةُ الْأُمُورِ (41)
    ये वही लोग हैं कि यदि हम उन्हें धरती में सत्ता प्रदान करें तो वे नमाज़ क़ायम करेंगे, ज़कात देंगे, भलाई का आदेश देंगे और बुराई से रोकेंगे और सभी मामलों का अंजाम तो ईश्वर ही के हाथ में है (22:41)
    यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अनुयाइयों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए, जो ईश्वरीय धर्म के प्रसार में उनकी सहायता करते हैं, कहती है कि वे अन्य क्षेत्रों पर अधिकार के लिए जेहाद नहीं करते बल्कि उनका लक्ष्य ईश्वरीय धर्म और ईश्वरीय शिक्षाओं को स्थापित करना है जिनमें नमाज़, ज़कात, भलाइयों का आदेश देना और बुराइयों से रोकना सबसे ऊपर हैं। नमाज़, ईश्वर से लोगों के संपर्क के लिए, ज़कात, लोगों तथा वंचितों के बीच संबंध के लिए और भलाइयों का आदेश देना और बुराइयों से रोकना, स्वस्थ और ठोस समाज के निर्माण के लिए है।
    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनों में कहा गया है कि इस आयत का एक स्पष्ट उदाहरण, संसार के अंतिम समय में इमाम महदी अलैहिस्सलाम का शासन होगा। ईश्वर उन्हें संसार के पूरब व पश्चिम में विजयी बना कर उनकी सत्ता स्थापित करेगा, उनके माध्यम से अपने धर्म को जीवित और स्थायित्व प्रदान करेगा तथा धरती से अत्याचार को समाप्त कर देगा।
    इस आयत से हमने सीखा कि यदि सत्ता व शक्ति भले लोगों व ईमान वालों के नियंत्रण में रहे तो वे उसे लोगों की सेवा और ईश्वर की बंदगी के सही मार्ग पर ले आएंगे।
    भले शासक, लोगों की आध्यात्मिक प्रगति के विचार में भी रहते हैं और उनके भौतिक व आर्थिक आराम के बारे में प्रयास करते हैं।
    धर्म, एक व्यक्तिगत मामला नहीं है बल्कि समाज की आवश्यकताओं पर ध्यान और सामाजिक बुराइयों के संबंध में उचित व्यवहार, ईमान वालों के धार्मिक कर्तव्यों में शामिल है।
    आइये अब सूरए हज की 42वीं, 43वीं और 44वीं आयतों की तिलावत सुनें।
    وَإِنْ يُكَذِّبُوكَ فَقَدْ كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍ وَعَادٌ وَثَمُودُ (42) وَقَوْمُ إِبْرَاهِيمَ وَقَوْمُ لُوطٍ (43) وَأَصْحَابُ مَدْيَنَ وَكُذِّبَ مُوسَى فَأَمْلَيْتُ لِلْكَافِرِينَ ثُمَّ أَخَذْتُهُمْ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ (44)
    और (हे पैग़म्बर!) यदि ये आपको झुठलाते है तो इनसे पहले नूह की जाति, आद और समूद (जैसी जातियां) भी (अपने पैग़म्बरों को) झुठला चुकी हैं। (22:42) और इब्राहीम की जाति और लूत की जाति (ने भी ऐसा ही किया था) (22:43) और मदयन वाले भी (झुठला चुके हैं) और मूसा को भी झुठलाया जा चुका है। तो मैंने इन्कार करने वालों को मोहलत दी फिर उन्हें दबोच लिया। तो (देखिए कि) मेरा दंड कैसा था? (22:44)
    जेहाद और प्रतिरक्षा से संबंधित आयतों के उल्लेख के बाद क़ुरआने मजीद इस आयत में पिछली जातियों द्वारा अपने पैग़म्बरों के संबंध में अपनाए गए व्यवहार की ओर संकेत करता है ताकि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके अनुयाइयों को सांत्वना मिले और वे जान लें कि मक्के के अनेकेश्वरवादियों ने उनके लिए जो समस्याएं और कठिनाइयां उत्पन्न की हैं वैसी ही कठिनाइयां पिछले पैग़म्बरों के अनुयाइयों के लिए भी रही हैं। अलबत्ता ईश्वर ने ईमान वालों की सहायता करते हुए उनके शत्रुओं को अपने कोप का पात्र बनाया। यह उसी ईश्वरीय सहायता का एक उदाहरण है जिसका वादा ईश्वर ने ईमान वालों से किया है।
    जी हां! जिस प्रकार से विरोध और रुकावटें पैग़म्बरों तथा उनके अनुयाइयों को ईश्वर के मार्ग पर चलने से न रोक सकीं उसी प्रकार मुसलमानों को भी अपने भीतर ढिलाई नहीं आने देनी चाहिए और उन्हें ईश्वरीय धर्म की सहायता नहीं रोकनी चाहिए बल्कि अधिक दृढ़ता के साथ इस मार्ग पर डटे रहना चाहिए और अपनी जान व माल न्योछावर करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए।
    इन आयतों से हमने सीखा कि पिछली जातियों व समुदायों के इतिहास का अध्ययन, आगामी पीढ़ियों के लिए पाठ और शिक्षा सामग्री है।
    ईश्वर अत्याचारियों को मोहलत देता है किंतु उन्हें छोड़ नहीं देता बल्कि जब भी वह उचित समझता है उन्हें दंडित करता है।
    आइये अब सूरए हज की 45वीं आयत की तिलावत सुनें।
    فَكَأَيِّنْ مِنْ قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا وَهِيَ ظَالِمَةٌ فَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلَى عُرُوشِهَا وَبِئْرٍ مُعَطَّلَةٍ وَقَصْرٍ مَشِيدٍ (45)
    तो कितनी ही बस्तियाँ थीं जिन्हें हमने विनष्ट कर दिया क्योंकि वे अत्याचारी थीं तो वे अपनी छतों पर गिरी पड़ी हैं और (उनकी तबाही के कारण) कितने ही कुएँ उजड़े पड़े हैं और कितने मज़बूत महल ढहे हुए हैं। (22:45)
    पिछली आयत में एक मूल सिद्धांत के रूप में अत्याचारियों को संसार में दंडित किए जाने पर बल दिया गया था। यह आयत कहती है कि यदि तुम संसार के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा करो तो देखोगे कि पिछले राजाओं और शासकों के महल, बिना छत के केवल कुछ ऊंचे खंभों और खंडहर के रूप में बाक़ी बचे हुए हैं और जो लोग एक समय बड़े अहंकार और अत्याचार के साथ शासन किया करते थे अब उनका नाम व निशान तक बाक़ी नहीं बचा है। उनकी सत्ता को उनके अत्याचारों के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु ने समाप्त नहीं किया।
    इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों पर अत्याचार का अंत भला नहीं होता और अत्याचारी का नाम व निशान तक मिट जाता है।
    ईश्वर के कोप के समक्ष, मज़बूत से मज़बूत इमारत भी धराशायी हो जाती है अतः हमें इस प्रकार की चीज़ों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
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