islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए हज, आयतें 7-11, (कार्यक्रम 592)

    सूरए हज, आयतें 7-11, (कार्यक्रम 592)

    सूरए हज, आयतें 7-11, (कार्यक्रम 592)
    Rate this post

    आइये पहले सूरए हज की सातवीं आयत की तिलावत सुनें।
    وَأَنَّ السَّاعَةَ آَتِيَةٌ لَا رَيْبَ فِيهَا وَأَنَّ اللَّهَ يَبْعَثُ مَنْ فِي الْقُبُورِ (7)
    और यह कि प्रलय की घड़ी आने वाली है कि जिसमें कोई सन्देह नहीं है। और ईश्वर उन सभी को (जीवित करके) उठाएगा जो क़ब्रों में है। (22:7)
    इससे पहले हम सूरए हज की आरंभिक आयतों से अवगत हुए। उन आयतों में संसार के भविष्य में घटने वाली एक महान घटना की सूचना दी गई थी जिसे क़ुरआने मजीद की संस्कृति में प्रलय कहा जाता है। यह ऐसी घटना है कि जिसके घटित होने के बारे में बहुत से लोगों को संदेह है किंतु क़ुरआन ने शीत ऋतु में पेड़-पौधों के मरने और वसंत में पुनः जीवित होने का उदाहरण दे कर इसे ईश्वर की असीम शक्ति का चिन्ह बताया था और कहा था कि ईश्वर हर काम करने में सक्षम है। जो ईश्वर निर्जीव मिट्टी से मनुष्य की रचना करके उसे विभिन्न प्रकार की विचित्र शक्तियां प्रदान कर सकता है क्या वह इस बात में सक्षम नहीं है कि उसी मनुष्य को मरने के पश्चात पुनः जीवन प्रदान कर दे?
    यह आयत पूरी दृढ़ता के साथ कहती है कि प्रलय के आने के बारे में किसी भी प्रकार का कोई संदेह नहीं है। इस ईश्वरीय सूचना पर ईमान लाओ और यह जान लो कि क़ब्रस्तान तुम्हारा अंत नहीं है कि वहां दफ़्न होने के बाद तुम्हारा मामला समाप्त हो गया। ऐसा नहीं है बल्कि ज़मीन उस समय तक तुम्हें अपने पास अमानत के रूप में रखेगी जब तक ईश्वर का इरादा होगा। उसके पश्चात धरती, माता की भांति अपने भीतर तुम्हारा पालन पोषण करेगी, तुम कोंपल की भांति ज़मीन से बाहर निकलोगे और फिर ईश्वर के समक्ष उपस्थित होगे।
    इस आयत से हमने सीखा कि जो किसी वस्तु की रचना एक बार करता है वह पुनः उसकी रचना कर सकता है अतः उसकी शक्ति के बारे में संदेह नहीं करना चाहिए।
    प्रलय में लोग अपने वास्तविक शरीर के साथ उपस्थित होंगे और क़ब्रों में जो कुछ अमानत स्वरूप रखा गया है उसे ईश्वर बाहर निकालेगा।
    आइये अब सूरए हज की आठवीं, नवीं और दसवीं आयतों की तिलावत सुनें।
    وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يُجَادِلُ فِي اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَلَا هُدًى وَلَا كِتَابٍ مُنِيرٍ (8) ثَانِيَ عِطْفِهِ لِيُضِلَّ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ لَهُ فِي الدُّنْيَا خِزْيٌ وَنُذِيقُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ عَذَابَ الْحَرِيقِ (9) ذَلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ يَدَاكَ وَأَنَّ اللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِلْعَبِيدِ (10)
    और लोगों में कुछ ऐसे भी हैं जो किसी ज्ञान, मार्गदर्शन और प्रकाशमान किताब के बिना ही ईश्वर के बारे में झगड़ते हैं। (22:8) वे (ईश्वरीय कथन की उपेक्षा और) घमंड के साथ (लोगों को) ईश्वर के मार्ग से भटका देना चाहते हैं। उनके लिए इस संसार में अपमान है और प्रलय के दिन हम उन्हें जलाने वाले दंड का स्वाद चखाएँगे। (22:9) (हम उनसे कहेंगे) यह (दंड) उन कर्मों के कारण है जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजा था और निश्चित रूप से ईश्वर बन्दों पर तनिक भी अत्याचार करने वाला नहीं है। (22:10)
    ये आयतें एक बार फिर ईश्वर व प्रलय से संबंधित धर्म की शिक्षाओं के बारे में विरोधियों के विवाद और झगड़े की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि कुछ लोग घमंड व अहंकार के कारण और बिना किसी स्पष्ट बौद्धिक तर्क के ईमान वालों से झगड़ने के लिए तैयार रहते हैं। वे चाहते हैं कि लोगों को सत्य के मार्ग से विचलित कर दें और उन्हें अपने भ्रष्ट मार्ग पर चलने के लिए विवश कर दें।
