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    सूरए हज, आयतें 58-62, (कार्यक्रम 602)

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    आइये पहले सूरए हज की आयत क्रमांक 58 और 59 की तिलावत सुनें।
    وَالَّذِينَ هَاجَرُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ ثُمَّ قُتِلُوا أَوْ مَاتُوا لَيَرْزُقَنَّهُمُ اللَّهُ رِزْقًا حَسَنًا وَإِنَّ اللَّهَ لَهُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ (58) لَيُدْخِلَنَّهُمْ مُدْخَلًا يَرْضَوْنَهُ وَإِنَّ اللَّهَ لَعَلِيمٌ حَلِيمٌ (59)
    और जिन लोगों ने ईश्वर के मार्ग में घर-बार छोड़ा (और) फिर मारे गए या मर गएतो ईश्वर अवश्य ही उन्हें भली आजीविका प्रदान करेगा। और निःसंदेह ईश्वर ही सर्वोत्तम आजीविका प्रदान करने वाला है। (22:58) निश्चय ही वह उन्हें ऐसे स्थान में प्रवेश कराएगा जिससे वे प्रसन्न हो जाएँगे और निःसंदेह ईश्वर सर्वज्ञानी व अत्यन्त सहनशील है। (22:59)
    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा धर्म के समर्थन के कारण मक्के से मदीना पलायन करने वाले मुसलमानों में से कुछ लोग स्वाभाविक मौत मर गए जबकि कुछ अन्य युद्धों में शहीद हुए। कुछ लोग केवल शहीदों के दर्जों को ही उच्च मानते थे और इस्लाम के लिए अपना घर-बार छोड़ने वालों को महत्व व सम्मान नहीं देते थे।
    यह आयत इस प्रकार के विचार व व्यवहार को नकारते हुए कहती है कि जो कोई ईश्वर के लिए अपनी बस्ती, अपने नगर, अपने देश और अपने घर-बार को छोड़ कर पलायन कर जाए, ईश्वर के निकट उसका उच्च स्थान है और प्रलय में उसे विशेष ईश्वरीय अनुकंपाएं प्रदान की जाएंगी, चाहे वह शहीद हो या स्वाभाविक रूप से उसकी मृत्यु हो जाए।
    जी हां! जिन लोगों ने इस संसार में अपने घर के सुख चैन को त्याग दिया और अपने धर्म व ईमान की रक्षा के लिए उन्हें देश निकाला दे दिया गया या फिर वे स्वयं ही पलायन करने पर विवश हो गए, ईश्वर प्रलय में उन्हें स्वर्ग में ऐसा स्थान प्रदान करेगा जो उनके बलिदान की क्षतिपूर्ति करते हुए उन्हें प्रसन्न कर देगा।
    इस आयत से हमने सीखा कि महत्वपूर्ण बात, ईश्वर के मार्ग में क़दम बढ़ाना है, अब इसका परिणाम मृत्यु के रूप में सामने आए या शहादत के रूप में यह, मनुष्य के हाथ में नहीं है।
    ईश्वर, संसार में विभिन्न चीज़ों से ईमान वालों के अभाव की स्वर्ग की अमर अनुकंपाओं के माध्यम से भरपाई कर देगा।
    अत्याचारियों के अत्याचार के कारण ईमान वालों को जो कठिनाइयां और दुख सहन करने पड़ते हैं, ईश्वर उनसे अवगत है किंतु वह उन्हें दंडित करने में संयम से काम लेता है और उसने अत्यचारी के अत्याचार पर दंड और अत्याचारग्रस्त के पारितोषिक को प्रलय तक के लिए रोक रखा है।
    आइये अब सूरए हज की आयत क्रमांक 60 की तिलावत सुनें।
    ذَلِكَ وَمَنْ عَاقَبَ بِمِثْلِ مَا عُوقِبَ بِهِ ثُمَّ بُغِيَ عَلَيْهِ لَيَنْصُرَنَّهُ اللَّهُ إِنَّ اللَّهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٌ (60)
    हाँऐसा ही है और जो कोई शत्रु को वैसा ही दंड दे जितना उसे दंडित किया गया है और फिर भी उस पर अत्याचार किया जाए तो ईश्वर अवश्य उसकी सहायता करेगा। निश्चय ही ईश्वर क्षमा करने वाला और बहुत दयावान है। (22:60)
