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    सूरए हज, आयतें 66-71, (कार्यक्रम 604)

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    आइये पहले सूरए हज की आयत क्रमांक 67 की तिलावत सुनें।
    لِكُلِّ أُمَّةٍ جَعَلْنَا مَنْسَكًا هُمْ نَاسِكُوهُ فَلَا يُنَازِعُنَّكَ فِي الْأَمْرِ وَادْعُ إِلَى رَبِّكَ إِنَّكَ لَعَلَى هُدًى مُسْتَقِيمٍ (67)
    हमने हर समुदाय के लिए उपासना की एक शैली निर्धारित कर दी है जिसका पालन वे करते हैं। तो (हे पैग़म्बर!) इस मामले में वे आपसे न झगड़ें। और (लोगों को) अपने पालनहार की ओर बुलाते रहिए कि निःसंदेह आप सीधे मार्गदर्शन (की राह) पर हैं। (22:67)
    मक्के के अनेकेश्वरवादियों का, जो स्वयं को हज़रत इब्राहीम के धर्म का अनुयाई कहते थे और मदीने के यहूदियों का, जो स्वयं को हज़रत मूसा के धर्म का पालन कर्ता कहते थे, अलग-अलग और विशेष धार्मिक संस्कार था। चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम एक नया धर्म लेकर आए थे इस लिए वे उनका विरोध करते थे और कहते थे कि यदि आप ईश्वर के पैग़म्बर हैं तो फिर नया धर्म क्यों लेकर आए हैं और आपने हज़रत इब्राहीम व हज़रत मूसा की धार्मिक शैली क्यों छोड़ दी है?
    क़ुरआने मजीद, विरोधियों की इस प्रकार की आपत्तियों के उत्तर में कहता है कि सभी आसमानी धर्म ईश्वर की ओर से आए हैं किंतु समुदायों की परिस्थितियों और समय व स्थान की आवश्यकताओं के दृष्टिगत ईश्वर ने उनके लिए भिन्न भिन्न उपासनाएं और धार्मिक कर्तव्य निर्धारित किए हैं। इसके बावजूद सभी आसामानी धर्मों का लक्ष्य लोगों को अनन्य ईश्वर की ओर बुलाना और सीधे रास्ते की ओर उनका मार्गदर्शन करना है। वस्तुतः विभिन्न मत, एक विद्यालय की विभिन्न कक्षाओं की भांति हैं जो विद्यार्थी को क्रमशः आगे की ओर बढ़ाती रहती हैं।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने किसी भी समुदाय को बिना धर्म व सही मार्ग दिखाने वाले मत के यूं ही नहीं छोड़ दिया है बल्कि उसने उन्हें जीवन बिताने और उपासना करने का सही मार्ग भी दिखाया है।
    विरोधियों की आपत्तियां और झगड़े हमें सीधे मार्ग पर चलने या दायित्वों के पालन से विचलित न कर दें।
    पैग़म्बर, सीधे मार्ग पर चलने हेतु मनुष्य के लिए मार्गदर्शक आदर्श हैं।
    आइये अब सूरए हज की आयत क्रमांक 68 व 69 की तिलावत सुनें।
    وَإِنْ جَادَلُوكَ فَقُلِ اللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا تَعْمَلُونَ (68) اللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كُنْتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ (69)
    और यदि वे आपसे विवाद करें तो कह दीजिए कि तुम जो कुछ करते हो ईश्वर उससे अधिक अवगत है। (22:68) ईश्वर प्रलय के दिन तुम्हारे बीच उस चीज़ का फ़ैसला कर देगा जिसमें तुम विवाद करते हो। (22:69)
    पिछली आयत के क्रम को जारी रखते हुए क़ुरआने मजीद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करता है और कहता है कि यदि मतों में भिन्नता के कारणों के संबंध में आपके तर्क को विरोधी स्वीकार न करें और आपसे विवाद जारी रखें तो कह दीजिए कि ईश्वर तुम्हारी कथनी और करनी से अवगत है और प्रलय के दिन हमारे और तुम्हारे बीच फ़ैसला करेगा। तो जो विषय हमसे संबंधित नहीं है और जिसमें हमारी कोई भूमिका नहीं है, उसके बारे में इससे अधिक बात व विवाद न करो।
    इन आयतों से हमने सीखा कि बहस उस समय तक स्वीकार्य है जब तक सत्य का वर्णन होता रहे किंतु यदि कोई एक पक्ष हठधर्म के साथ अपनी बात पर अड़ा रहे तो फिर बहस को छोड़ कर उसे ईश्वर के हवाले कर देना चाहिए।
