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    सूरए हज, आयतें 72-76, (कार्यक्रम 605)

    सूरए हज, आयतें 72-76, (कार्यक्रम 605)
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    आइये पहले सूरए हज की आयत क्रमांक 72 की तिलावत सुनें।
    وَإِذَا تُتْلَى عَلَيْهِمْ آَيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ تَعْرِفُ فِي وُجُوهِ الَّذِينَ كَفَرُوا الْمُنْكَرَ يَكَادُونَ يَسْطُونَ بِالَّذِينَ يَتْلُونَ عَلَيْهِمْ آَيَاتِنَا قُلْ أَفَأُنَبِّئُكُمْ بِشَرٍّ مِنْ ذَلِكُمُ النَّارُ وَعَدَهَا اللَّهُ الَّذِينَ كَفَرُوا وَبِئْسَ الْمَصِيرُ (72)
    और (हे पैग़म्बर!) जब उनके समक्ष हमारी स्पष्ट आयतें पढ़ी जाती हैं तो आप काफ़िरों के चेहरों पर अप्रसन्नता के भाव देखते हैं। लगता है कि अभी वे उन लोगों पर टूट पड़ेंगे जो उन्हें हमारी आयतें सुनाते हैं। (उनसे) कह दीजिए कि क्या मैं तुम्हें इससे बुरे (दंड) की सूचना दूं? वह नरक है जिसका ईश्वर ने काफ़िरों को वचन दे रखा है और वह क्या ही बुरा ठिकाना है। (22:72)
    इससे पहले की आयतों में ईश्वर ने अनेकेश्वरवादियों द्वारा मूर्तियों की पूजा किए जाने की आलोचना की थी और इसे बुद्धि और ईश्वरीय संदेश के विपरीत कार्य बताया था। यह आयत कहती है कि उनके भीतर इतना हठधर्म है कि वे क़ुरआने मजीद की आयतों को सुनने और उन पर विचार करने तक के लिए तैयार नहीं होते और जब भी कोई उनके समक्ष क़ुरआने मजीद की तिलावत करता है तो वे इतने क्रोधित हो जाते हैं कि उस पर आक्रमण करके उसे ईश्वरीय कथन पढ़ने से रोक देना चाहते हैं जबकि बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के विचारों व आस्थाओं को सुनने और उनसे अवगत होने का इच्छुक होता है कि यदि वे तर्कसंगत हों तो उन्हें स्वीकार कर ले और यदि तर्कहीन हों तो ठोस तर्कों से उन्हें रद्द कर दे।
    जी हाँ! जो लोग आज धार्मिक शिक्षाओं के मुक़ाबले में स्वयं को खुले विचार वालों की भांति दिखाना चाहते हैं उनके अस्तित्व को द्वेष व हठधर्म के कारण उत्पन्न होने वाले कुफ़्र ने इस प्रकार अपने घेरे में ले रखा है कि वे किसी भी तर्क से सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं और ईमान वालों के विरुद्ध बल व शक्ति जैसे हथकंडों का प्रयोग करते हैं। जबकि उनका यह व्यवहार केवल इसी भौतिक संसार तक सीमित है और प्रलय में वे कड़े दंड में ग्रस्त होंगे। यदि इस संसार में ईश्वर की आयतों को सुनना उनके लिए कठिन है तो प्रलय में उन्हें इससे अधिक कठिन परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा जो कुफ़्र के दंड के रूप में सामने आएगी।
    इस आयत से हमने सीखा कि कुफ़्र एवं सत्य स्वीकार न करने की भावना, मनुष्य को ईश्वर के समक्ष खड़े होने की ओर ले जाती है।
    जिसके पास तर्क नहीं होता वह अपने तर्कहीन विचारों के बचाव के लिए दूसरों पर आक्रमण करता है। इससे उसके तर्क की कमज़ोरी का ही पता चलता है।
    आइये अब सूरए हज की आयत क्रमांक 73 और 74 की तिलावत सुनें।
    يَا أَيُّهَا النَّاسُ ضُرِبَ مَثَلٌ فَاسْتَمِعُوا لَهُ إِنَّ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ لَنْ يَخْلُقُوا ذُبَابًا وَلَوِ اجْتَمَعُوا لَهُ وَإِنْ يَسْلُبْهُمُ الذُّبَابُ شَيْئًا لَا يَسْتَنْقِذُوهُ مِنْهُ ضَعُفَ الطَّالِبُ وَالْمَطْلُوبُ (73) مَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ إِنَّ اللَّهَ لَقَوِيٌّ عَزِيزٌ (74)