    पिछली आयत में, ईश्वर के मार्ग में अपना घर-बार छोड़ने वालों को स्वर्ग की शुभ सूचना देने के बाद यह आयत कहती है कि ईश्वर इस संसार में भी उनका समर्थन करता है और उन्हें अपनी गुप्त सहायताओं का पात्र बनाता है। जब भी शत्रु मुसलमानों पर आक्रमण करें तो उनका दायित्व है कि प्रतिरक्षा करें और उनके मुक़ाबले में डट जाएं। अलबत्ता इस संबंध में न्याय से काम लेना चाहिए और सीमा से आगे नहीं बढ़ना चाहिए किंतु यदि न माने और अतिक्रमण जारी रखे तो फिर ईश्वर ने सहायता का वचन दिया है।
    निश्चित रूप से जो लोग अत्याचार सहन करें और अपने बचाव के लिए कोई कार्यवाही न करें तो वे ईश्वर के इस वचन के पात्र नहीं बनेंगे और उन्हें इस बात की आशा नहीं रखनी चाहिए कि प्रार्थना और दुआ करने पर ईश्वर उनकी सहायता करेगा।
    इस आयत से हमने सीखा कि अपना, अपने परिवार तथा नगर व देश का बचाव, स्वाभाविक अधिकार भी है और धार्मिक कर्तव्य भी।
    न्याय एक सर्वकालिक व सार्वभौमिक मान्यता है।
    दंड के साथ ही क्षमा, ईश्वरीय शिष्टाचार है।
    आइये अब सूरए हज की आयत क्रमांक 61 और 62 की तिलावत सुनें।
    ذَلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ يُولِجُ اللَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَيُولِجُ النَّهَارَ فِي اللَّيْلِ وَأَنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ بَصِيرٌ (61) ذَلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ هُوَ الْبَاطِلُ وَأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ (62)
    यह इस लिए है कि ईश्वर ही है जो रात को दिन में प्रविष्ट करता है और दिन को रात में प्रविष्ट करता है। और यह कि ईश्वर सुनने और देखने वाला है। (22:61) यह इस लिए है कि ईश्वर ही सत्य है और जिसे वे उसे छोड़ कर (उपासना के लिए) पुकारते हैं सब असत्य है और यह कि ईश्वर ही सर्वोच्च व महान है (22:62)
    पिछली आयत में ईश्वर ने ईमान वालों को सहायता का वचन दिया था। यह आयतें कहती हैं कि सहायता का यह वचन इस लिए है कि ईश्वर हर बात में सक्षम है और सृष्टि की व्यवस्था उसी के हाथ में है। उसी ने सूर्य के गिर्द धरती की व्यवस्थित एवं सटीक परिक्रमा द्वारा दिन व रात को अस्तित्व प्रदान किया है और एक स्पष्ट ध्रुव के निर्धारण द्वारा वह एक में कमी और दूसरे में वृद्धि करता है। विभिन्न ऋतुओं में दिन व रात का समय बदलता रहता है किंतु इनकी एक स्पष्ट व निर्धारित व्यवस्था है कि जो ईश्वर की असीम शक्ति का चिन्ह है।
    वह न केवल यह कि सृष्टि का रचयिता है बल्कि उसका पालनहार भी है और जो कुछ उसमें होता है उसे देखता व सुनता है। ऐसा नहीं है कि उसने संसार की रचना करके उसे उसकी स्थिति पर छोड़ दिया हो। वह ठोस व स्थायी सत्य है तथा उसके अतिरिक्त जो कुछ भी या जो कोई भी हो वह समाप्त होने वाला है अतः वह उपासना योग्य नहीं है। वह हर उस शक्ति से ऊपर है जिसकी कल्पना मनुष्य कर सकता है अतः वह अपने मित्रों की सहायता और शत्रुओं को दंडित कर सकता है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि सृष्टि ईश्वर के ज्ञान व शक्ति का सर्वोत्तम प्रमाण है। अतः हमें केवल उसी पर भरोसा करना चाहिए और उसी से सहायता मांगनी चाहिए।
    वास्तविक सत्य ईश्वर है और सत्य की पहचान का मानदंड वह चीज़ है जो उसकी ओर से मनुष्य के पास भेजी गई हो।
    ईश्वर ने ईमान वालों की सहायता तथा असत्य पर सत्य की विजय का वादा किया है अलबत्ता इस शर्त के साथ कि ईमान वाले अपने कर्तव्य के पालन में ढिलाई न करें।
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