    इस्लामी संस्कृति में तथ्य की पहचान और खोज के लिए वाद-विवाद को स्वीकार्य बताया गया है और यही कारण है कि ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि विरोधियों को धर्म की ओर आमंत्रित करने के मार्ग में उपदेश और तत्वदर्शिता के अतिरिक्त शास्त्रार्थ और वाद-विवाद से भी काम लीजिए कि जो एक स्वीकार्य शैली है किंतु स्पष्ट है कि हर प्रकार के शास्त्रार्थ को तर्क पर आधारित होना चाहिए और वह भी ऐसा तर्क जो दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य हो और किसी एक पक्ष की ओर से वह तर्क प्रस्तुत किए जाने पर दूसरा पक्ष उसे अस्वीकार न कर दे। बौद्धिक तर्क और विश्वस्त धार्मिक किताबें इसका उदाहरण हैं।
    ये आयतें इसी प्रकार उन लोगों को, जो सत्य समझने और लोगों को सत्य समझाने के लिए नहीं अपितु उन्हें पथभ्रष्ट करने के लिए बहस एवं विवाद करते हैं लोक-परलोक में कड़े दंड का वचन देती हैं और कहती हैं कि ईश्वर उन्हें इस संसार में अपमानित करेगा और प्रलय में भी अत्यंत कड़ा दंड उनकी प्रतीक्षा में है जो संसार में उनके कर्मों का परिणाम होगा।
    इन आयतों से हमने सीखा कि धार्मिक मामलों में वार्ता और शास्त्रार्थ उसी समय सार्थक एवं लाभदायक होगा कि जब वह अहं एवं हठधर्म पर नहीं अपितु तर्क व ज्ञान पर आधारित हो।
    निश्चित रूप से ईश्वरीय दंड, मनुष्य के बुरे कर्मों के अनुसार ही होते हैं, अहंकार व घमंड का बदला अपमान व बदनामी है।
    आइये अब सूरए हज की ग्यारहवीं आयत की तिलावत सुनें।
    وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَعْبُدُ اللَّهَ عَلَى حَرْفٍ فَإِنْ أَصَابَهُ خَيْرٌ اطْمَأَنَّ بِهِ وَإِنْ أَصَابَتْهُ فِتْنَةٌ انْقَلَبَ عَلَى وَجْهِهِ خَسِرَ الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةَ ذَلِكَ هُوَ الْخُسْرَانُ الْمُبِينُ (11)
    और लोगों में कुछ ऐसे भी हैं जो केवल ज़बान से ईश्वर की उपासना करते हैं। (और हृदय में उसके बारे में संदेह रखते हैं।) यदि उन्हें (संसार में) कोई लाभ पहुँचता है तो वे उससे सन्तुष्ट हो जाते हैं और यदि परीक्षा के लिए कोई मुसीबत आती है तो वे मुंह फेर कर (कुफ़्र की ओर) पलट जाते हैं। वे लोक-परलोक दोनों में घाटा उठाते हैं और यही तो खुला हुआ घाटा है। (22:11)
    ये आयतें कमज़ोर ईमान वालों का परिचय करवाते हुए कहती हैं कि ये लोग कुफ़्र की घाटी में गिरने की कगार पर हैं क्योंकि ईमान इनके हृदय तक नहीं पहुंचा है और ये केवल ज़बान से इस्लाम को स्वीकार करते हैं। अतः जीवन में जब भी इन्हें सुख व संपन्नता प्राप्त होती है तो ये ईश्वर का आभार प्रकट करते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं किंतु जैसे ही इन्हें छोटी सा भी दुख मिलता है या ये कड़ाई व मुसीबत में ग्रस्त होते हैं तो, कुफ़्र बकने लगते हैं और ईश्वर की शिकायत करते हैं।
    दूसरे शब्दों में उनका धर्म, उनके संसार के अधीन होता है। यदि उनका संसार सुरक्षित रहता है तो वे धर्म का बचाव करते हैं किंतु यदि संसार उनसे मुंह मोड़ ले तो वे धर्म से मुंह मोड़ लेते हैं। यह ऐसी स्थिति में है कि जब संपन्नता या अभाव सब कुछ ईश्वरीय परीक्षा का साधन है और यह संसार मनुष्य के लिए परीक्षा का स्थल है।
    इस आयत से हमने सीखा कि हमें अपने ईमान पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि यह पता नहीं है कि कड़ाई और मुसीबत के समय हमारी प्रतिक्रिया क्या होगी और हम किस प्रकार का व्यवहार करेंगे।
    मनुष्य के जीवन में जो मुसीबतें आती हैं, वे उसकी परीक्षा का साधन हैं। यदि वह संयम से काम ले तो उसे पारितोषिक मिलेगा और यदि वह कुफ़्र अपनाए तो फिर ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होगा।
    http://hindi.irib.ir/