    प्रलय पर ईमान, काफ़िरों के विरोध के मुक़ाबले में ईमान वालों को आत्मिक शांति व संतोष प्रदान करता है।
    आइये अब सूरए हज की आयत क्रमांक 70 की तिलावत सुनें।
    أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ إِنَّ ذَلِكَ فِي كِتَابٍ إِنَّ ذَلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرٌ (70)
    क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि जो कुछ आकाश और धरती मैं है, ईश्वर सबसे अवगत है? निश्चय ही यह एक किताब में (लिखा हुआ) है। निःसंदेह यह कार्य ईश्वर के लिए अत्यन्त सरल है। (22:70)
    यह आयत सृष्टि की व्यवस्था के एक मूल सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ईश्वर जो आकाशों और धरती का रचयिता है, अपनी सभी रचनाओं के बारे में संपूर्ण ज्ञान रखता है और कोई भी बात उससे छिपी हुई नहीं है। लोगों की कथनी और करनी भी इस नियम से अपवाद नहीं है।
    ईश्वर लोगों के सभी कर्मों से अवगत है और प्रलय के दिन अपने इसी ज्ञान के आधार पर बंदों के बीच फ़ैसला करेगा। इसके अतिरिक्त बंदों के सभी कर्म लौहे महफ़ूज़ नामक एक किताब में भी अंकित हो रहे हैं और उसमें किसी भी चीज़ की अनदेखी नहीं की जाएगी।
    इस आयत से हमने सीखा कि सृष्टि की सभी वस्तुओं के बारे में चाहे वे जीवित हों या निर्जीव, आकाश में हों या धरती में, ईश्वर का ज्ञान समान है।
    मनुष्य की हर बात और हर कर्म, ईश्वरीय किताब में अंकित हो रहा है और किसी भी बात को न तो भूला जाता है और न ही उसकी अनदेखी की जाती है।
    आइये अब सूरए हज की आयत क्रमांक 71 की तिलावत सुनें।
    وَيَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ سُلْطَانًا وَمَا لَيْسَ لَهُمْ بِهِ عِلْمٌ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ نَصِيرٍ (71)
    और ये ईश्वर को छोड़ कर उनकी उपासना करते है जिनके लिए न तो ईश्वर ने कोई तर्क उतारा और न इन्हें उनके विषय में कोई ज्ञान है और अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं होगा। (22:71)
    पिछली आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के साथ अनेकेश्वरवादियों के विवाद की ओर संकेत किया गया था। यह आयत भी उन्हें संबोधित करते हुए कहती है कि जो लोग इस्लाम धर्म के बारे में आपसे विवाद करते हैं वे स्वयं ऐसे विचारों व कर्मों में ग्रस्त हैं जो किसी भी रूप में बुद्धि या ईश्वरीय शिक्षाओं से मेल नहीं खाते। वे मूर्तियों की पूजा करते हैं और इसके लिए उनके पास कोई भी बौद्धिक तर्क नहीं है। न तो ईश्वर ने उन्हें इस बात की अनुमति दी है कि वे उनके और अपने बीच संपर्क के रूप में मूर्तियों की उपासना करें और न ही बुद्धि इस बात को स्वीकार करती है कि वे मूर्तियों के सामने सिर झुकाएं।
    निश्चित रूप से जो भी इस प्रकार के तर्कहीन कार्य करना जारी रखेगा वह पहले चरण में स्वयं पर और फिर ईश्वरीय पैग़म्बरों पर अत्याचार करेगा जो ईश्वर की ओर से लोगों के मार्गदर्शन के लिए आए हैं।
    इस आयत से हमने सीखा कि उपासना के संबंध में ईश्वरीय आदेशों का पालन एक तर्कसंगत व बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य है किंतु अपने निजी विचारों के आधार पर उपासना करना सत्य से विचलित होने और अंधविश्वासों के बढ़ने का कारण बनता है।
    अत्याचार केवल सामाजिक मामलों में ही नहीं होता बल्कि धार्मिक मामलों में किसी भी प्रकार से अपने निजी विचारों को प्रविष्ट करना भी एक प्रकार से स्वयं और धर्म दोनों पर अत्याचार है।
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