    हे लोगो! (मूर्ति पूजा के बारे में) एक उपमा दी गई है तो उसे ध्यान से सुनो कि निःसंदेह ईश्वर को छोड़ कर तुम जिन्हें पुकारते हो वे कदापि एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते। चाहे इसके लिए वे सब इकट्ठा हो जाएँ और यदि मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले जाए तो वे उसे उससे छुड़ा भी नहीं सकते। कितना असहाय है चाहने वाला (उपासक) भी और चाहा जाने वाला (उपास्य) भी। (22:73) उन्होंने ईश्वर का उस प्रकार मूल्य नहीं समझा जैसा कि समझना चाहिए था। निश्चय ही ईश्वर अत्यन्त शक्तिशाली व अजेय है। (22:74)
    ये आयतें काल्पनिक पूज्यों की अक्षमता को, चाहे वे पत्थर व लकड़ी के हों या पशु व मनुष्य हों, एक साधारण सी उपमा के माध्यम से स्पष्ट करती है और कहती है कि जिन वस्तुओं या लोगों के बारे में तुम यह सोचते हो कि वे तुम्हारे जीवन में प्रभावी हैं और तुम्हें कोई लाभ पहुंचा सकते हैं या फिर किसी क्षति को दूर कर सकते हैं, वे एक मक्खी तक पैदा करने की क्षमता नहीं रखते चाहे इसके लिए वे सभी विद्वानों को अपने पास एकत्रित कर लें।
    वे न केवल यह कि एक मक्खी को पैदा नहीं कर सकते बल्कि यदि मक्खी कोई चीज़ उठा कर उड़ जाए तो वे उससे वह चीज़ वापस भी नहीं ले सकते। तो जो लोग एक मक्खी का मुक़ाबला नहीं कर सकते वे किस प्रकार जीवन में तुम्हारा सहारा बन सकते हैं? और तुम लोग किस प्रकार पत्थर, लकड़ी और पशुओं जैसी कमज़ोर रचनाओं को ईश्वर का समकक्ष ठहराते हो कि जिसने आकाशों, धरती और इतनी विभिन्न प्रकार की रचनाओं को पैदा किया है? वे कमज़ोर व काल्पनिक पूज्य कहां और यह सशक्त रचयिता कहां?
    अंत में आयत एक संक्षिप्त वाक्य में इस बात पर बल देते हुए कहती है कि ये चाहने वाले उपासक भी कमज़ोर हैं और जिनसे मांगा जा रहा है वे तथाकथित पूज्य भी अक्षम हैं।
    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की रचनाओं को तुच्छ नहीं समझना चाहिए चाहे वे मक्खी हों या मच्छर।
    शक्तशाली ईश्वर को छोड़ कर कमज़ोर व अक्षम लोगों व वस्तुओं से सहायता मांगना एक प्रकार से ईश्वरीय अनुकंपाओं के प्रति अकृतज्ञता है।
    आइये अब सूरए हज की आयत क्रमांक 75 और 76 की तिलावत सुनें।
    اللَّهُ يَصْطَفِي مِنَ الْمَلَائِكَةِ رُسُلًا وَمِنَ النَّاسِ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ بَصِيرٌ (75) يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَإِلَى اللَّهِ تُرْجَعُ الْأُمُورُ (76)
    ईश्वर (अपने आदेश भेजने के लिए) फ़रिश्तों में से (भी) और मनुष्यों में से (भी) संदेशवाहक चुनता है। निश्चय ही ईश्वर सब कुछ सुनने (और) देखने वाला है। (22:75) वह उनके पिछले और अगले सभी कर्मों से अवगत है और सारे मामलों को पलटना तो ईश्वर ही की ओर है। (22:76)
    मक्के के अनेकेश्वरवादी मूर्तियों की पूजा करते थे जबकि कुछ आसमानी किताब वाले, जिब्रईल जैसे फ़रिश्तों और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम जैसे पैग़म्बरों की उपासना करते थे। यह आयत उन्हें संबोधित करते हुए कहती है कि फ़रिश्ते और पैग़म्बर दोनों ही ईश्वर की रचनाएं हैं और दोनों का दायित्व ईश्वरीय कथन को लोगों तक पहुंचाना है। उपासना, ईश्वर से विशेष है और उसके अतिरिक्त कोई भी उपासना के योग्य नहीं है चाहे वह पैग़म्बर हो या फ़रिश्ता।
    ईश्वर न केवल लोगों के कर्मों पर बल्कि अपने संदेश वाहकों के कर्मों पर भी सदैव दृष्टि रखता है और वे अपने कर्मों के प्रति उत्तरदायी हैं।
    इन आयतों से हमने सीखा कि फ़रिश्तों का एक गुट, लोगों तक ईश्वरीय संदेश पहुंचाने हेतु ईश्वर तथा पैग़म्बरों के बीच संपर्क का माध्यम है।
    यह संसार पूर्ण रूप से ईश्वर के सामने है और वह लोगों की बातों को सुनने और उनके कर्मों को देखने वाला है।
    सृष्टि का अंत, उसके आरंभ की ही भांति ईश्वर की ओर से होगा और कोई भी व्यक्ति या वस्तु उसके ज्ञान व शक्ति की परिधि से बाहर नहीं है।
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